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Jeevan Ya Bheema Con Review: जिंदा आदमी की मौत, हमशक्ल की लाश और करोड़ों का बीमा, आइडिया में दम, लेकिन फिल्म पानी कम

 Written By: jaya Dwivedie
 Published : Sep 04, 2026 06:31 pm IST,  Updated : Sep 04, 2026 06:31 pm IST

‘जीवन बीमा योजन’ का आइडिया दिलचस्प है और अरशद वारसी समेत कलाकारों का अभिनय मजबूत है, लेकिन कमजोर कॉमेडी, दोहराव, खिंची कहानी और अनुमानित क्लाइमैक्स फिल्म को औसत मनोरंजन से आगे नहीं बढ़ने देते।

Jeevan Ya Bheema Con
अरशद वारसी। Photo: ARSHAD_WARSI/INSTAGRAM
  • फिल्म रिव्यू: जीवन या बीमा कॉन
  • स्टार रेटिंग 2/5
  • पर्दे पर: 04/09/2026
  • डायरेक्टर: अभिषेक डोगरा
  • शैली: कॉमेडी

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनका बेसिक आइडिया सुनते ही लगता है कि इससे एक मजेदार और तेज-तर्रार कहानी निकाली जा सकती है। ‘जीवन या बीमा कॉन’ भी इसी कैटेगरी में आती है। फिल्म की शुरुआत एक ऐसी स्थिति से होती है, जहां दर्शक तुरंत जानना चाहता है कि आखिर मामला क्या है और किरदार इस अजीबोगरीब परिस्थिति तक पहुंचे कैसे। कहानी में गलत पहचान, पैसों की जरूरत, धोखे और अपराध का ऐसा मिश्रण तैयार किया गया है, जिसमें कॉमेडी की अच्छी संभावनाएं थीं। लेकिन फिल्म जितना मजबूत अपना कॉन्सेप्ट लेकर शुरू होती है, उतना प्रभावी ढंग से उसे आगे नहीं ले जा पाती। कुछ हिस्सों में हंसी आती है, कलाकार माहौल संभालते हैं, लेकिन कुल मिलाकर फिल्म एक ऐसी कॉमेडी बनकर रह जाती है जिसमें मजेदार आइडिया तो है, मगर उसे लगातार मनोरंजक बनाए रखने वाली पकड़ गायब है।

क्या है ‘जीवन या बीमा कॉन’ की कहानी?

फिल्म की कहानी जीवन (अरशद वारसी) और योजना (संजीदा शेख) नाम के एक शादीशुदा जोड़े के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों आर्थिक परेशानियों और कर्ज के बोझ से जूझ रहे हैं और इसी समस्या से निकलने के लिए एक ऐसा प्लान बनाते हैं, जो पहली नजर में उन्हें काफी चालाकी भरा समाधान लगता है। जीवन अपनी मौत का नाटक करने का फैसला करता है और उसकी जगह एक ऐसे शख्स की लाश का इस्तेमाल किया जाता है, जो शक्ल से बिल्कुल उसी जैसा दिखाई देता है। इस तरह दोनों का मकसद जीवन की बीमा राशि हासिल करना है, लेकिन किसी भी गलत तरीके से किए गए प्लान की तरह यहां भी मामला उम्मीद के मुताबिक नहीं चलता। जिस शख्स को मृत बताकर पूरा खेल रचा गया है, वह वास्तव में भीमा है और उसका अतीत इस दंपति की कल्पना से कहीं ज्यादा पेचीदा है। भीमा का संबंध हीरों की तस्करी से है और उसके पीछे कुछ ऐसे लोग पड़े हैं, जिन्हें अपने हीरे वापस चाहिए। यहीं से जीवन और योजना के घर में मुसीबतों का सिलसिला शुरू होता है। 

विनायक और मनु नाम के दो लोग इस घर में पहुंचते हैं। उनका मानना है कि भीमा उनके हीरे लेकर फरार हुआ है। अब उनके सामने मौजूद शख्स कौन है, यही सवाल कहानी के हास्य और भ्रम का मुख्य आधार बनता है। क्या वह जीवन है या भीमा? जीवन और योजना अपने बीमा के पैसे तक पहुंच पाएंगे या नहीं? और गायब हीरों का क्या हुआ? फिल्म इन्हीं सवालों के जरिए अपनी कहानी को आगे बढ़ाती है। कहानी में बीमा कंपनी की जांच भी जोड़ी गई है। बीमा की बड़ी रकम हासिल करने के लिए योजना को जांच से बचना है, वहीं घर की मालकिन यशिका की अपनी अलग दिलचस्पी है। इसके साथ पुलिस और अपराधियों की एंट्री कहानी में दांव बढ़ाने की कोशिश करती है। यानी फिल्म के पास घटनाओं की कमी नहीं है, समस्या यह है कि इन सभी हिस्सों को एक मजबूत कॉमिक नैरेटिव में पिरोने का काम उतना असरदार नहीं हो पाया।

अभिनय

अभिनय के मामले में फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अरशद वारसी हैं। डबल रोल में वह जीवन और भीमा के बीच फर्क पैदा करने की कोशिश करते हैं और दोनों किरदारों को अलग ऊर्जा देते हैं। जीवन की घबराहट, मजबूरी और अपने बनाए जाल में फंसने वाली बेचैनी अरशद के अभिनय में दिखाई देती है। वहीं भीमा के हिस्से में उनका अंदाज थोड़ा अलग है। अरशद फिल्म के कमजोर हिस्सों में भी अपनी ऊर्जा बनाए रखते हैं और कई बार ऐसा लगता है कि वह अपने अभिनय के दम पर उस दृश्य को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जहां लेखन उतना साथ नहीं देता। संजीदा शेख ने योजना के किरदार में अरशद का साथ दिया है। दोनों के बीच पति-पत्नी की केमिस्ट्री स्वाभाविक लगती है और कई दृश्यों में उनका तालमेल फिल्म को संभालता है। हालांकि योजना का किरदार जिस तरह लिखा गया है, उसमें उसकी समझदारी और प्लानिंग के बजाय कई बार उसके फैसले कहानी को आगे बढ़ाने का आसान जरिया लगते हैं। इससे किरदार में वह मजबूती नहीं आ पाती, जिसकी इस तरह की कहानी में जरूरत थी।

विजय राज विनायक के रोल में अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हैं। उनके किरदार में डर और हास्य दोनों को साथ रखने की कोशिश की गई है और विजय राज इसे निभाने में सक्षम भी हैं। बृजेंद्र काला के साथ उनकी जोड़ी कई जगह मजेदार लगती है। दोनों की स्क्रीन केमिस्ट्री अच्छी है, लेकिन लगातार एक जैसे कॉमिक बीट्स इस्तेमाल होने की वजह से उनका ट्रैक धीरे-धीरे दोहराव का शिकार हो जाता है। पूजा चोपड़ा यशिका के रूप में ठीक हैं, लेकिन उनका किरदार कहानी में बहुत बड़ा योगदान नहीं देता। उनके हिस्से के कुछ ट्रैक ऐसे लगते हैं जिन्हें कम या बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता था।

निर्देशन

अभिषेक डोगरा ने कहानी को एक सीमित लोकेशन में रखने का फैसला किया है। फिल्म का बड़ा हिस्सा एक ही घर के भीतर घटता है। ऐसा सेटअप अपने आप में समस्या नहीं है। अगर स्क्रिप्ट मजबूत हो, तो एक कमरे या घर के भीतर भी बेहतरीन कॉमेडी और थ्रिल पैदा किया जा सकता है। लेकिन यहां निर्देशक के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि सीमित सेटिंग के बावजूद दर्शकों की दिलचस्पी लगातार बनी रहे।

शुरुआत में फिल्म यह काम कर लेती है। फेक डेथ, डुप्लीकेट और बीमा घोटाले का सेटअप जिज्ञासा पैदा करता है। जैसे-जैसे नए किरदार घर में दाखिल होते हैं, स्थिति और उलझती है। लेकिन कुछ समय बाद कहानी उसी तरह के भ्रम और गलतफहमी को बार-बार दोहराने लगती है। निर्देशक के पास कई संभावनाएं थीं, खासकर जीवन और भीमा की पहचान को लेकर पैदा होने वाले शक को ज्यादा मजेदार और तनावपूर्ण बनाया जा सकता था। फिल्म का स्क्रीनप्ले भी कई जगह अपने ही सेटअप का फायदा नहीं उठा पाता। कहानी को लगातार नए मोड़ देने की कोशिश तो होती है, लेकिन हर मोड़ उतना प्रभाव नहीं छोड़ता। नतीजा यह होता है कि सेकंड हाफ में फिल्म की गति कम महसूस होने लगती है।

टेक्नीकिल पार्ट

तकनीकी स्तर पर फिल्म बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा लेकर नहीं चलती। चूंकि कहानी का अधिकांश हिस्सा एक घर के भीतर है, इसलिए सिनेमैटोग्राफी का काम मुख्य रूप से उसी सीमित स्पेस को अलग-अलग एंगल और फ्रेमिंग के जरिए जीवंत बनाए रखना है। कैमरा वर्क जरूरत के मुताबिक है और फिल्म के कॉमिक मूड को सपोर्ट करता है। प्रोडक्शन डिजाइन कहानी के घरेलू माहौल को स्थापित करता है, लेकिन विजुअली ऐसा कुछ खास नहीं है जो फिल्म को अलग पहचान दे। बैकग्राउंड स्कोर कुछ दृश्यों में कॉमिक टाइमिंग को बढ़ाने का काम करता है। एडिटिंग की जरूरत यहां सबसे ज्यादा महसूस होती है, क्योंकि कुछ दृश्यों को ज्यादा देर तक खींचा गया है। एक कॉमेडी फिल्म में टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण होती है और किसी गैग के जरूरत से ज्यादा लंबा चलने पर उसका असर तुरंत कम हो जाता है। साउंड डिजाइन का इस्तेमाल भी कई जगह कॉमेडी पैदा करने के लिए किया गया है, लेकिन कुछ साउंड-बेस्ड जोक्स जरूरत से ज्यादा दोहराए जाते हैं।

क्या नहीं किया काम?

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कॉमेडी है। कॉमेडी का बेसिक सेटअप मौजूद है, कलाकार भी सक्षम हैं, लेकिन हर जोक का असर बराबर नहीं है। शुरुआत में कुछ वन-लाइनर्स और परिस्थितिजन्य हास्य काम करते हैं, लेकिन आगे चलकर वही तरह की गलतफहमी और प्रतिक्रिया बार-बार सामने आती है। टॉयलेट ह्यूमर और फार्ट जोक्स का इस्तेमाल भी फिल्म को हल्का-फुल्का बनाने के लिए किया गया है, लेकिन ये चुटकुले कहानी का हिस्सा बनने के बजाय जबरदस्ती जोड़े हुए महसूस होते हैं। खासकर जब फिल्म का मुख्य कॉन्सेप्ट ही इतना दिलचस्प हो, तब इस तरह के आसान हास्य पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता खटकती है।

दूसरी समस्या यह है कि फिल्म में कई सब-प्लॉट मौजूद हैं, लेकिन सभी को बराबर मजबूती नहीं मिलती। बीमा जांच, हीरों की तलाश, पुलिस और अपराधियों की मौजूदगी जैसे हिस्से कहानी का दायरा बढ़ाते हैं, लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि फिल्म एक साथ बहुत कुछ करने की कोशिश कर रही है। क्लाइमैक्स भी उस स्तर का प्रभाव नहीं छोड़ता, जिसकी शुरुआत से उम्मीद बनती है। कुछ चीजें पहले ही समझ में आने लगती हैं और अंतिम खुलासे में वह सरप्राइज नहीं मिलता, जिसकी इस तरह की मिस्ट्री-कॉमेडी को जरूरत होती है।

फाइनल वर्डिक्ट

‘जीवन या बीमा कॉन’ न तो पूरी तरह बेकार कॉमेडी है और न ही ऐसी फिल्म जिसे याद रखा जाएगा। इसका आइडिया मजेदार है, अरशद वारसी पूरी फिल्म में ऊर्जा बनाए रखते हैं और विजय राज-बृजेंद्र काला जैसे कलाकार कई दृश्यों को संभाल लेते हैं। फिल्म का पहला हिस्सा भी कुछ हद तक उम्मीद जगाता है। लेकिन कमजोर और दोहराव भरी कॉमेडी, खिंचे हुए दृश्य, सीमित सेटिंग का सही इस्तेमाल न कर पाना और अनुमान लगाने लायक क्लाइमैक्स फिल्म का असर कम कर देते हैं। सबसे बड़ी परेशानी यही है कि फिल्म के पास एक ऐसी कहानी थी, जिससे कहीं ज्यादा मजेदार और स्मार्ट कॉमेडी बनाई जा सकती थी। अगर आप बिना ज्यादा दिमाग लगाए हल्की-फुल्की, कलाकारों पर निर्भर कॉमेडी देखना चाहते हैं तो फिल्म कुछ पल मनोरंजन दे सकती है। लेकिन अगर उम्मीद एक टाइट, लगातार हंसाने वाली और चतुर क्राइम-कॉमेडी की है तो ‘जीवन बीमा योजन’ निराश करेगी।

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