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मां की ममता के बाद अब दिखेगा पिता का मौन संघर्ष, सीधे दिल पर दस्तक देती है 'समर्पित फादर्स लव'

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Jun 19, 2026 02:09 pm IST,  Updated : Jun 26, 2026 01:07 pm IST

सिनेमा के पर्दे पर मां की ममता तो कई बर दिखाई गई है, लेकिन पिता के अनकहे त्याग को कम ही दिखाया गया है, लेकिन 'समर्पित फादर्स लव' एक ऐसी फिल्म है जो पिता को सलाम है। जानिए कैसी है एक्शान खान की यह फिल्म।

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समर्पित फादर्स लव। Photo: IMDB
  • फिल्म रिव्यू: समर्पित फादर्स लव
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 19.06.2026
  • डायरेक्टर: एक्शान खान
  • शैली: इमोशनल ड्रामा

हमारे हिंदी सिनेमा का एक पुराना और बहुत खूबसूरत दस्तूर रहा है मां की ममता, उसके आंसू और उसके आंचल की छांव पर सैकड़ों कसीदे काढ़े गए हैं। 'मां' शब्द सुनते ही सिनेमाघरों में एक अलग ही भावुक माहौल बन जाता है, लेकिन इसी समाज और परिवार का एक दूसरा मजबूत स्तंभ, यानी पिता अक्सर रुपहले पर्दे पर थोड़ा पीछे छूट जाता है। वह पिता, जो दिन भर धूप में खटता है, माथे का पसीना पोंछता है, लेकिन घर लौटकर बच्चों के सामने कभी अपनी थकान जाहिर नहीं होने देता। उसके संघर्ष में आंसू नहीं होते, बल्कि एक खामोश जिम्मेदारी होती है। नायशा फिल्म्स के बैनर तले बनी और निर्माता साक्षी यादव द्वारा पेश की गई फिल्म 'समर्पित फादर्स लव' इसी अनकहे, अनसुने मौन संघर्ष को केंद्र में लाने का एक सराहनीय प्रयास है। निर्देशक एक्शान खान ने इस कहानी के जरिए मध्यवर्गीय परिवारों के उस ताने-बाने को छूने की कोशिश की है, जिसे हम अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में अक्सर अनदेखा कर देते हैं। यह फिल्म कोई भव्य तमाशा नहीं है, बल्कि हमारे और आपके घरों की एक सीधी-सादी, जज्बाती दास्तान है।

क्या है फिल्म का ताना-बाना?

अंकित यादव और निशा अली द्वारा लिखी गई इस फिल्म की कहानी बहुत ज्यादा उलझी हुई या थ्रिलर से भरपूर नहीं है, बल्कि इसकी सादगी ही इसकी यूएसपी है। कहानी घूमती है एक ऐसे पिता के इर्द-गिर्द, जिसके लिए उसकी दुनिया, उसके सपने और उसकी पूरी कायनात सिर्फ और सिर्फ उसका परिवार और उसके बच्चे हैं। फिल्म की शुरुआत हमें एक शांत और मध्यमवर्गीय माहौल से रूबरू कराती है, जहां उम्मीदें बड़ी हैं और संसाधन सीमित। जैसे-जैसे स्क्रीनप्ले आगे बढ़ता है, कहानी झाँसी और मध्य प्रदेश के छोटे शहरों की गलियों से होती हुई मुंबई की भागती-दौड़ती दुनिया तक पहुँचती है। छोटे शहर का वह ठहराव और बड़े शहर का वह अकेलापन, फिल्म इन दोनों के बीच के अंतर को बखूबी दिखाती है। कहानी में मोड़ तब आता है जब जनरेशन गैप (पीढ़ियों का अंतर) और बच्चों की अपनी महत्वाकांक्षाएं पिता के पुराने तौर-तरीकों से टकराने लगती हैं। एक पिता जो अपने बच्चों को दुनिया की हर खुशी देना चाहता है, वह कैसे बदलती परिस्थितियों के बीच खुद को अकेला पाता है और फिर भी हार नहीं मानता, यही इस फिल्म का मूल कथानक है। स्क्रीनप्ले में कई जगह ऐसे संवाद रखे गए हैं जो सीधे दिल को छूते हैं और दर्शकों को अपने खुद के माता-पिता की याद दिलाते हैं।

अभिनय

इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसकी कास्टिंग और उनका सहज अभिनय है। मुख्य भूमिका में अंकित यादव ने वाकई एक बेहद परिपक्व और संजीदा परफॉर्मेंस दी है। एक पिता के किरदार में ढलना, उसकी चाल-ढाल, उसकी आंखों में छिपी चिंता और अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर गुजरने की तड़प को अंकित ने बिना किसी लाउड ड्रामे के बहुत ही ठहरे हुए अंदाज में पर्दे पर उतारा है। जब वे स्क्रीन पर खामोश रहते हैं, तो उनकी खामोशी भी बहुत कुछ बयां कर जाती है। उनका साथ दिया है टीवी और सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्री जया भट्टाचार्य ने। जया जब भी स्क्रीन पर आती हैं, अपने तजुर्बे से उस दृश्य का वजन बढ़ा देती हैं। उनके और अंकित के बीच के दृश्य फिल्म के भावनात्मक पक्ष को मजबूत करते हैं। वहीं जावेद हैदर ने कहानी में एक जरूरी ठहराव और स्वाभाविकता लाने का काम किया है। कोमल हरपिलानी, प्रशिका शर्मा, देव व्यास और मीत वर्मा जैसे सह-कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है। कुल मिलाकर, अभिनय के मामले में टीम ने निराश नहीं किया है और सभी कलाकार मिलकर इस पारिवारिक ड्रामे को एक विश्वसनीयता देते हैं।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

निर्देशक एक्शान खान की तारीफ इस बात के लिए होनी चाहिए कि उन्होंने एक बहुत ही पारंपरिक और पारिवारिक विषय को बेहद आधुनिक और रियलिस्टिक (यथार्थवादी) तरीके से पेश करने की कोशिश की है। एक्शान का विजन यहां साफ दिखाई देता है, वे दृश्यों को बेवजह मेलोड्रामैटिक नहीं बनाते, बल्कि किरदारों के पीछे की मनोवैज्ञानिक स्थिति को पकड़ने की कोशिश करते हैं। उनकी लेंसिंग और साउंड डिजाइनिंग कमाल की है, जो छोटे शहरों के माहौल को बहुत जीवंत रूप में दिखाती है। डीओपी अविनाश पांडीरकर और धर्मेंद्र चौहान का कैमरा वर्क बेहतरीन है। उन्होंने झाँसी और मध्य प्रदेश के वास्तविक लोकेशंस को जिस तरह से शूट किया है, वह फिल्म को एक 'रॉ और रस्टिक' फील देता है। ऐसा लगता ही नहीं कि आप कोई सेट देख रहे हैं। उमेश राणे की एडिटिंग भी सधी हुई है, जिसने फिल्म की रफ्तार को टूटने नहीं दिया है। इसके अलावा फिल्म का संगीत इसकी आत्मा है। श्री सिंधु, अग्नि वरण, बिस्वजीत घोष और फराज अहमद का संगीत और शाहिद माल्या व अभिषेक शास्त्री की आवाजें फिल्म के इमोशनल सीन्स को एक अलग ही ऊंचाई पर ले जाती हैं। गाने सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं ठूंसे गए हैं, बल्कि वे कहानी को आगे बढ़ाते हैं।

कहां चूक गई फिल्म?

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, और 'समर्पित फादर्स लव' भी पूरी तरह कमियों से अछूती नहीं है। फिल्म का पहला हाफ जहां किरदारों को स्थापित करने और माहौल बनाने में थोड़ा ज्यादा वक्त ले लेता है, जिससे कहीं-कहीं रफ्तार धीमी महसूस होती है। आज की युवा पीढ़ी जो बहुत तेज रफ्तार सिनेमा देखने की आदी हो चुकी है, उसे शायद इसका कुछ हिस्सा थोड़ा खिंचा हुआ लग सकता है। दूसरी बात कहानी का जो मुख्य सस्पेंस या इमोशनल पीक है, वह थोड़ा प्रेडिक्टेबल है। एक अनुभवी दर्शक को पहले से ही अंदाजा हो जाता है कि आगे क्या होने वाला है। कुछ दृश्यों में ड्रामे को थोड़ा और कसा जा सकता था, विशेषकर सेकंड हाफ के कुछ हिस्सों में जहाँ भावनाएं बार-बार एक ही बिंदु पर आकर ठहर जाती हैं। यदि स्क्रीनप्ले को थोड़ा और क्रिस्प रखा जाता तो फिल्म का प्रभाव और ज्यादा गहरा हो सकता था।

वर्डिक्ट

इन छोटी-मोटी कमियों के बावजूद, 'समर्पित फादर्स लव' एक बेहद साफ-सुथरी, ईमानदार और सीधे दिल से निकली हुई फिल्म है। यह आज के उस दौर में एक ताजी हवा के झोंके की तरह है जहाँ सिनेमाघरों में सिर्फ मार-धाड़, गाली-गलौज या क्राइम थ्रिलर का बोलबाला है। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि हमारे जीवन में हमारे माता-पिता और उनके त्याग की क्या अहमियत है। यदि आप इस वीकेंड अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से थोड़ा वक्त निकालकर अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर कोई ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो आपको हंसाए, रुलाए और साथ ही एक सुकून भरा अहसास दे तो 'समर्पित फादर्स लव' एक बेहतरीन विकल्प है। यह फिल्म सिनेमाघरों से निकलने के बाद भी आपके जेहन में बनी रहेगी और शायद आप घर लौटकर अपने पिता को एक जादू की झप्पी देना चाहें। हमारी तरफ से इस इमोशनल कोशिश को 3 स्टार।

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