निर्देशक श्रीकांत ओडेला और नानी ने 2023 में आई फिल्म ‘दसरा’ में साथ काम किया था। इस फिल्म की सफलता के बाद जब दोनों ने दोबारा साथ आने का ऐलान किया तो उम्मीदें अपने आप बढ़ गईं। ‘दसरा’ की खासियत यह थी कि फिल्म ने अपने किरदारों और उनके माहौल को अच्छी तरह समझा था। ऐसे में ‘द पैराडाइज’ का पहला लुक सामने आया तो उसने तुरंत लोगों का ध्यान खींच लिया। पहली झलक में नानी को पहचानना तक मुश्किल था। दो चोटियां, बदला हुआ शरीर, नाक में नथ और चेहरे पर गुस्से से भरी नजर ने फिल्म के प्रति उत्सुकता बढ़ा दी थी। पोस्टर से लगा कि इस बार कुछ बिल्कुल अलग देखने को मिलेगा। कई बार रिलीज टलने के बाद आखिरकार ‘द पैराडाइज’ 24 सितंबर को सिनेमाघरों में पहुंच गई है। लेकिन सवाल यही है कि क्या फिल्म का असल अनुभव उसके पहले लुक जितना प्रभावशाली है? अफसोस, पूरी तरह नहीं।
क्या है ‘द पैराडाइज’ की कहानी?
फिल्म की कहानी आजादी के बाद के दौर में स्थापित की गई है। कहानी जदल नाम के एक युवक के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका संबंध समाज के उस हाशिए पर खड़े समुदाय से है, जिसे लंबे समय से सम्मान, पहचान और अपनी जिंदगी पर अधिकार से वंचित रखा गया है। जदल का समुदाय मलिक के कठोर शासन के नीचे जिंदगी गुजार रहा है। गरीबी उनकी रोजमर्रा की सच्चाई है। खाने की कमी से लेकर रोजगार के अभाव तक, उनकी जिंदगी में मुश्किलों की कोई कमी नहीं। जिस जगह को वे अपना घर मानते हैं, उसी जगह पर उन्हें बाहरी और दोयम दर्जे का समझा जाता है।
जदल बचपन से अपने आसपास यह अन्याय देखता आया है। लेकिन उसके समुदाय के लोगों को उसमें एक उम्मीद नजर आती है। उन्हें लगता है कि एक दिन यही लड़का उनके ऊपर पड़े बंधनों को तोड़ सकता है और उन्हें उस जिंदगी से बाहर निकाल सकता है, जिसमें वे पीढ़ियों से फंसे हुए हैं। यहीं से फिल्म जदल के संघर्ष की कहानी शुरू होती है। वह धीरे-धीरे यह समझने की कोशिश करता है कि उसे किसके लिए लड़ना है और क्या वह पूरे समुदाय के संघर्ष को अपने कंधों पर उठाने के लिए तैयार है। फिल्म जातिगत भेदभाव, पहचान, शोषण, बदला, प्रतिरोध और सम्मान जैसे कई गंभीर मुद्दों को छूती है। समस्या यह है कि एक साथ इतने विषय कहानी में डाल दिए गए हैं कि कई विचारों को पूरी तरह विकसित होने का मौका नहीं मिल पाता।
नानी ने संभाली फिल्म की कमान
जदल के किरदार में नानी फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। उनका लुक पूरी तरह किरदार के अनुरूप दिखाई देता है। उन्होंने अपने हावभाव और शारीरिक बदलाव से जदल की दुनिया को अपनाने की पूरी कोशिश की है। खासकर एक्शन सीक्वेंस में नानी का अंदाज प्रभावशाली है। जहां उन्हें बड़े पर्दे वाला मास मोमेंट मिलता है, वहां वह पूरी तरह छा जाते हैं। उनकी डांसिंग भी फिल्म के आकर्षण में इजाफा करती हैस, लेकिन समस्या नानी की अदाकारी में नहीं, बल्कि उस लेखन में है जो उनके किरदार को पर्याप्त जगह नहीं देता। जदल के भीतर कई भावनाएं चल रही हैं, लेकिन कहानी इतनी तेजी से आगे बढ़ती है कि कई भावनात्मक दृश्यों का असर पूरी तरह सामने नहीं आ पाता।
सोनाली कुलकर्णी जदल की मां शमक्का के किरदार में अच्छा काम करती हैं। उन्होंने किरदार को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने के बजाय सहज रखा है। उनके अभिनय में एक मां की तकलीफ और अपने बेटे के लिए चिंता साफ नजर आती है। वहीं राघव जुयाल का किरदार कुछ हद तक उलझा हुआ लगता है। यह साफ करना मुश्किल हो जाता है कि वह कहानी का मुख्य खलनायक है, किसी बड़े किरदार का साथी है या फिर उसके हिस्से में अलग तरह का कॉमिक एंगल रखा गया है। राघव इससे कहीं ज्यादा सूक्ष्म अभिनय पहले दिखा चुके हैं, इसलिए यहां उनका किरदार कुछ अधूरा महसूस होता है। मोहन बाबू मलिक की भूमिका में प्रभावशाली नजर आते हैं। उनकी आवाज, व्यक्तित्व और स्क्रीन प्रेजेंस किरदार को खतरनाक बनाती है। लेकिन मलिक के चरित्र को भी पर्याप्त बैकस्टोरी नहीं मिलती, जिससे उसके व्यवहार और सोच को पूरी तरह समझना मुश्किल होता है।
निर्देशन में दिखती है महत्वाकांक्षा
श्रीकांत ओडेला ‘द पैराडाइज’ के जरिए सिर्फ एक मास फिल्म नहीं बनाना चाहते। फिल्म में जातिगत भेदभाव, शोषण, पहचान, बदला और प्रतिरोध जैसे गंभीर मुद्दों को उठाने की कोशिश की गई है, लेकिन यही फिल्म की एक बड़ी कमजोरी भी बन जाती है। निर्देशक एक साथ कई तरह की फिल्में कहने की कोशिश करते नजर आते हैं। कभी यह मास एंटरटेनर बनती है, कभी सामाजिक टिप्पणी, कभी बदले की कहानी और कभी राजनीतिक ड्रामा। इनमें से किसी भी शैली में समस्या नहीं है, लेकिन इनके बीच संतुलन हमेशा कायम नहीं रह पाता। कुछ जगह फिल्म तेजी से अगले बड़े दृश्य की तरफ बढ़ती है, जबकि कुछ दृश्यों में कहानी अचानक रुककर कोई बात समझाने लगती है। फिल्म की विजुअल दुनिया में मेहनत साफ नजर आती है। सेट, माहौल और किरदारों का लुक एक अलग दुनिया बनाने में मदद करते हैं। लेकिन स्क्रीनप्ले उतनी मजबूती से इस दुनिया को संभाल नहीं पाता।
ये चीजें करती हैं प्रभावित
फिल्म में कुछ दृश्य ऐसे हैं जो लंबे समय तक याद रह सकते हैं। एक दृश्य में हाशिए पर खड़े समुदाय के लोग अपने हाथों में धूप लेकर चलते दिखाई देते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी ही गंध के लिए शर्मिंदा किया जाता है। छोटा-सा दृश्य होने के बावजूद यह उनके साथ होने वाले अपमान को प्रभावी ढंग से दिखाता है। जदल के बचपन से जुड़ा एक दृश्य भी असर छोड़ता है, जहां उसकी पहचान और उसके अस्तित्व पर सवाल खड़े किए जाते हैं। यह दृश्य बताता है कि किसी इंसान की पहचान को किस तरह उसके खिलाफ हथियार बनाया जा सकता है। फिल्म तब ज्यादा प्रभावशाली लगती है जब वह संवादों के बजाय अपने दृश्यों के माध्यम से बात करती है। प्रोडक्शन डिजाइन और विजुअल ट्रीटमेंट भी फिल्म की दुनिया को अलग पहचान देते हैं और जब नानी को बड़े मास मोमेंट मिलते हैं, तो वह उन्हें पूरी ऊर्जा के साथ निभाते हैं। अनिरुद्ध रविचंदर का संगीत भी कई दृश्यों को जरूरी सपोर्ट देता है।
कहां कमजोर पड़ती है फिल्म?
फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कई जगह इसकी गंभीरता को कमजोर करने वाले तत्व सामने आ जाते हैं। जदल के साथ रहने वाला कुत्ता एक दृश्य में उसकी जान बचाता है। विचार भावनात्मक है, लेकिन जिस तरह इसे स्क्रीन पर दिखाया गया है, वह दृश्य की गंभीरता को कम कर देता है। फिल्म में हिंसा और गोर की मात्रा भी काफी ज्यादा है। शुरुआत में खून-खराबे वाले दृश्य प्रभाव डालते हैं, लेकिन लगातार इसी तरह की हिंसा देखने के बाद उनका असर कम होने लगता है। इसके अलावा फिल्म एक साथ बहुत सारे मुद्दों को लेकर चलती है। जातिगत भेदभाव, शोषण, पहचान, बदला, प्रतिरोध, सम्मान और व्यवस्था के खिलाफ सवाल—इन सभी को जगह दी गई है। लेकिन इनका बोझ कहानी को कई जगह जरूरत से ज्यादा भारी बना देता है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि फिल्म कई मौकों पर यह तय नहीं कर पाती कि उसे अपनी बात कहनी कहां रोकनी है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘द पैराडाइज’ में महत्वाकांक्षा की कोई कमी नहीं है। फिल्म का स्केल बड़ा है, विजुअल दुनिया अलग है और इसके पीछे एक गंभीर सोच दिखाई देती है। कुछ दृश्य वास्तव में प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन सिर्फ बड़ा सोच लेना किसी फिल्म को मजबूत बनाने के लिए काफी नहीं होता। स्क्रीनप्ले में जरूरत से ज्यादा चीजें भर दी गई हैं। एडिटिंग कई दृश्यों को सांस लेने का मौका नहीं देती और कुछ किरदार पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। नानी ने जदल के किरदार के लिए अपना पूरा दम लगा दिया है। उनका लुक, एक्शन और स्क्रीन प्रेजेंस प्रभावशाली है। सोनाली कुलकर्णी भावनात्मक पक्ष को मजबूत करती हैं और मोहन बाबू खलनायक के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। लेकिन अभिनय और लेखन के बीच संतुलन हर जगह कायम नहीं रहता। श्रीकांत ओडेला के पास एक दिलचस्प दुनिया और कहने के लिए कई बातें थीं। फिल्म में कभी-कभी उस क्षमता की झलक भी मिलती है, जो इसे खास बना सकती थी। लेकिन हिंसा, प्रतीकों, सामाजिक मुद्दों और मास एंगल के बीच कहानी अपनी दिशा खो देती है। ‘द पैराडाइज’ में आइडियाज की कमी नहीं है, लेकिन उन्हें एक साथ पिरोने में फिल्म कमजोर पड़ जाती है।