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Tula Pahata Movie Review: तीन पीढ़ियों की मोहब्बत और रिश्तों की उलझी कहानी, खूबसूरती से बुनी गई है फिल्म

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Sep 11, 2026 01:26 pm IST,  Updated : Sep 11, 2026 01:34 pm IST

‘तुला पाहता’ तीन पीढ़ियों की प्रेम कहानी को खूबसूरती से पेश करती है। विजुअल्स, संगीत और अभिनय प्रभावी हैं, हालांकि धीमी रफ्तार और कुछ कमजोर कहानी विकल्प फिल्म का असर थोड़ा कम करते हैं।

tula phata
ट्रेलर से लिया गया एक सीन। Photo: RAJSHRI YOUTUBE
  • फिल्म रिव्यू: तुला फटा
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 11/09/2026
  • डायरेक्टर: मयूरा प्रधान
  • शैली: रोमांटिक ड्रामा

मराठी सिनेमा में रिश्तों और भावनाओं को बिना बहुत ज्यादा शोर-शराबे के पर्दे पर उतारने की एक अलग खूबी रही है। ‘तुला पाहता’ भी इसी रास्ते पर चलती है। फिल्म की कहानी सिर्फ एक नए जमाने के कपल के प्यार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे तीन पीढ़ियों के रिश्तों, अधूरे प्रेम और परिवार के पुराने राज को सामने लाती है। मेकर्स ने रोमांस, परिवार और बीते वक्त की यादों को जोड़कर एक ऐसी कहानी बनाने की कोशिश की है, जो दिल को छूती तो है, लेकिन हर जगह अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब नहीं हो पाती। फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट इसकी सबसे बड़ी ताकत है, जबकि कहानी का विस्तार और कुछ घटनाक्रम इसे थोड़ा कमजोर करते हैं। कुल मिलाकर ‘तुला पाहता’ एक खूबसूरत लेकिन असमान गति वाली फैमिली रोमांटिक ड्रामा है, जिसे 3 स्टार दिए जा सकते हैं। विस्तार से पूरा रिव्यू जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।

तीन पीढ़ियों की कहानी में छिपा पुराना प्यार

कहानी की शुरुआत तन्वी (मानसी पाटिल) और सागर (नचिकेत लेले) से होती है। तन्वी एक चेस ग्रैंडमास्टर है, जबकि सागर संगीत से जुड़ा हुआ है। दोनों का रिश्ता आज के समय के रिश्तों की तरह है, जहां साथ रहने के लिए शादी ही एकमात्र रास्ता नहीं माना जाता। दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला करते हैं। शुरुआत में कहानी इसी रिश्ते और परिवार की प्रतिक्रिया के इर्द-गिर्द घूमती हुई नजर आती है, लेकिन जल्द ही फिल्म एक अलग मोड़ लेती है। जब दोनों परिवार करीब आते हैं, तो सामने आता है कि उनके बीच सिर्फ नए रिश्ते का नहीं, बल्कि कई साल पुराने रिश्तों का भी कनेक्शन है। तन्वी और सागर के दादा-दादी अरु और हरि की अधूरी प्रेम कहानी वर्तमान पीढ़ी की जिंदगी को प्रभावित करने लगती है। यहीं से फिल्म का असली ड्रामा शुरू होता है। पुरानी पीढ़ी के फैसले और उनके दबे हुए जज्बात नई पीढ़ी के सामने सवाल खड़े करते हैं।

पुरानी प्रेम कहानी ज्यादा असरदार

फिल्म की सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस कहानी को शायद शुरुआत में साइड ट्रैक माना जाता है, वही धीरे-धीरे पूरी फिल्म पर भारी पड़ने लगती है। अरु और हरि के किरदारों में इला भाटे और सतीश पुलेकर ने सहज अभिनय किया है। दोनों की केमिस्ट्री में एक ठहराव है, जो उनकी अधूरी मोहब्बत को विश्वसनीय बनाता है। उनकी कहानी में सिर्फ रोमांस नहीं है, बल्कि समय, परिवार और परिस्थितियों के बीच दबे हुए फैसलों का दर्द भी है। फिल्म जब फ्लैशबैक में जाती है तो दर्शक इन किरदारों से ज्यादा जुड़ने लगते हैं। यही वजह है कि मन में यह सवाल भी आता है कि अगर फिल्म ने अरु और हरि की कहानी को थोड़ा ज्यादा समय दिया होता, तो इसका भावनात्मक असर कहीं अधिक मजबूत हो सकता था। इसके मुकाबले तन्वी और सागर का रिश्ता कुछ हिस्सों में उतना गहराई से विकसित नहीं हो पाता। दोनों के बीच प्यार और लगाव दिखता है, लेकिन उनके रिश्ते के संघर्ष को जिस तरह विस्तार मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाता। फिल्म जिस तरह नई और पुरानी पीढ़ी के रिश्तों को एक-दूसरे के समानांतर रखती है, उसमें पुरानी प्रेम कहानी कहीं ज्यादा मजबूत दिखाई देती है।

स्क्रीनप्ले में कुछ जगह आती है कमजोरी

‘तुला पाहता’ की कहानी का आइडिया आकर्षक है, लेकिन स्क्रीनप्ले हर मोड़ पर उतना प्रभाव पैदा नहीं करता। कुछ घटनाएं स्वाभाविक लगती हैं, जबकि कुछ कहानी को आगे बढ़ाने के लिए जबरदस्ती जोड़ी गई महसूस होती हैं। खासकर बीच के हिस्से में फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ती है। फिल्म का लगभग 2 घंटे 20 मिनट का रनटाइम भी कुछ जगह महसूस होता है। अगर कुछ हिस्सों को थोड़ा संक्षिप्त किया जाता और पुराने प्रेम प्रसंग को ज्यादा जगह दी जाती तो कहानी ज्यादा प्रभावी हो सकती थी। हालांकि क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म अपनी बिखरी हुई कड़ियों को जोड़ने की कोशिश करती है और अंत तक कहानी को एक संतोषजनक दिशा दे देती है।

विजुअल्स हैं फिल्म की असली ताकत

जहां कहानी कुछ जगह लड़खड़ाती है, वहीं फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट इसे संभालने का काम करता है। निर्देशक मयूरा प्रधान ने कहानी को सिर्फ संवादों के जरिए नहीं, बल्कि कैमरे और डिजाइन के माध्यम से भी बताने की कोशिश की है। सिनेमैटोग्राफी फिल्म के मूड को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। खास तौर पर फ्लैशबैक सीक्वेंस काफी खूबसूरती से फिल्माए गए हैं। इन हिस्सों में स्क्रीन का आस्पेक्ट रेशियो बदलना और तस्वीरों में पुराने टेलीविजन जैसा सॉफ्ट टोन इस्तेमाल करना बीते समय की यादों को अलग एहसास देता है। इससे दर्शक वर्तमान और अतीत के बीच का फर्क सिर्फ कहानी से नहीं, बल्कि तस्वीरों के जरिए भी महसूस कर पाते हैं। यह प्रयोग फिल्म को एक अलग पहचान देता है।

संगीत कहानी के भावनात्मक हिस्से को मजबूत करता है

रोहन और रोहन का संगीत फिल्म की भावनात्मक दुनिया के साथ अच्छी तरह फिट बैठता है। चूंकि कहानी में एक प्रमुख किरदार संगीतकार है, इसलिए बैकग्राउंड म्यूजिक और गानों का महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। संगीत कई जगह कहानी के मूड को बेहतर तरीके से स्थापित करता है और रोमांटिक तथा फ्लैशबैक हिस्सों में फिल्म की खूबसूरती बढ़ाता है। खास बात यह है कि संगीत को केवल मनोरंजन के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि कहानी के भावनात्मक माहौल को बनाने में भी इसका इस्तेमाल नजर आता है।

कलाकारों की एक्टिंग कैसी है?

मानसी पाटिल ने तन्वी के किरदार में अच्छा काम किया है। उनके किरदार में आत्मविश्वास के साथ-साथ भावनात्मक उलझन भी है, जिसे वह सहजता से पर्दे पर लेकर आती हैं। नचिकेत लेले भी सागर के किरदार में ठीक बैठते हैं। दोनों की जोड़ी फिल्म को एक आधुनिक और युवा रंग देती है। हालांकि फिल्म के सबसे मजबूत हिस्से में इला भाटे और सतीश पुलेकर नजर आते हैं। उनके किरदारों में उम्र के साथ आई खामोशी और पुराने रिश्ते का बोझ दिखाई देता है। दोनों कलाकार बिना ज्यादा नाटकीयता के अपने किरदारों की भावनाओं को सामने रखते हैं। बाकी कलाकार भी कहानी को सपोर्ट करते हैं और फिल्म के पारिवारिक माहौल को बनाए रखते हैं।

निर्देशन में ईमानदारी, लेकिन कहानी को और समय चाहिए था

मयूरा प्रधान का निर्देशन फिल्म की सबसे सकारात्मक बातों में शामिल है। उन्होंने कहानी को जरूरत से ज्यादा मेलोड्रामैटिक बनाने की कोशिश नहीं की। परिवार, प्यार और पुराने रिश्तों को एक साथ पिरोने का प्रयास साफ दिखाई देता है। फिल्म कई जगह बहुत सहज और गर्मजोशी भरी महसूस होती है, लेकिन निर्देशन के स्तर पर सबसे बड़ी कमी यही लगती है कि कहानी के सबसे दिलचस्प हिस्से को पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती। अरु और हरि की प्रेम कहानी में इतना दम है कि उसे और विस्तार देकर फिल्म को ज्यादा गहराई दी जा सकती थी। वहीं तन्वी और सागर के रिश्ते को लेकर भी कुछ सवालों के जवाब थोड़े और बेहतर तरीके से विकसित किए जा सकते थे।

खूबसूरत अंदाज वाली औसत से बेहतर फैमिली ड्रामा

‘तुला पाहता’ कोई परफेक्ट रोमांटिक फिल्म नहीं है, लेकिन इसकी खूबसूरती और भावनात्मक कहानी इसे देखने लायक बनाती है। तीन पीढ़ियों को एक रिश्ते की डोर से जोड़ने का विचार अच्छा है और फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट इसे और खास बनाता है। पुरानी प्रेम कहानी सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, जबकि नई पीढ़ी का रोमांस कुछ जगह अधूरा सा लगता है। बीच में धीमी रफ्तार और कुछ असामान्य कहानी विकल्प फिल्म के प्रभाव को थोड़ा कम करते हैं, लेकिन शानदार फ्लैशबैक, अच्छी सिनेमैटोग्राफी, संगीत और कलाकारों की सहज परफॉर्मेंस इसकी भरपाई करते हैं। अगर आपको फैमिली ड्रामा, पुराने प्यार की कहानियां और रिश्तों पर आधारित हल्की-फुल्की रोमांटिक फिल्में पसंद हैं तो ‘तुला पाहता’ आपके लिए एक ठीक-ठाक वन-टाइम वॉच हो सकती है।

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