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Rajni Ki Baraat Review: रूढ़ियों को तोड़ती 'रजनी', महिलाओं के आत्मसम्मान को बयां करती एक ईमानदार कोशिश

 Written By: जया द्विवेदी
 Published : May 27, 2026 02:10 pm IST,  Updated : May 27, 2026 02:11 pm IST

'रजनी की बारात' बिहार के दरभंगा की पृष्ठभूमि पर बनी एक पारिवारिक फिल्म है। यह कहानी आत्मसम्मान और सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देती एक साहसी लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है। शानदार अभिनय और बेहतरीन निर्देशन के बावजूद कुछ खामियां भी हैं।

rajni ki barat
रजनी की बारात। Photo: IMDB
  • फिल्म रिव्यू: रजनी की बारात
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 29/05/2029
  • डायरेक्टर: आदित्य अमन
  • शैली: सामाजिक ड्रामा

भारतीय सिनेमा में छोटे शहरों और ग्रामीण परिवेश की कहानियों का हमेशा से एक विशेष स्थान रहा है। जब भी रुपहले पर्दे पर किसी छोटे शहर की मिट्टी की सोंधी खुशबू, पारिवारिक रिश्तों का ताना-बाना और रोजमर्रा के संघर्षों को उतारा जाता है, तो दर्शक खुद को उस कहानी के बेहद करीब पाते हैं। हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म 'रजनी की बारात' भी इसी फेहरिस्त में शामिल होने का एक नया प्रयास है। यह फिल्म एक ऐसी सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि पर आधारित है, जो आज के बदलते दौर में महिलाओं के आत्मसम्मान, उनके अधिकारों और समाज की रूढ़िवादी सोच को एक नए नजरिए से देखने की कोशिश करती है।

अक्सर बॉलीवुड में शादियों और बारात को लेकर कई तरह के ताने-बाने बुने गए हैं, लेकिन इस फिल्म का शीर्षक ही अपने आप में एक अनोखा कौतूहल पैदा करता है। यह फिल्म सिर्फ एक पारंपरिक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह रूढ़ियों को तोड़ती एक लड़की के आत्मविश्वास और उसके साहसिक फैसलों की बानगी पेश करती है। हालांकि क्या यह फिल्म अपने इस अनूठे विषय और सामाजिक संदेश को पूरी तरह से पर्दे पर उतारने में कामयाब रही है या फिर यह सिर्फ एक अच्छी सोच बनकर रह गई? आइए इस विस्तृत समीक्षा के माध्यम से फिल्म के हर पहलू को गहराई से समझते हैं।

प्लॉट

फिल्म की कहानी बिहार के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक शहर दरभंगा की गलियों से होकर गुज़रती है। कहानी के केंद्र में है रजनी (उल्का गुप्ता), जो एक बेबाक, जिद्दी, आत्मनिर्भर और साफ दिल की लड़की है। रजनी ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था, जिसके बाद उसकी परवरिश उसकी मां (सुनीता राजवार) और दादी (जरीना वहाब) ने मिलकर की है। तीन अलग-अलग पीढ़ियों की महिलाओं से सजे इस घर में रजनी को अपनी बात खुलकर रखने की पूरी आज़ादी मिली है। फिल्म की शुरुआत एक बेहद भावुक और सजीव दृश्य से होती है, जहां रजनी अपने दिवंगत पिता के पुराने स्कूटर के पास बैठकर उससे बातें करती है। यह दृश्य दर्शकों को रजनी के अकेलेपन और अपने पिता के प्रति उसके गहरे जुड़ाव से तुरंत जोड़ देता है।

रजनी की जिंदगी में नया मोड़ तब आता है जब उसे रज्जन (कनिष्क विजय) से प्यार हो जाता है। रज्जन स्वभाव से बेहद सीधा, शर्मीला और संकोची है। दोनों का यह विपरीत स्वभाव ही उनके प्यार को एक अलग रंग देता है। लेकिन, एक छोटे शहर की प्रेम कहानी इतनी आसान कहां होती है? कहानी में असली टकराव और ड्रामा तब शुरू होता है, जब रज्जन के पिता मलखान सिंह (अश्वथ भट्ट) की एंट्री होती है। मलखान सिंह शहर के एक रसूखदार और दबंग दरोगा हैं, जिनका पूरे इलाके में खौफ है। वह अपने बेटे के सीधेपन का फायदा उठाते हैं और उसका रिश्ता उसकी मर्जी के खिलाफ एक बड़े और अमीर खानदान की लड़की राधा (इशिता सिंह) से तय कर देते हैं।

पिता के कड़े और रौबदार स्वभाव के आगे रज्जन की बोलने की हिम्मत नहीं होती। वह अपने प्यार के लिए स्टैंड लेने में नाकाम रहता है। लेकिन रजनी, मलखान सिंह के इस फैसले के आगे घुटने टेकने से साफ मना कर देती है। जब परिस्थितियाँ पूरी तरह से रजनी और रज्जन के खिलाफ हो जाती हैं और समाज व परिवार उनकी राह में रोड़े अटकाने लगता है, तब रजनी एक ऐसा क्रांतिकारी और अप्रत्याशित कदम उठाने का फैसला करती है जो पूरे शहर को चौंका देता है, वह खुद अपनी बारात लेकर रज्जन के द्वार पर जाने की ठान लेती है। यहीं से फिल्म एक बेहद दिलचस्प और मनोरंजक मोड़ लेती है, जहां छोटे शहर की रूढ़िवादी मानसिकता, मान-सम्मान और प्यार की जंग के बीच एक अनोखा ड्रामा देखने को मिलता है।

अभिनय और परफॉर्मेंस

अभिनय के मोर्चे पर यह फिल्म काफी हद तक संतुलित और प्रभावी नज़र आती है। मुख्य भूमिका में उल्का गुप्ता ने रजनी के किरदार को पूरी शिद्दत और ईमानदारी के साथ जिया है। टीवी की दुनिया से अपनी पहचान बनाने वाली उल्का ने बड़े पर्दे पर अपनी इस भूमिका में मासूमियत और मजबूती का एक बेहतरीन संतुलन पेश किया है। उनके चेहरे के हाव-भाव, संवाद अदायगी और खासकर भावुक दृश्यों में उनका ठहराव दर्शकों को प्रभावित करता है। उन्होंने एक ऐसी लड़की के किरदार को बखूबी जिया है जो पारंपरिक बंधनों को चुनौती तो देती है, लेकिन अपनी जड़ों से भी जुड़ी रहती है।

फिल्म में खलनायक और एक सख्त पिता के रूप में अश्वथ भट्ट ने मलखान सिंह के किरदार में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है। एक दबंग दरोगा के रौब, अकड़ और बिहारी लहजे को उन्होंने बेहद सलीके से पकड़ा है। जब-जब पर्दे पर उल्का गुप्ता और अश्वथ भट्ट का आमना-सामना होता है तो उन दृश्यों का तनाव और ड्रामा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। दोनों के बीच की जुगलबंदी फिल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में से एक है।

सहयोगी कलाकारों की बात करें तो सुनीता राजवार और अनुभवी अभिनेत्री जरीना वहाब ने क्रमशः माँ और दादी की भूमिकाओं में शानदार काम किया है। इन दोनों अभिनेत्रियों के बीच के घरेलू दृश्य, उनकी नोकझोंक और अपनी बेटी/पोती के भविष्य को लेकर उनकी चिंताएं बेहद वास्तविक लगती हैं। सुनीता राजवार ने अपने चिर-परिचित कॉमिक और घरेलू अंदाज़ से फिल्म के हल्के-फुल्के पलों को जीवंत बनाए रखा है। कनिष्क विजय ने एक दबे-कुचले, संकोची और डरपोक प्रेमी के रूप में रज्जन के किरदार के साथ पूरा न्याय किया है, हालांकि उनके किरदार को थोड़ा और स्पेस दिया जा सकता था। इशिता सिंह ने राधा के छोटे लेकिन महत्वपूर्ण रोल में अपनी छाप छोड़ी है। कुल मिलाकर सभी कलाकारों का अभिनय फिल्म को बांधे रखने में बड़ी भूमिका निभाता है।

निर्देशन

निर्देशक आदित्य अमन ने इस फिल्म के माध्यम से एक बहुत ही संवेदनशील और प्रगतिशील मुद्दे को उठाने का प्रयास किया है। उनका निर्देशन काफी सरल और जमीनी है। उन्होंने दरभंगा के स्थानीय माहौल, वहाँ की बोलचाल की भाषा और खान-पान को बहुत ही स्वाभाविक तरीके से पर्दे पर प्रदर्शित किया है। निर्देशक की सबसे बड़ी तारीफ इस बात के लिए होनी चाहिए कि उन्होंने बिहार को लेकर बॉलीवुड के पुराने ढर्रे (जैसे केवल अपराध या गरीबी दिखाना) को तोड़ते हुए एक सकारात्मक, सांस्कृतिक और पारिवारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।

आदित्य अमन ने फिल्म में कॉमेडी, ड्रामा और सामाजिक संदेश का एक अच्छा मिश्रण तैयार करने की कोशिश की है। वे दृश्यों को बहुत अधिक लाउड या मेलोड्रामैटिक बनाने से बचते हैं, जिससे फिल्म की सादगी बनी रहती है। महिलाओं की आत्मनिर्भर सोच और पारंपरिक सोच को दी गई चुनौती को उन्होंने बिना किसी उपदेशात्मक लहजे के मनोरंजन के माध्यम से पेश किया है। हालांकि एक निर्देशक के तौर पर वे पटकथा की कुछ कमजोरियों को पूरी तरह से ढकने में असमर्थ रहे हैं, जिसके बारे में आगे चर्चा की जाएगी।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी रूप से 'रजनी की बारात' एक औसत लेकिन साफ-सुथरी फिल्म है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी की बात करें तो दरभंगा की वास्तविक लोकेशंस, वहां के पुराने घर, संकरी गलियां और स्थानीय बाजारों को कैमरे में बहुत ही खूबसूरती और प्रामाणिकता के साथ कैद किया गया है। विजुअल्स में एक तरह का खुलापन और सादगी है, जो कहानी के मिजाज से पूरी तरह मेल खाती है। रात के दृश्यों और पारिवारिक समारोहों में लाइटिंग का इस्तेमाल बेहतरीन तरीके से किया गया है। 

फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर कहानी की गति को सहारा देते हैं। गाने लोक संगीत के पुट के साथ आते हैं, जो कानों को भले ही सुकून देते हैं, लेकिन थिएटर से बाहर निकलने के बाद शायद ही कोई गाना लंबे समय तक याद रह पाता है। बैकग्राउंड स्कोर भावुक दृश्यों में भावनाओं को उभारने का काम बखूबी करता है। फिल्म की एडिटिंग को लेकर थोड़ा और काम किया जा सकता था। फर्स्ट हाफ की तुलना में सेकंड हाफ में फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी हो जाती है, और कुछ दृश्यों को छोटा करके फिल्म की अवधि को और अधिक क्रिस्प बनाया जा सकता था।

कहां कमी रह गई?

भले ही फिल्म की सोच और विषय काफी सराहनीय हैं, लेकिन 'रजनी की बारात' एक उत्कृष्ट फिल्म बनते-बनते रह जाती है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा का दोहराव और प्रिडिक्टेबिलिटी है। फर्स्ट हाफ के बाद दर्शक आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है। कहानी में जो ट्विस्ट और टर्न्स आते हैं, वे उतने चौंकाने वाले नहीं हैं जितनी उम्मीद एक आधुनिक सोशल-कॉमेडी ड्रामा से की जाती है।

दूसरी बड़ी खामी फिल्म का धीमा सेकेंड हाफ है। बारात ले जाने के मुख्य प्लाट के इर्द-गिर्द का घटनाक्रम खिंचा हुआ महसूस होता है। कुछ उप-कथानक और सपोर्टिंग कैरेक्टर्स के दृश्य कहानी के मुख्य प्रवाह को धीमा कर देते हैं। इसके अलावा फिल्म का क्लाइमेक्स जितनी जल्दीबाजी में और आसानी से सुलझ जाता है, वह थोड़ा अवास्तविक लगता है। मलखान सिंह जैसे कड़क और दबंग किरदार का हृदय परिवर्तन थोड़ा और तार्किक और समय लेने वाला होना चाहिए था ताकि वह दर्शकों को अधिक विश्वसनीय लगता। फिल्म का अंत थोड़ा और प्रभावी और प्रभावशाली हो सकता था, जो इसके इतने बड़े और प्रगतिशील सामाजिक संदेश को एक ठोस मुकाम देता।

वर्डिक्ट

कुल मिलाकर 'रजनी की बारात' एक ईमानदार नीयत और साफ-सुथरी सोच के साथ बनाई गई एक पारिवारिक फिल्म है। यह पारंपरिक सोच के ढर्रे पर चोट करती है और नए दौर की बेटियों को अपने फैसले खुद लेने और अपनी खुशियों के लिए खड़े होने की प्रेरणा देती है। उल्का गुप्ता का शानदार अभिनय, बेहतरीन सहयोगी कलाकार और दरभंगा की ज़मीनी पृष्ठभूमि इस फिल्म के मजबूत स्तंभ हैं। हालांकि कमजोर और प्रेडिक्टेबल पटकथा के कारण यह फिल्म अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाती और एक बार देखने लायक फिल्म बनकर रह जाती है। यदि आपको सादगी से भरी, छोटे शहरों की और पारिवारिक मूल्यों को समेटे हुए कहानियाँ देखना पसंद है तो आप इस फिल्म को अपने परिवार के साथ एक बार ज़रूर देख सकते हैं। यह फिल्म बहुत ज्यादा उम्मीदें न रखने वाले दर्शकों को निराश नहीं करेगी।

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