26/11 की कहानी को पर्दे पर और पर्दे के बाहर कई बार बताया जा चुका है। उस रात मुंबई में जो कुछ हुआ, वह देश की सामूहिक याददाश्त में हमेशा के लिए दर्ज हो गया है। 'प्रहार: द उज्ज्वल निकम स्टोरी' में, निर्देशक अविनाश अरुण अपना ध्यान उस कानूनी लड़ाई की ओर ले जाते हैं जो इस घटना के बाद शुरू हुई थी। यह फिल्म उन लोगों पर केंद्रित है, जिन्होंने भारत के हालिया इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक के बाद, न्याय दिलाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई। यह एक ऐसी कहानी है जिसे फिर से देखा जाना चाहिए। दिक्कत यह है कि फिल्म उस हिस्से तक पहुंचने में बहुत ज्यादा समय लेती है, जो असल में पूरी कहानी को बांधे रखने का काम करता है। फिल्म का दूसरा हिस्सा अपनी लय पकड़ लेता है, लेकिन तब तक, इंतजार करना ही अपने आप में एक समस्या बन जाता है। फिल्म का विषय मज़बूत है और कुछ कलाकारों ने बेहतरीन काम भी किया है, फिर भी यह उस तरह का दमदार लीगल ड्रामा नहीं बन पाती, जो यह बन सकती थी।
कहानी: 26/11 की घटनाओं को फिर से दिखाने से कहीं बढ़कर
यह फिल्म 26/11 हमलों के दौरान जिंदा पकड़े गए इकलौते आतंकवादी अजमल कसाब के मुकदमे में उज्ज्वल निकम की भूमिका पर केंद्रित है। मुकदमे के साथ-साथ, यह फिल्म निकम के पारिवारिक जीवन को भी दिखाती है, और उन व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को उजागर करती है जो एक ऐसे पेशे के साथ आती हैं, जहां दांव पर हमेशा बहुत कुछ लगा होता है। इसकी रूपरेखा जानी-पहचानी है, और जो लोग कसाब के मुकदमे से जुड़ी घटनाओं के बारे में जानते हैं, उनके लिए इस कहानी में कोई बड़ा सरप्राइज नहीं है। लेकिन, जब कोई फिल्म इतिहास के पहले से ज्ञात अध्याय में कुछ सार्थक जोड़ती है, तो कहानी का पहले से पता होना कोई कमजोरी नहीं रह जाती।
घटनाओं के बाद के कुछ ऐसे पहलू हैं जिन्हें याद रखा जाना चाहिए, खासकर ऐसे समय में जब लोगों का ध्यान अक्सर केवल हमलों पर ही केंद्रित रहता है। 'प्रहार' इन्हीं में से कुछ पहलुओं को फिर से सामने लाने की कोशिश करती है। इसका मकसद दर्शकों को सिर्फ फिर से गुस्से से भर देना नहीं है, बल्कि उन लोगों को सम्मान देना है जिन्होंने डर, अनिश्चितता और निजी नुकसान के बावजूद अपना काम जारी रखा। यहीं पर फिल्म अपना मकसद हासिल करती है। यह उन लोगों पर ध्यान देती है जो जरूरत के समय सामने आए, अपनी जिम्मेदारियों को समझा और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपना काम करते रहे।
लेखन और निर्देशन: कोर्टरूम ड्रामा में समय लगता है
अगर कोई यह उम्मीद कर रहा है कि फिल्म में दो 'काबिल वकीलों' के बीच तीखी बहस देखने को मिलेगी, तो अविनाश अरुण की यह फिल्म उन्हें निराश कर सकती है। अभियोजन पक्ष (prosecution) और बचाव पक्ष (defence) के बीच की बातचीत में वह धार या गहमागहमी नहीं है, जो इस मुकदमे को वाकई दिलचस्प बना सकती थी। एक हाई-प्रोफाइल आतंकी मामले पर बनी फिल्म होने के बावजूद, इसके कोर्टरूम सीन काफी संयमित हैं। एक वकील अपनी बात रखता है और फिल्म आगे बढ़ जाती है, यहां बहस को एक रोमांचक मुकाबले में बदलने का मौका नहीं दिया गया है। राजकुमार राव द्वारा निभाए गए निकम के किरदार को भी कहानी के मुख्य केंद्र में आने में काफी समय लगता है।
सबसे मजबूत दलीलों को दूसरे हाफ के लिए बचाकर रखना एक समझदारी भरा फैसला हो सकता है। लेकिन, दर्शकों को कहानी से जोड़े रखने के लिए बीच-बीच में कुछ दिलचस्प चीजें देना भी जरूरी होता है। यहां इंतजार जरूरत से ज़्यादा लंबा है, और जब कोर्टरूम का वह अहम पल आता है, तो वह उस पूरे माहौल या 'बिल्ड-अप' के हिसाब से उतना असरदार नहीं लगता। बैकग्राउंड में बजने वाले ड्रमों का ज़िक्र करना जरूरी है। ये एक ऐसी उम्मीद जगाते हैं कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है, चाहे वह कोई बड़ा खुलासा हो या कार्यवाही में कोई नाटकीय मोड़। कई बार तो संगीत अपना काम बहुत अच्छे से करता है, लेकिन कई बार स्थिति 'खोदा पहाड़, निकली चुहिया' वाली हो जाती है, यानी इतना सारा माहौल बनाया गया, पर अंत में जो हुआ वह उसके मुकाबले बहुत फीका था। हालांकि, फिल्म में कुछ खूबियां भी हैं। परिवार वाले दृश्य 'निकम' को कोर्टरूम के बाहर भी एक जिंदगी देते हैं, और फिल्म में इन्हें शामिल करना एक सही फैसला था। दिक्कत बस यह है कि कहानी के इस हिस्से को ठीक से नहीं दिखाया गया है, जिसकी वजह से कुछ किरदारों और उप-कहानियों (सबप्लॉट्स) का कोई ठोस अंजाम नहीं मिल पाता।
अभिनय: राजकुमार राव उज्ज्वल निकम तो बन जाते हैं, लेकिन बाजी ललित प्रभाकर मार ले जाते हैं
राजकुमार राव सिर्फ उज्ज्वल निकम का किरदार नहीं निभाते, बल्कि वे सचमुच उनके जैसा बनने की पूरी कोशिश करते हैं। उनके चलने-फिरने के अंदाज से लेकर बातचीत के तरीके, बीच-बीच में रुकने के अंदाज और कोर्टरूम में उनके बर्ताव तक, राव ने स्क्रीन पर सरकारी वकील (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) के व्यक्तित्व को फिर से जीवंत करने का काम किया है। उन्होंने निकम के हाव-भाव को पकड़ने की कोशिश तो की है, लेकिन इसे कभी भी एक बढ़ा-चढ़ाकर की गई नकल नहीं बनने दिया। उन्होंने अपने किरदार में पूरी जान डाल दी है, भले ही पटकथा (स्क्रीनप्ले) में उन्हें कोर्टरूम के ऐसे दमदार संवाद या मौके नहीं मिले, जिनसे वे अपने किरदार की कानूनी काबिलियत को पूरी तरह दिखा पाते।
हालांकि, अभिनय के मामले में जो कलाकार शायद राव से भी आगे निकल जाते हैं, वे हैं ललित प्रभाकर, जिन्होंने अजमल कसाब का किरदार निभाया है। 21 साल के उस युवक के रूप में, जिसका ब्रेनवॉश कर दिया गया था और जो एक बेरहम कातिल बन जाता है, उनका अभिनय बेहद प्रभावशाली और विचलित करने वाला है। उन्होंने कसाब के भीतर के विरोधाभासों को बहुत बारीकी से पकड़ा है—उसकी कंडीशनिंग, उलझन, क्रूरता और ठंडे दिमाग से की गई हरकतों को उन्होंने इस तरह पेश किया है कि किरदार एकतरफा नहीं लगता। यहाँ एक ऐसे नौजवान की बेचैन कर देने वाली तस्वीर उभरती है, जिसकी इंसानियत को गलत शिक्षा और विचारधारा (इंडॉक्ट्रिनेशन) ने विकृत कर दिया है; हालांकि, उसके द्वारा की गई बर्बरता को भी नजरअंदाज करना नामुमकिन है।
प्रभाकर की एक्टिंग इसलिए बहुत असरदार है क्योंकि उन्होंने कसाब को सिर्फ 'बुराई की एक मिसाल' (caricature) बनाकर नहीं छोड़ दिया है। उन्होंने इस किरदार के भीतर मौजूद बेचैन करने वाले दोहरेपन को सामने आने दिया है, जिसकी वजह से कुछ दृश्यों को देखना मुश्किल हो जाता है। नतीजा यह है कि उनकी एक्टिंग सीन खत्म होने के काफी देर बाद भी आपके ज़हन में बनी रहती है।
अब्बास काज़मी के रोल में सिकंदर खेर भी काफी दमदार लगे हैं। राव के सामने वे पूरी मजबूती से टिके रहते हैं और कोर्टरूम की कार्यवाही में अहम भूमिका निभाने वाले अपने किरदार को पूरी सच्चाई और विश्वास के साथ पेश करते हैं। खेर में दर्शकों के दिलों-दिमाग में उतर जाने की खूबी है, जिससे उनके संवाद और भी निजी और प्रभावशाली लगने लगते हैं। उनकी एक्टिंग फिल्म के कानूनी टकराव में एक और परत जोड़ती है, और जब भी उन्हें अपनी बात रखने का मौका मिलता है, तो कोर्टरूम के दृश्य और भी दिलचस्प हो जाते हैं।
ज़ुल्फिकार के रोल में जयदीप अहलावत ने कहानी में एक भावनात्मक गहराई जोड़ी है। उनका किरदार दर्शकों को 'इक्कीस' (Ikkis) में दिखाए गए मानवीय संघर्ष की याद दिला सकता है, पाकिस्तान का एक ऐसा व्यक्ति जो निष्पक्ष लड़ाई में यकीन रखता है और चाहता है कि न्याय उसके सही आधार पर मिले। अहलावत ने इस किरदार को बहुत ही सादगी और ईमानदारी से निभाया है। उन्होंने अपने किरदार को भारत बनाम पाकिस्तान की उस आम और सीमित सोच से ऊपर उठाया है, जिसमें अक्सर ऐसी कहानियाँ उलझकर रह जाती हैं।
फिल्म के कुछ सबसे निजी और भावुक पल परिवार के आपसी रिश्तों से जुड़े हैं। हालांकि निकम की पत्नी के रूप में वामिका गब्बी को बहुत कम मौका मिला है, लेकिन राव और उनके बेटे का किरदार निभाने वाले ऋत्विक सहोरे के बीच की केमिस्ट्री काफी असरदार है। पिता-बेटे के रिश्ते को जिस तरह से लिखा गया है, वह आज के समय के हिसाब से बहुत प्रासंगिक है। यह दिखाता है कि अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए समर्पित जीवन में इंसान को निजी स्तर पर क्या कुछ खोना पड़ता है। इन दृश्यों की बदौलत निकम का किरदार सिर्फ एक 'सार्वजनिक पहचान' तक सीमित न रहकर, उससे कहीं अधिक गहरा और मानवीय बन जाता है।
दुर्भाग्य से, वामिका गब्बी के पास करने के लिए बहुत कम चीजें हैं। उनके किरदार को न तो स्क्रीन पर पर्याप्त समय मिला और न ही कहानी में कोई संतोषजनक अंत। उनके ट्यूमर और उससे उबरने से जुड़ा उप-प्लॉट (सब-प्लॉट) भी अधूरा ही रह जाता है। क्लाइमैक्स में उनका न होना यह साफ कर देता है कि कहानी का यह हिस्सा कितना कमजोर और अधूरा है। आशीष विद्यार्थी जज के रोल में भरोसेमंद लगे हैं और उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। हालांकि, जो दर्शक 'जॉली एलएलबी' में सौरभ शुक्ला के यादगार कोर्टरूम अंदाज जैसी उम्मीदें लगाए बैठे हैं, उन्हें अपनी उम्मीदें थोड़ी कम रखनी चाहिए। फिल्म के संवादों में आशीष विद्यार्थी को ऐसे कोई खास या दमदार डायलॉग नहीं मिले हैं, जिससे उनका किरदार वाकई यादगार बन सके।
क्या काम नहीं करता?
फिल्म का पहला हिस्सा इसकी सबसे बड़ी रुकावट है। ट्रायल की कार्यवाही तक पहुंचने में बहुत समय लग जाता है, और जब यह शुरू होती भी है, तो इसमें होने वाली बातचीत इतनी दिलचस्प नहीं होती कि इस देरी की भरपाई कर सके। दूसरा हिस्सा बेहतर है, लेकिन क्लाइमैक्स वह असर नहीं छोड़ पाता जिसका फिल्म ने वादा किया था। लेखन में भी कई दिलचस्प पहलुओं को ठीक से विकसित नहीं किया गया है। निकम के परिवार को कहानी में और गहराई दी जा सकती थी, और कानूनी कार्यवाही के दौरान उन तर्कों और चुनौतियों को बेहतर ढंग से दिखाया जा सकता था जिन्होंने इस केस को आकार दिया। इसके बजाय, फिल्म ने सतही तौर पर ही काम चला लिया, जबकि थोड़ी और डिटेल इसे कहीं अधिक प्रभावशाली बना सकती थी।
फिल्म में सहायक किरदारों को पेश करने के मामले में भी एक मौका चूक गया है। खासकर गैबी के किरदार पर और अधिक ध्यान देने की जरूरत थी। उसकी कहानी की शुरुआत में भावनात्मक गहराई आने की संभावना दिखती है, लेकिन बाद में उसे अधूरा ही छोड़ दिया गया। इसके अलावा, हालांकि बैकग्राउंड स्कोर असरदार है, लेकिन फिल्म में एक गाना भी है जो दर्शकों से जुड़ नहीं पाता। यहीं पर मनोज बाजपेयी की 'सिर्फ एक बंदा काफी है' हमेशा अलग और बेहतर नजर आती है।
निष्कर्ष: एक ऐसी कहानी जो बेहतर फिल्म की हकदार थी
अपनी तमाम कमियों के बावजूद, 'प्रहार: द उज्ज्वल निकम स्टोरी' एक अहम बात सामने रखती है। यह दर्शकों से अपील करती है कि वे सिर्फ मुकदमे तक सीमित न रहें, बल्कि मुंबई और वहां के लोगों के बारे में भी सोचें, जिनमें से कई लोगों ने अपनों को खोया, डर और सदमे के साथ जिए, और फिर भी जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता खोज निकाला। यह फिल्म उन लोगों को श्रद्धांजलि देती है जिन्होंने अपने डर से ऊपर अपनी जिम्मेदारियों को रखा, जिन्होंने देश के संवैधानिक मूल्यों पर भरोसा बनाए रखा, और जिन्होंने तब भी अपना काम जारी रखा जब उन्हें इसके लिए भारी निजी कीमत चुकानी पड़ी। यह फिल्म इस बात पर भी जोर देती है कि न्याय केवल गुस्से के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान के दायरे में रहकर मिलना चाहिए। यह एक ऐसा संदेश है जिस पर फिर से विचार किया जाना चाहिए, खासकर तब जब वे घटनाएं आज भी उतनी ही दर्दनाक लगती हैं।
फिल्म की नीयत नेक है, और कलाकारों खासकर राजकुमार राव, ललित प्रभाकर और खेर के अभिनय ने इसे काफी मजबूती दी है। लेकिन इतनी बड़ी कहानी के लिए एक ज्यादा दिलचस्प पटकथा (स्क्रीनप्ले) और ऐसा कोर्टरूम ड्रामा चाहिए था, जो उन वास्तविक घटनाओं के स्तर पर खरा उतर सके जिन्हें यह फिल्म दिखाना चाहती है। 'प्रहार: द उज्ज्वल निकम स्टोरी' को उस कहानी और उन लोगों को याद करने के लिए देखा जा सकता है जिन्हें यह फिल्म सामने लाती है। हालांकि, एक कोर्टरूम ड्रामा के तौर पर यह फिल्म उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। इसलिए, इसे 5 में से 2.5 स्टार दिए जाते हैं।
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