बॉलीवुड सिनेमा में संघर्ष, असफलता और फिर उठ खड़े होने की कहानियों का एक अलग ही वर्ग रहा है। जब भी पर्दे पर किसी आम युवा के बिखरने और संभलने की दास्तान आती है, दर्शक उससे तुरंत जुड़ जाते हैं। कमल चंद्रा के निर्देशन में बनी फिल्म 'आर्यभट्ट का जीरो' भी एक ऐसे ही मध्यमवर्गीय युवा की कहानी लेकर आती है, जो समाज के तानों और अपनी नाकामियों के बोझ तले दबा हुआ है। हिमांश कोहली और सोनाली सेहगल स्टारर यह फिल्म जीवन के उस दौर को टटोलती है जहां इंसान खुद को पूरी तरह 'जीरो' मानने लगता है। यह महज एक यूपीएससी एस्पिरेंट की दौड़ नहीं है, बल्कि एक बेटे की अपने पिता की नजरों में और एक इंसान की अपनी नजरों में पहचान बनाने की जंग है। हल्के-फुल्के हास्य और भावनात्मक रिश्तों के ताने-बाने से बुनी यह फिल्म दर्शकों को प्रेरणा देने का प्रयास करती है।
कहानी और प्लॉट का ताना-बाना
फिल्म की शुरुआत दिल्ली के मुखर्जी नगर की भागदौड़ भरे माहौल से होती है, जहां का हर कोना किसी न किसी सपने और संघर्ष का गवाह है। कहानी का मुख्य केंद्र ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव उर्फ 'बग्गू' (हिमांश कोहली) है, जो उत्तराखंड के एक बेहद साधारण और लोअर मिडिल क्लास परिवार से ताल्लुक रखता है। बग्गू के पिता आर्यभट्ट श्रीवास्तव (नीरज सूद) एक सरकारी दफ्तर में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं और अपने बेटे से बहुत उम्मीदें रखते हैं। बग्गू की जिंदगी में मोड़ तब आता है जब उसकी गर्लफ्रेंड रिंकू (सोनाली सेहगल) एक एसडीएम से शादी कर लेती है। दिल टूटने का दर्द और खुद को साबित करने की जिद बग्गू को यूपीएससी की तैयारी की ओर धकेल देती है। वह ठान लेता है कि वह रिंकू के पति से भी बड़ा अधिकारी बनकर दिखाएगा।
हालांकि परिस्थितियां बग्गू का साथ नहीं देतीं। बार-बार की असफलताएं, गलत फैसले और किस्मत का दगा उसे आगे नहीं बढ़ने देते। रिश्तेदार और आसपास के लोग उसकी इस नाकामी पर उसे 'आर्यभट्ट का जीरो' का ताना देने लगते हैं। यह नाम धीरे-धीरे उसके आत्मविश्वास को खत्म कर देता है और वह खुद को वाकई निष्प्रभावी समझने लगता है। फिल्म का प्लॉट केवल इस बात पर केंद्रित नहीं है कि बग्गू अफसर बनता है या नहीं, बल्कि इस बात पर है कि क्या वह समाज द्वारा तय किए गए सफलता के मानकों से हटकर अपनी खुद की कीमत पहचान पाता है। कहानी में कई ऐसे मोड़ आते हैं जहां बग्गू को अपने पारिवारिक दायित्वों और अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के बीच चुनाव करना पड़ता है।
निर्देशन और तारिक मोहम्मद का लेखन
निर्देशक कमल चंद्रा ने फिल्म को बहुत अधिक मेलोड्रामा या बनावटी चकाचौंध से दूर रखकर यथार्थ के करीब रखने की कोशिश की है। उन्होंने एक छोटे शहर के युवा की मानसिक स्थिति और एक मिडिल क्लास घर की मजबूरियों को बहुत सादगी से पर्दे पर उतारा है। लेखक तारिक मोहम्मद की कहानी में ताजगी भले ही कम हो, लेकिन उनके लिखे संवाद और परिस्थितियां बहुत स्वाभाविक लगती हैं। पिता और पुत्र के बीच के संवाद बेहद मार्मिक हैं और वे किसी भी आम भारतीय परिवार की तस्वीर पेश करते हैं। निर्देशक ने कॉमेडी और ड्रामा का संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया है, जिससे फिल्म की गति बनी रहती है। हालांकि, कुछ जगहों पर निर्देशक का नियंत्रण थोड़ा ढीला पड़ता दिखाई देता है, विशेषकर उन दृश्यों में जहां फिल्म अपने मुख्य मुद्दे से भटक कर अनावश्यक सब-प्लॉट्स में उलझ जाती है।
तकनीकी पक्ष और निर्माण मूल्य
तकनीकी दृष्टिकोण से देखा जाए तो फिल्म का काम संतोषजनक है। सिनेमैटोग्राफी में उत्तराखंड की शांत वादियों और दिल्ली के भीड़भाड़ वाले मुखर्जी नगर के बीच का अंतर बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। कैमरे का काम सादा है, जो कहानी के मिजाज से पूरी तरह मेल खाता है। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के भावनात्मक पलों को उभारने में मदद करता है और दर्शकों को किरदारों के दर्द से जोड़ता है। संपादन (एडिटिंग) के मामले में फिल्म थोड़ा कमजोर साबित होती है; यदि सेकेंड हाफ में कुछ अनावश्यक दृश्यों को छोटा किया जाता, तो फिल्म की पेसिंग और बेहतर हो सकती थी। संगीत ठीक-ठाक है, कुछ गाने कहानी के प्रवाह के साथ बहते हैं, लेकिन कोई भी ऐसा ट्रैक नहीं है जो फिल्म देखने के बाद लंबे समय तक जुबां पर चढ़ा रहे।
कलाकारों का अभिनय प्रदर्शन
अभिनय के मामले में हिमांश कोहली ने काफी प्रभावित किया है। बग्गू के किरदार में उन्होंने एक हताश, टूटे हुए लेकिन अंदर से मासूम युवा के भावों को बहुत ईमानदारी से जीया है। कॉमेडी दृश्यों में उनका टाइमिंग अच्छा है और भावुक दृश्यों में उनकी आंखों की लाचारी साफ झलकती है। नीरज सूद ने बग्गू के पिता के रूप में फिल्म की आत्मा को संभाले रखा है। एक मध्यमवर्गीय पिता की लाचारी, गुस्सा और बेटे के प्रति छिपा हुआ प्यार उन्होंने अपने बेहतरीन अभिनय से पर्दे पर जीवंत कर दिया है।
रवि किशन अपने खास देसी अंदाज में जब भी पर्दे पर आते हैं, चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। उनका किरदार फिल्म में हल्का-फुल्का मनोरंजन जोड़ता है। सोनाली सेहगल ने एक व्यावहारिक और चालाक गर्लफ्रेंड रिंकू के रोल में अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। दर्शना बानिक का रोल भले ही छोटा है, लेकिन वे अपने अभिनय से छाप छोड़ने में सफल रहती हैं। इसके अलावा अलका अमीन, राजेश शर्मा और शिल्पा शिंदे जैसे अनुभवी सपोर्टिंग कास्ट ने फिल्म के ताने-बाने को मजबूती प्रदान की है।
कहां चूक गई फिल्म
तमाम सकारात्मक पहलुओं के बावजूद, 'आर्यभट्ट का जीरो' में कुछ ऐसी खामियां हैं जो इसे एक उत्कृष्ट फिल्म बनने से रोकती हैं। सबसे पहली बात, फिल्म की कहानी में नयापन की भारी कमी है। '12वीं फेल' या 'शादी में जरूर आना' जैसी फिल्मों के बाद ठुकराए हुए आशिक का यूपीएससी पास करने का विचार अब दर्शकों के लिए थोड़ा पुराना और अनुमानित हो चुका है। दर्शक पहले से ही भांप लेते हैं कि आगे क्या होने वाला है, जिससे सस्पेंस खत्म हो जाता है।
फिल्म का स्क्रीनप्ले सेकेंड हाफ में काफी धीमा हो जाता है। बग्गू के संघर्ष को दिखाने के चक्कर में कई दृश्य दोहराव भरे लगते हैं, जो दर्शकों को थोड़ा उबाऊ लग सकते हैं। कुछ किरदारों के बदलाव और कहानी के अचानक आने वाले मोड़ थोड़े अस्वाभाविक महसूस होते हैं, जिन्हें और बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था। साथ ही फिल्म का अंत जितना प्रभावशाली होना चाहिए था, उतना असर नहीं छोड़ पाता और थोड़ा जल्दबाजी में समेटा हुआ लगता है।
फाइनल वर्डिक्ट
'आर्यभट्ट का जीरो' एक साफ-सुथरी, सरल और सकारात्मक संदेश देने वाली फिल्म है जो यह सिखाती है कि किसी व्यक्ति की असफलताएं ही उसकी अंतिम पहचान नहीं होतीं। हिमांश कोहली और नीरज सूद का शानदार अभिनय, पिता-पुत्र का भावनात्मक रिश्ता और हल्की-फुल्की कॉमेडी इस फिल्म को देखने योग्य बनाती है। हालांकि घिसी-पिटी कहानी और कमजोर सेकेंड हाफ के कारण यह फिल्म उस ऊंचाई को नहीं छू पाती जिसकी इससे उम्मीद की जाती है। यदि आप बिना किसी बड़ी उम्मीद के अपने परिवार के साथ एक हल्की-फुल्की, भावुक और प्रेरणादायक कहानी देखना चाहते हैं तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है।