अस्सी के दशक का वह दौर जब टेलीविजन पर कहानियां केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का आईना हुआ करती थीं, तब एक ऐसा धारावाहिक पर्दे पर आया जिसने भारतीय दर्शकों के दिलों में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी। 1987 में प्रसारित हुए इस धारावाहिक ने एक ऐसे संवेदनशील विषय को छुआ, जिस पर उस समय खुलकर बात करना आसान नहीं था। यह कोई साधारण कहानी नहीं थी, बल्कि हिमालय की गोद में बसी उस खूबसूरत घाटी की व्यथा थी, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस शो ने बहुत ही सादगी और सच्चाई के साथ वहां के आम जनजीवन, संस्कृति और उन बदलती परिस्थितियों को पर्दे पर उतारा, जिनसे वहां के निवासी जूझ रहे थे।
क्या है शो का नाम?
दूरदर्शन के इस धारावाहिक का नाम था 'गुल गुलशन गुलफाम'। इस शीर्षक का अर्थ भी उतना ही गहरा था जितना कि इसकी कहानी, गुल का अर्थ है 'फूल', गुलशन यानी 'बगीचा' और गुलफाम का तात्पर्य 'माली' से है। यह शो मुख्य रूप से कश्मीर की वादियों और वहां के पारंपरिक हाउसबोट संस्कृति पर आधारित था। कहानी एक ऐसे कश्मीरी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनके पास तीन हाउसबोट थे और यही उनकी आजीविका का मुख्य साधन थे, लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, घाटी में बढ़ते उग्रवाद और अस्थिरता ने उनकी जिंदगी की लय बिगाड़ दी। पर्यटकों की कमी और सुरक्षा के बढ़ते खतरों ने न केवल उनके व्यवसाय को प्रभावित किया, बल्कि उनके अस्तित्व पर भी संकट खड़ा कर दिया।
क्या थी शो की कहानी?
यह धारावाहिक 90 के दशक के उन शुरुआती टीवी शोज में से एक था, जिसने कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद, बेरोजगारी और पलायन जैसे गंभीर मुद्दों को मुख्यधारा के मीडिया में जगह दी। जहाँ उस समय के अधिकांश धारावाहिक केवल मध्यमवर्गीय पारिवारिक उलझनों तक सीमित थे, वहीं इसने आर्थिक संकट और भय के साये में जी रहे लोगों की मनोवैज्ञानिक स्थिति को बहुत ही शानदार तरीके से चित्रित किया। इसमें दिखाया गया कि कैसे राजनीति और हिंसा ने एक शांत जन्नत को अशांति के द्वीप में बदल दिया था।
सामने आईं कई चुनौतियां
हकीकत और पर्दे की कहानी के बीच का अंतर तब कम हो गया जब इस शो की शूटिंग के दौरान टीम को वास्तविक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पहले इस धारावाहिक की शूटिंग कश्मीर की असल लोकेशन्स पर की जा रही थी, लेकिन वहां बढ़ते तनाव और सुरक्षा कारणों से इसे जारी रखना असंभव हो गया। पूरी टीम और कलाकारों को धमकियां मिलने लगी थीं, जिसके कारण शूटिंग को बीच में ही रोकना पड़ा। आखिरकार निर्माताओं को सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कश्मीर के उस माहौल को मुंबई की फिल्म सिटी में री-क्रिएट करना पड़ा। इस सीरियल को IMDb पर 7.6 की रेटिंग मिली है।
शो की कास्ट
इस धारावाहिक की सफलता का एक बड़ा श्रेय इसके दमदार कलाकारों को भी जाता है। इसमें परिक्षित साहनी, नीना गुप्ता, राधा सेठ, पंकज बेरी, एनके फुल्ल और कंवरजीत सिंह जैसे मंझे हुए कलाकारों ने अभिनय किया था। दिलचस्प बात यह है कि अभिनेता कुणाल खेमू ने भी इसी शो से एक बाल कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। कहानी में वास्तविकता और गहराई लाने के लिए कई स्थानीय कश्मीरी कलाकारों को भी शामिल किया गया था, ताकि वहां की बोली और लहजे को सही ढंग से पेश किया जा सके। आज दशकों बाद भी यह धारावाहिक अपनी ईमानदारी और उस दौर की कड़वी सच्चाई को बयां करने के लिए याद किया जाता है।
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