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Digger Movie Review: डायरेक्टर इनारितु की 'डिगर' के लिए कम्फर्ट जोन से बाहर आए टॉम क्रूज, जबरदस्त एक्टिंग ने कहानी में भरा दम

 Written By: Sakshi Verma
 Published : Oct 02, 2026 05:02 pm IST,  Updated : Oct 02, 2026 05:02 pm IST

अलेजांद्रो जी. इनारितु के महत्वाकांक्षी व्यंग्य 'डिगर' में टॉम क्रूज़ एक चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाते नजर आते हैं। यह फिल्म डार्क ह्यूमर, अव्यवस्था और सामाजिक टिप्पणी का मिश्रण है और साथ ही क्रूज को एक ऐसे दायरे में ले जाती है जो उनके लिए नया है।

tom cruise
'डिगर' फिल्म रिव्यू। Photo: INSTAGRAM/@TOMCRUISE
  • फिल्म रिव्यू: डिगर
  • स्टार रेटिंग 3.5/5
  • पर्दे पर: 2 अक्टूबर, 2026
  • डायरेक्टर: अलेजांद्रो जी. इनारितु
  • शैली: डार्क कॉमेडी, ड्रामा

टॉम क्रूज ने सालों तक हवाई जहाजों से कूदने, इमारतों पर चढ़ने और चट्टानों से मोटरसाइकिल चलाने जैसे स्टंट किए हैं। 'डिगर' फिल्म में उनका सबसे बड़ा रिस्क कोई स्टंट नहीं है। बल्कि, यह एक बहुत ही बुरे और अजीब तेल कारोबारी का किरदार निभाने और स्क्रीन पर खुद को लगभग पहचान न पाने लायक बना लेने का फैसला है। अलेजांद्रो इनारितु की डायरेक्ट की गई फिल्म 'डिगर' में क्रूज ने टेक्सास के अमीर तेल कारोबारी डिगर रॉकवेल का रोल निभाया है, जिसके आर्कटिक में ड्रिलिंग ऑपरेशन की वजह से पर्यावरण से जुड़ी एक बड़ी आपदा आ जाती है। बर्फ का एक बहुत बड़ा टुकड़ा टूटकर यूरोप की तरफ बढ़ने लगता है, जिससे सरकारें, वैज्ञानिक और खुद डिगर भी इसके नतीजों से निपटने की कोशिश में लग जाते हैं। यह एक अजीब फिल्म है, और इसे जानबूझकर ऐसा बनाया गया है। साथ ही, यह क्रूज के जाने-पहचाने ब्लॉकबस्टर वाले अंदाज से हटकर किए गए दिलचस्प कामों में से एक है।

डिगर: कहानी

कहानी के केंद्र में डिगर का तेल का साम्राज्य और मुनाफे की उसकी बेतहाशा चाहत से होने वाला नुकसान है। जब वैज्ञानिक उसे चेतावनी देते हैं कि उसकी कंपनी की ड्रिलिंग से एक बहुत बड़ी तबाही हो सकती है, तो डिगर शुरू में इसे मानने से इनकार करता है और गुस्सा हो जाता है। उसकी सोच जम्मेदारी लेने की नहीं, बल्कि हालात को काबू में करने और उससे भी जरूरी, जनता की नजर में अपनी छवि को नियंत्रित करने की होती है। इससे इनारितु को कुछ जाने-पहचाने विषयों को समझने का मौका मिलता है। कॉर्पोरेट ताकत, पर्यावरण को नुकसान, राजनीतिक प्रभाव और ताकतवर लोगों की पब्लिसिटी के ज़रिए किसी संकट को नए सिरे से पेश करने की क्षमता।

फिल्म इन विचारों को बहुत बारीकी से पेश नहीं करती। लेकिन, इनारितु का मकसद बारीकी दिखाना भी नहीं है। डिगर का अंदाज़ जोरदार, अजीब और ड्रामेटिक है। कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां व्यंग्य एकदम सटीक बैठता है, खासकर तब जब किरदार एक असली तबाही को पब्लिक रिलेशन की कवायद में बदलने की कोशिश करते हैं। फिल्म में कहानी के कुछ ऐसे मोड़ भी हैं जिनका मजा पहले से ज्यादा जाने बिना ही आता है। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, इसका ढांचा और भी अनोखा होता जाता है, जिससे यह महज़ एक सीधी-सादी तबाही की कहानी नहीं रह जाती।

'डिगर' में टॉम क्रूज का अभिनय

टॉम क्रूज ने इस फिल्म में अपने कंफर्ट जोन से बाहर आकर काम किया है। फिल्म क्रूज़ प्रोस्थेटिक्स, तोंद, कम होते बालों और दक्षिणी लहजे के नीचे छिपे हुए हैं। यह बदलाव सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है। डिगर घमंडी और अपनी मर्जी चलाने वाला इंसान है, उसकी दौलत ने उसे यह यकीन दिला दिया है कि हर समस्या की एक कीमत होती है। क्रूज ने इस किरदार को पूरे रौब के साथ निभाया है, लेकिन इसमें एक मजेदार कमजोरी भी है। वह दर्शकों की नजर में क्रूज की आम 'कूल' और संयमित छवि वाले हीरो जैसे नहीं हैं। डिगर बेतुका, मतलबी और कभी-कभी दयनीय भी लग सकता है।

मूर्ख दिखने की यही इच्छाशक्ति उनकी परफॉर्मेंस को असरदार बनाती है। ऐसा लगता है कि क्रूज़ यहां मजा कर रहे हैं, लेकिन साथ ही वे किरदार को गंभीरता से भी निभा रहे हैं। फिल्म में उन्हें ऐसे सीन करने हैं जो उनके हालिया मुख्यधारा के काम की तुलना में ज्यादा नाटकीय हैं, और वे पूरी तरह से इसमें डूब जाते हैं। सबसे खास हिस्सा एक लंबा मोनोलॉग (एकतरफा भाषण) है, जिसमें क्रूज़ का भाषण धीरे-धीरे और भी जोरदार होता जाता है। यह एक ऐसा सीन है जो आसानी से अपने ही बोझ तले दबकर बिगड़ सकता था, लेकिन क्रूज ने इसे अद्भुत नियंत्रण के साथ निभाया है। जैसे-जैसे भाषण में तेजी आती है, उनकी आवाज, हाव-भाव और शारीरिक हरकतें बदलती रहती हैं।

यह सीन शब्दों से ज्यादा, एक अभिनेता के परफॉर्मेंस में पूरी तरह से खो जाने को देखने के बारे में है। यह मोनोलॉग उन पलों में से एक है जहां 'डिगर' का अनोखा अंदाज़ सही साबित होता है। क्रूज हमेशा से अपनी शारीरिक मेहनत और समर्पण के लिए जाने जाते रहे हैं, मगर इस फिल्म में ये तीव्रता भाषा और अभिनय में दिखाई देती है। यह नाटकीय और बढ़ा-चढ़ाकर किया गया अभिनय है, जो फिल्म के मिजाज के बिल्कुल अनुकूल है।

डिगर: कास्ट में बहुत जोश है

क्रूज़ के आस-पास कई दमदार कलाकार हैं। रिज़ अहमद ने गणेश का रोल किया है, जो एक साइंटिस्ट है और उसे डिगर की सच्चाई का सामना न करने की आदत से निपटना पड़ता है। जॉन गुडमैन फिल्म की पॉलिटिकल दुनिया में अपनी खास गंभीरता लाते हैं, जबकि सैंड्रा हुलर ने एम्मा का रोल किया है, जो डिगर की सौतेली बहन और एक बिज़नेसवुमन है, जिसकी सोच डिगर से बिल्कुल अलग है।

जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, जेसी प्लेमन्स का रोल भी अहम हो जाता है। कलाकारों की एक्टिंग जान-बूझकर थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर की गई है। यह फिल्म हर सीन में नैचुरल कैरेक्टर ड्रामा दिखाने की कोशिश नहीं करती। इनारितु चाहते हैं कि उनके कलाकार भी उसी बढ़ी-चढ़ी दुनिया में रहें जिसमें डिगर खुद रहता है। यह कुछ दर्शकों को पसंद आएगा, तो कुछ को शायद नहीं।

आकर्षक है 'डिगर'

फिल्म में दिखाई गई चीजों के बारे में कोई कुछ भी सोचे, लेकिन 'डिगर' को साधारण दिखने वाली फिल्म कहना मुश्किल है। सिनेमैटोग्राफ़र इमैनुएल लुबेज़की ने फिल्म को एक बड़ा और शानदार विज़ुअल कैनवस दिया है, जबकि प्रोडक्शन डिजाइन ने 'डिगर' के आस-पास की बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई दुनिया को और भी खास बना दिया है। अमीर तेल व्यापारी का घर, राजनीतिक माहौल और धीरे-धीरे अजीब होती जा रही तबाही की तस्वीरें - ये सभी फिल्म के जानबूझकर बढ़ाए गए टोन में योगदान देते हैं।

फिल्म को देखते हुए हमेशा यह एहसास होता है कि उसे पता है कि वह कितनी नाटकीय है। यहीं पर 'डिगर' दर्शकों से थोड़ी ज़्यादा उम्मीदें रखती है। यह पारंपरिक तरीके से सिर्फ़ एक कहानी सुनाने तक सीमित नहीं रहती। यह लगातार नए विचार जोड़ती है, टोन बदलती है और कहानी कहने के तरीके पर ही ध्यान खींचती है। दर्शक इस तरह का रिस्क लेने वाली फिल्में पसंद करते हैं, उनके लिए यह बात फिल्म को आकर्षक बना सकती है। वहीं, कुछ लोगों को यह फिल्म थोड़ी ज्यादा ही दिखावटी लग सकती है।

'डिगर' हर किसी के लिए नहीं है

'डिगर' तब सबसे अच्छी लगती है जब क्रूज़ इसके केंद्र में होते हैं। उनका बदलाव, कॉमिक टाइमिंग और कमिटमेंट फिल्म को ज्यादातर एनर्जी देते हैं। खासकर, उनका मोनोलॉग दिखाता है कि क्रूज़ जैसे बड़े स्टार को ऐसे अनोखे रोल के लिए कास्ट करने का दांव क्यों सही था। फिल्म का स्तर हर जगह एक जैसा नहीं है। इसका कुछ व्यंग्य तीखा है, जबकि कुछ हिस्से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए लगते हैं। पर्यावरण से जुड़ा संदेश शुरू से ही साफ है और फिल्म को इसे बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं है। इसका अनोखा दूसरा हाफ कुछ दर्शकों को दिलचस्प लग सकता है, जबकि दूसरों का सब्र आजमा सकता है। इसी वजह से 'डिगर' को आम हॉलीवुड एंटरटेनर की श्रेणी में रखना मुश्किल है। इसमें स्टूडियो फिल्म जैसा बड़े पैमाने का काम है, लेकिन इसका मिजाज कुछ बहुत ही अजीब है। और शायद यही इसका मकसद भी है।

साफ़ है कि क्रूज यहां एक रिस्क ले रहे हैं। सालों तक ऐसे किरदार निभाने के बाद जो नामुमकिन कारनामों से दुनिया को बचाते हैं, अब वह एक ऐसे आदमी का रोल कर रहे हैं जिसने दुनिया को तबाही की ओर धकेलने में मदद की और फिर उससे जुड़ी कहानी को अपने हिसाब से चलाना चाहता है। यह टॉम क्रूज की एक बहुत अलग तरह की फिल्म है।

'डिगर' का फैसला

'डिगर' को अपनी सही रेटिंग इसलिए मिलती है क्योंकि इसमें तारीफ करने लायक बहुत कुछ है, भले ही फिल्म अपने सभी विचारों को हमेशा ठीक से एक साथ नहीं जोड़ पाती। क्रूज़ की एक्टिंग इसे देखने की मुख्य वजह है। वे पूरी तरह से उस किरदार में ढल जाते हैं और 'डिगर' की जबरदस्त पर्सनैलिटी को अपनाते हैं, बिना उसे आम हीरो जैसा दिखाने की कोशिश किए। लंबा मोनोलॉग (अकेले बोला गया लंबा संवाद) खास तौर पर प्रभावशाली है और एक्टर को डायलॉग, टाइमिंग और फ़िज़िकल परफॉर्मेंस पर अपनी पकड़ दिखाने का एक अनोखा मौका देता है। वहीं, इनारितु फिल्म को एक खास विज़ुअल पहचान और इतना बड़ा विज़न देते हैं कि यह आम डिज़ास्टर फ़िल्मों से अलग नजर आती है। 'डिगर' हर किसी के लिए नहीं है। इसका खुला मजाक, अनोखा स्ट्रक्चर और जान-बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया अंदाज दर्शकों की राय को बांट सकता है। लेकिन यह किसी आम स्टार-केंद्रित फिल्म से कहीं ज्यादा साहसी है, और क्रूज का ऐसे अजीब किरदार को निभाने का फैसला इस फिल्म को देखने लायक बनाता है। हो सकता है कि इसे हमेशा यह पता न हो कि कब रुकना है, लेकिन इसके अंदर इतना कुछ छिपा है जो इस सफर को सार्थक बनाता है।

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