सिनेमा के इतिहास में एक ही रात के घटनाक्रम पर आधारित फिल्में हमेशा से दर्शकों और निर्देशकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं। एक ही रात का सीमित दायरा, समय की टिक-टिक करती सुई और असीम संभावनाएं, ये तमाम पहलू किसी भी साधारण सी कहानी में भी जबरदस्त रोमांच और कॉमेडी का तड़का लगा सकते हैं। 'भाई तेरा स्टार है' इसी जॉनर को भुनाने का एक प्रयास है। डांसर और रियलिटी शो से अपनी पहचान बनाकर अभिनय की दुनिया में कदम रखने वाले राघव जुयाल की बतौर सोलो लीड यह पहली बड़ी फिल्म है।
फिल्म का मूल विचार 90 के दशक की प्रियदर्शन और गोविंदा स्टाइल की अनिरुद्ध, अतरंगी और भगदड़ वाली कॉमेडी की याद दिलाता है, जहां गलतफहमियों का एक छोटा सा पहाड़ आखिर में एक विशाल कॉमेडी-ऑफ-एरर्स का रूप ले लेता है। कागज पर देखा जाए तो इस प्लॉट में एक जानदार स्लैपस्टिक कॉमेडी बनने के सारे मसाले मौजूद थे। लेकिन अफसोस की बात यह है कि पर्दे पर उतरते ही यह फिल्म अपने ही बोझ तले दब जाती है। सिनेमाघर में बिताया गया इसका पौने दो घंटे का समय मनोरंजक कम और किसी कभी न खत्म होने वाले थकाऊ सपने जैसा ज्यादा महसूस होता है। रिव्यू से पहले देखें ट्रेलर।
क्या है कहानी और प्लॉट?
फिल्म की कहानी लंदन की हाड़ कंपाने वाली ठंड के बीच शुरू होती है, जहां अजय सिंह (राघव जुयाल) नाम का एक नौजवान अपने बड़े-बड़े सपनों के साथ संघर्ष कर रहा है। अजय खुद को बॉलीवुड का अगला सुपरस्टार मानता है, हालांकि उसमें अभिनय प्रतिभा के नाम पर केवल असीमित ओवरकॉन्फिडेंस और बचकानी हरकतें ही हैं। किस्मत चमकाने और झटपट अमीर बनने के चक्कर में अजय शॉर्टकट रास्ते तलाशता रहता है। इसी फेर में वह क्रिकेट सट्टेबाजी के जाल में फंस जाता है और लंदन के खूनखार और बेपरवाह क्लब मालिक फैटी (संजय कपूर) से ₹10000 पौंड हार बैठता है।
फैटी अजय को अल्टीमेटम देता है कि अगर सूरज उगने से पहले उसके पैसे वापस नहीं मिले तो अंजाम बहुत बुरा होगा। अब अपनी जान और इज़्ज़त बचाने के लिए अजय के पास केवल एक रात का वक्त है। यहां से शुरू होता है झूठ का एक लंबा सिलसिला और पूरे लंदन शहर में मची एक पागलों जैसी भाग-दौड़। पैसे का इंतजाम करने के लिए अजय अपनी बहन नताशा (पार्वती ओमानाकुट्टन) से मदद मांगता है, जो खुद अपने नए करोड़पति बॉयफ्रेंड के साथ एक सुकून भरी शाम बिताने की कोशिश कर रही है। लेकिन नताशा की ज़िंदगी में उसका सनकी और पजेसिव एक्स-बॉयफ्रेंड सिड (विवान भटेना) पहले से ही बिन बुलाए मेहमान की तरह रायता फैला रहा होता है।
दूसरी तरफ अजय की प्रेमिका रोशनी (निहारिका एनएम), जो संयोग से सिड की ही बहन है, भी अजय की इस बेवकूफी भरी मुसीबत को सुलझाने के चक्कर में इस अफ़रातफरी का हिस्सा बन जाती है। पैसे मांगने, झूठ बोलने, एक-दूसरे से छुपने और उधारी चुकाने का यह खेल धीरे-धीरे एक भारी-भरकम जंजाल में बदल जाता है। हर किरदार दूसरे किरदार से कुछ न कुछ छुपा रहा है और सभी को पैसों की सख्त ज़रूरत है। कहानी का चरम बिंदु यानी क्लाइमेक्स एक क्लासिक कॉमेडी-ऑफ-एरर्स की तर्ज पर रचा गया है, जहां आधी-अधूरी जानकारी के साथ सभी पात्र एक ही छत के नीचे इकट्ठा होते हैं और गलतफहमियों का एक शोर-शराबे वाला बवंडर खड़ा हो जाता है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशक और सह-लेखक विवेक बी. अग्रवाल ने सुदीप्तो सरकार के साथ मिलकर एक ऐसी पटकथा तैयार की है जो शुरुआत के कुछ ही मिनटों में अपनी दिशा खो देती है। एक रात की घटनाओं पर आधारित फ़िल्मों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उनकी रफ्तार कितनी कसी हुई है और पंचलाइन्स कितनी सटीक बैठती हैं। दुर्भाग्य से यहां निर्देशन का नियंत्रण पूरी तरह से ढीला नज़र आता है। फिल्म अपनी गति बनाए रखने में नाकाम रहती है और बार-बार एक ही तरह के सिचुएशनल गैग्स को दोहराती है।
तकनीकी मोर्चे पर फिल्म के कुछ हिस्से देखने में अच्छे लगते हैं। सिनेमैटोग्राफी ने लंदन की रातों, रोशन सड़कों और क्लब कल्चर को खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है। विजुअल टोन और प्रोडक्शन डिज़ाइन काफी रंगीन और जीवंत हैं, जो एक कमर्शियल कॉमेडी के लिहाज़ से सही बैठते हैं। लेकिन एडिटिंग टेबल पर फिल्म बुरी तरह पिछड़ जाती है। यदि संपादन थोड़ा और सख्त होता और बेवजह खींचे गए दृश्यों पर कैंची चलाई जाती तो शायद फिल्म की रफ्तार थोड़ी बेहतर हो सकती थी, जबकि गौर करने वाली बात है कि फिल्म सिर्फ 1 घंटे 45 मिनट की है, बेहतर रहता कि इसे एक शॉर्ट फिल्म में निपटा देते!
संगीत की बात करें तो अमित त्रिवेदी का संगीत ठीक-ठाक है। गानों में थोड़ी ऊर्जा जरूर है, लेकिन वे कहानी के प्रवाह को बढ़ाने के बजाय उसमें रुकावट पैदा करते हैं। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि एंड क्रेडिट्स के ठीक बाद दो गानों को एक के बाद एक बिना किसी तुक के ठूंस दिया गया है, जो दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेता है। इसके अलावा, बैकग्राउंड स्कोर में इंस्टाग्राम रील्स के वायरल साउंड इफेक्ट्स का बेहिसाब इस्तेमाल किया गया है, जो शुरू में भले ही थोड़ा अलग लगे, लेकिन जल्द ही बहुत झुंझलाहट पैदा करने लगता है।
अभिनय और किरदार
फिल्म की सबसे बड़ी टीस यह है कि इसके पास एक प्रतिभाशाली स्टार कास्ट थी, लेकिन किसी भी कलाकार को ढंग से इस्तेमाल नहीं किया गया। राघव ने अपने किरदार में अपनी पूरी एनर्जी झोंक दी है। उनकी कॉमिक टाइमिंग और शारीरिक फुर्ती पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। कई दृश्यों में उनका असीमित आत्मविश्वास और बेतुकापन चेहरे पर मुस्कान लाता है, लेकिन पटकथा की कमजोरी के कारण, उनकी यह अति-उत्साही एनर्जी कई जगह ओवरएक्टिंग का रूप ले लेती है। अगर लेखन में थोड़ा संयम और ठहराव होता, तो अजय का किरदार दर्शकों के दिलों को छू सकता था।
इस पूरी अराजक फिल्म में अगर कोई एक किरदार सबसे ज़्यादा संतुलित और सुलझा हुआ लगता है तो वह पार्वती का है। उन्होंने नताशा का रोल काफी परिपक्वता से निभाया है। अपने आत्ममुग्ध भाई और चिपकू एक्स-बॉयफ्रेंड के बीच संतुलन बनाती हुई उनकी अदाकारी राहत की सांस देती है।
डिजिटल दुनिया से बॉलीवुड में कदम रख रही निहारिका एनएम के हिस्से कुछ मजेदार वन-लाइनर्स आए हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग ताजा है, लेकिन उनकी डायलॉग डिलीवरी बेहद औसत और आधी-अधूरी लगती है। उनके किरदार में गहराई की भारी कमी है।
संजय कपूर ने फैटी के रूप में एक लाउड क्लब ओनर बनने की कोशिश की है, लेकिन कमजोर संवादों की वजह से वे सिर्फ चिल्लाते हुए ही नजर आते हैं। नीकी वालिया ने भी अपने सीमित स्क्रीन टाइम में पूरी निष्ठा से काम किया है, पर उनके पास करने को कुछ ख़ास नहीं था। विवान भटेना ने अपने किरदार को थोड़ा संयमित रखने की कोशिश की है, हालांकि उनका प्लॉट लाइन बहुत बेतुका है। वहीं बरखा सिंह पर्दे पर खूबसूरत लगी हैं, लेकिन उनका किरदार पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। एक मंझे हुए और बेहतरीन अभिनेता होने के बावजूद चंदन रॉय सान्याल को इस फ़िल्म में पूरी तरह से बर्बाद कर दिया गया है। उन्हें केवल भाग-दौड़ करने और जोर-जोर से चीखने के लिए ही रखा गया है, जो बेहद निराशाजनक है।
क्या बात नहीं बनी?
फिल्म की सबसे बड़ी नाकामी इसका स्क्रीनप्ले है। एक रात की कहानी में जो कसावट होनी चाहिए थी, वह नदारद है। हर 10 मिनट में नए किरदार जुड़ते जाते हैं, जिससे मुख्य प्लॉट भटक जाता है। फिल्म में कॉमेडी पैदा करने के लिए स्थितियों और संवादों के बजाय आवाज़ के वॉल्यूम को बढ़ा दिया गया है। चीखना-चिल्लाना, एक-दूसरे पर झपटना और दोहराव वाले जोक्स हंसाने में पूरी तरह से नाकाम रहते हैं। 'तुझमें कजोल नहीं, झोल है' जैसी घटिया और बासी वन-लाइनर्स दर्शकों को हंसाने के बजाय सिरदर्द देती हैं। जोक्स इतने कृत्रिम हैं कि वे किरदारों के स्वभाव से मेल नहीं खाते। हालांकि अंत में एक बड़ा कॉमेडी-ऑफ-एरर्स सेटअप तैयार किया जाता है, लेकिन उससे पहले दर्शक इतने थक चुके होते हैं कि क्लाइमेक्स का कोई बड़ा असर नहीं पड़ता।
वर्डिक्ट
'भाई तेरा स्टार है' उन फिल्मों की सूची में शामिल होती है जिनके पास एक बेहतरीन प्लॉट, एक ऊर्जावान मुख्य अभिनेता और एक अतरंगी बैकड्रॉप तो था, लेकिन वे सही लेखन के अभाव में पूरी तरह से पटरी से उतर गईं। राघव जुयाल निसंदेह एक बेहतरीन कलाकार हैं और उनमें एक सोलो लीड बनने का पूरा माद्दा है, लेकिन यह फ़िल्म उनके हुनर के साथ न्याय नहीं कर पाती।
लंदन के NRI माहौल में रची गई यह कहानी न तो सांस्कृतिक बारीकियों को छू पाती है और न ही हंसी का कोई यादगार अनुभव दे पाती है। यदि आप राघव जुयाल के बहुत बड़े प्रशंसक हैं और दिमाग बंद करके केवल शोर-शराबे वाली सिचुएशनल कॉमेडी देखना पसंद करते हैं तो शायद आप इसे बर्दाश्त कर पाएं, वरना यह एक ऐसी असीम रात की दास्तान है जो थकावट और निराशा के सिवा कुछ नहीं देती। सिनेमाघर जाने के बजाय इस रात को टाल देना ही बेहतर फैसला होगा।