'गरीब होना एक पाप है...' वेब सीरीज 'द पिरामिड स्कीम' का यह डायलॉग हर उस इंसान के दिल को झकझोर देता है जिसने कभी न कभी आर्थिक तंगी का सामना किया है। आज के दौर में जब हर कोई रातों-रात अमीर बनने का सपना देख रहा है, 'द वायरल फीवर' एक ऐसी ही कहानी लेकर आया है जो हमारे समाज के एक बहुत बड़े सच को उजागर करती है। मल्टी-लेवल मार्केटिंग या चेन सिस्टम के नाम पर होने वाले घोटालों के बारे में हम सबने सुना है, लेकिन बहुत कम मेकर्स ने इस पर विस्तार से बात की है। अशीष शुक्ला और श्रेयांश पांडे के निर्देशन में बनी यह सीरीज सीधे दर्शकों से जुड़ती है, यह दिखाती है कि कैसे पैसे की भूख और अपनों से सम्मान पाने की चाहत एक अच्छे-भले इंसान को दलदल में धकेल देती है।
वेब सीरीज 'द पिरामिड स्कीम' का प्लॉट
कहानी का मुख्य केंद्र हरिद्वार का रहने वाला गोल्डी चौहान (परमवीर चीमा) है। गोल्डी एक मोबाइल की दुकान चलाता है, लेकिन वह कर्ज के भारी बोझ तले दबा हुआ है। उसका एक भरा-पूरा संयुक्त परिवार है, जहां उसके पिता को हमेशा घर का सबसे नाकाम सदस्य माना जाता है। विडंबना यह है कि गोल्डी के दादा (अंजन श्रीवास्तव) के पास बहुत पैसा है, लेकिन वे परिवार के किसी सदस्य की मदद करने को तैयार नहीं हैं। इस आर्थिक तंगी और रिश्तेदारों के तानों से तंग आकर गोल्डी जल्द से जल्द अमीर बनना चाहता है।
तभी गोल्डी की जिंदगी में चुनमुन सिंह (विजय कुमार) की एंट्री होती है, जो एक बैंक कर्मचारी है। वह गोल्डी को 'जम्बोलाइफ' नाम की एक कंपनी के बिजनेस मॉडल से मिलवाता है, जिसे आसान भाषा में 'पिरामिड स्कीम' कहते हैं। नियम सीधा है, आपको खुद जुड़ना है और अपने नीचे चार नए लोगों को जोड़ना है, और जैसे-जैसे चेन बढ़ेगी, आपकी जेब में पैसा आएगा। शुरुआत में मिलने वाले मुनाफे और इस इंडस्ट्री के बड़े नाम तरुण बजाज (शेखर सुमन) के मोटिवेशनल वीडियो देखकर गोल्डी का लालच बढ़ जाता है। वह अपनी दुकान छोड़कर इस काम में पूरी तरह डूब जाता है।
इस सफर में उसकी मुलाकात मनोज श्रीवास्तव (रणवीर शौरी) से होती है, जो एक सस्पेंडेड म्यूजिक टीचर हैं और यूट्यूब पर नाम कमाने का सपना देख रहे हैं। गोल्डी और मनोज मिलकर इस पिरामिड की सीढ़ियां चढ़ने लगते हैं। शुरुआती कामयाबी से दोनों को लगता है कि उनके दिन बहुर गए हैं, लेकिन वे इस बात से अनजान हैं कि आसान पैसे का यह खेल उनके भविष्य और परिवार के भरोसे को कितनी बेरहमी से तबाह करने वाला है।
कलाकारों का दमदार अभिनय
इस सीरीज की सबसे बड़ी खूबी इसके कलाकारों का अभिनय है, जो कहानी को बिखरने नहीं देता। गोल्डी के किरदार में परमवीर चीमा ने कमाल का काम किया है। उन्होंने एक मध्यमवर्गीय लड़के की महत्वाकांक्षा, उसकी बेताबी और बाद में आने वाली बेबसी को अपने चेहरे के भावों से बहुत खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। दर्शक गोल्डी के फैसलों से भले ही सहमत न हों, लेकिन उसके हालातों को देखकर उससे नफरत भी नहीं कर पाते।
मनोज श्रीवास्तव के रोल में रणवीर शौरी ने एक बार फिर साबित किया है कि वे कितने बेहतरीन एक्टर हैं। एक सीधे-साधे संगीत शिक्षक से मोटिवेशनल स्पीकर बनने के उनके किरदार के बदलाव को उन्होंने बहुत गहराई से जिया है। शेखर सुमन ने तरुण बजाज के रूप में सीमित स्क्रीन टाइम में भी अपनी कड़क आवाज और शानदार डायलॉग डिलीवरी से शो में एक नई ऊर्जा भर दी है।
बैंकाक में बैठे बिजनेसमैन दलजीत सिंह के रोल में रवि बहल का काम बहुत ही सलीके का और प्रभावशाली है। अंजन श्रीवास्तव हमेशा की तरह परिवार के बुजुर्ग के रूप में बिल्कुल फिट बैठे हैं। इसके अलावा अखिलेश मिश्रा, स्मिता बंसल, विजय कुमार और सुशांत सिंह जैसे अनुभवी कलाकारों की मौजूदगी ने इस इंसानी ड्रामे को और ज्यादा सजीव और मजबूत बना दिया है।
निर्देशन और तकनीकी पहलू
श्रेयांश पांडे और आशीष आर शुक्ला का निर्देशन तारीफ के काबिल है। उन्होंने हरिद्वार के माहौल और वहां की संस्कृति को स्क्रीन पर बहुत ही ईमानदारी से उतारा है। सिनेमैटोग्राफी बेहतरीन है, जो आपको सीधे हरिद्वार की गलियों और गंगा घाट के किनारे ले जाती है। फिल्म के संवाद बहुत दमदार लिखे गए हैं, जो शो के खत्म होने के बाद भी आपके दिमाग में घूमते रहते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक भी कहानी के उतार-चढ़ाव के साथ ठीक बैठता है। हालांकि तकनीकी रूप से इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी एडिटिंग और स्क्रीनप्ले की धीमी रफ्तार है। हर एपिसोड लगभग 40 मिनट का है, जो कई जगहों पर बहुत खिंचा हुआ महसूस होता है। अगर इसकी एडिटिंग थोड़ी चुस्त होती और एपिसोड्स को 10-10 मिनट छोटा रखा जाता तो शो का रोमांच और बढ़ जाता।
इसके अलावा स्क्रीनप्ले में एक और कमी यह खलती है कि कहानी बार-बार एक ही तरह के पारिवारिक झगड़ों और दादाजी के पैसे न देने वाले मुद्दों पर घूमती रहती है, जिससे मुख्य प्लॉट यानी 'घोटाले' से ध्यान भटक जाता है। सीरीज इस बात की गहराई में नहीं जा पाती कि आखिर लोग बार-बार बदनाम होने के बावजूद इन पिरामिड स्कीम्स के जाल में क्यों फंस जाते हैं। मेकर्स ने पीड़ितों के दर्द को तो दिखाया, लेकिन इस पूरे स्कैम के पीछे के मास्टरमाइंड्स और उनके दिमाग की चालाकी को उतनी गहराई से नहीं छू पाए, जिससे कहानी थोड़ी अधूरी सी लगती है।
वर्डिक्ट
'द पिरामिड स्कीम' भले ही टीवीएफ की 'पंचायत' या 'गुल्लक' जैसी कल्ट सीरीज न बन पाए, लेकिन यह एक बार देखने लायक शो जरूर है। यह आपको हंसाती भी है, इमोशनल भी करती है और एक जरूरी सीख भी देती है कि शॉर्टकट से कमाया हुआ पैसा हमेशा अपने साथ बड़ी मुसीबतें लेकर आता है। कमजोर स्क्रीनप्ले और धीमी रफ्तार के बावजूद परमवीर चीमा और रणवीर शौरी की बेहतरीन जुगलबंदी और एक अलग विषय को छूने की कोशिश के लिए इस वीकेंड इसे आराम से बिंज-वॉच किया जा सकता है।
रेटिंग: 3 / 5 स्टार