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ISRO NVS-03 Launched: अमेरिका ने दिया था धोखा, इसरो ने 'NavIC' से दिया करारा जवाब, जानें खासियत

 Written By: Kajal Kumari
 Published : Oct 31, 2026 08:04 am IST,  Updated : Oct 31, 2026 10:56 am IST

इसरो ने शुक्रवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अपना GSLV-F18 रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च किया, जो अगली पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रह NVS-03 को अपने साथ ले गया। अमेरिका पर अब भारत की निर्भरता नहीं रहेगी। जानें इससे क्या होगा फायदा?

इसरो का एनवीएस- 03 उपग्रह लॉन्च- India TV Hindi
इसरो का एनवीएस- 03 उपग्रह लॉन्च Image Source : PTI

Highlights

  • इसरो का एनवीएस- 03 उपग्रह लॉन्च
  • भारत का GPS सिस्टम 'NavIC' कैसे करेगा काम?
  • क्या होता है जीपीएस सिस्टम?

भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम को मजबूत करने के एक अहम मिशन के तहत, देश का अगली पीढ़ी का नेविगेशन सैटेलाइट 'NVS-03', 'जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल' (GSLV-F18) रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया है। यह लॉन्च आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से रात 11:51 बजे हुआ। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी ISRO ने 'X' (ट्विटर) पर बताया, "NVS-03 को लेकर GSLV-F18 ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SHAR) से उड़ान भरी।" यह लॉन्च इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत का अपना नेविगेशन सिस्टम NavIC इस समय सैटेलाइट की कमी से जूझ रहा है।

नॉटी बॉय कैसे बन गया स्मार्ट बॉय

शुक्रवार के लॉन्च के साथ, देश के GSLV कार्यक्रम ने अपनी 20वीं उड़ान पूरी कर ली है। कभी बार-बार फेल होने की वजह से 'नॉटी बॉय' (शरारती लड़का) कहे जाने वाले इस रॉकेट ने, सफल लॉन्च के बाद 'स्मार्ट बॉय' (समझदार लड़का) का दर्जा हासिल कर लिया है। इस लॉन्च का मकसद भारत की उस क्षमता को बढ़ाना है, जिससे देश और उसके बाहर सटीक पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं दी जा सकें। भारत को स्वदेशी GPS या 'नाविक' (NavIC) सिग्नल की जरूरत है, खासकर रणनीतिक उद्देश्यों के लिए, जिसमें 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे सैन्य अभियान भी शामिल हैं।

सेना को होगा बड़ा फायदा
नेविगेशन सिस्टम को चालू रखने के लिए कम से कम चार सक्रिय उपग्रहों (सैटेलाइट्स) की जरूरत होती है, लेकिन NaVIC के पास केवल तीन ही सक्रिय उपग्रह बचे थे। चूंकि GPS की तरह स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पोजिशन-ट्रैकिंग सिस्टम के लिए चार सक्रिय उपग्रहों का होना जरूरी है, इसलिए फिलहाल सशस्त्र बल NaVIC का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। इसमें मिसाइल नेविगेशन, सटीक लोकेशन का पता लगाना, समुद्र में युद्धपोतों के बीच तालमेल बिठाना, और सैनिकों की आवाजाही या लड़ाकू विमानों के लिए स्वदेशी नेविगेशन सपोर्ट जैसे काम शामिल हैं।

अमेरिका के GPS को मिलेगी टक्कर
इस वजह से, रणनीतिक बलों को अमेरिकी GPS और रूसी GLONASS जैसे विदेशी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता है। GPS जैसे विदेशी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर रहने से एक बड़ी निर्भरता पैदा हो जाती है। ऐसे में, किसी संघर्ष या युद्ध के दौरान इन सिस्टम तक पहुंच को सीमित किया जा सकता है, इनकी गुणवत्ता घटाई जा सकती है, या इन्हें पूरी तरह से बंद भी किया जा सकता है, जैसा कि भारत ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अनुभव किया था। लेकिन NVS-03 के सफल लॉन्च ने सब कुछ बदल दिया है।

क्या है NVS-03
NVS-03, ISRO की अगली पीढ़ी की नेविगेशन सैटेलाइट श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है। इसे 'इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम' (IRNSS) - जिसे NavIC के नाम से भी जाना जाता है, जिसके तहत सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। भारत के अपने जीपीएस सिस्टम 'NavIC' (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) को और आधुनिक बनाने के लिए भेजा गया है। यह सैटेलाइट भारत और उसकी सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर दूर तक के इलाके में बिल्कुल सटीक लोकेशन, रास्ते और समय की जानकारी देने में मदद करेगा।

इसरो का एनवीएस- 03 उपग्रह लॉन्च
Image Source : PTIइसरो का एनवीएस- 03 उपग्रह लॉन्च

जानें NVS-03 की खासियत

  • NVS-03, दूसरी पीढ़ी की NVS श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है। इसका उद्देश्य 'नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन' (NavIC) प्रणाली को मजबूत करना है, जो एक तरह का स्वदेशी GPS है और नेविगेशन सेवाओं की निरंतरता को बनाए रखना है।
  •  एक बार स्थापित हो जाने के बाद, यह उपग्रह अपनी कक्षा को ऊपर उठाने की प्रक्रियाएं (ऑर्बिट-रेज़िंग मैन्यूवर्स) करेगा, ताकि वह 32.5 डिग्री पूर्व में अपने अंतिम 'जियोसिंक्रोनस स्लॉट' तक पहुंच सके।
  • NVS-03 सैटेलाइट में सटीक पोजिशनिंग और टाइमिंग सेवाओं के लिए एक स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक के साथ-साथ बाहर से ली गई एटॉमिक क्लॉक भी लगी हैं।
  • यह सैटेलाइट मौजूदा L5 और S-बैंड नेविगेशन सिग्नलों के अलावा नया L1 सिग्नल भी भेजेगा, जिससे भारत के साथ-साथ देश की सीमाओं से 1,500 km बाहर तक कवरेज मिल सकेगा।
  • L1 सिग्नल के जुड़ने से आधुनिक नागरिक नेविगेशन उपकरणों (जैसे स्मार्टफोन और पहनने योग्य तकनीक/वियरेबल टेक्नोलॉजी) के साथ इसकी अनुकूलता (compatibility) बेहतर होने की उम्मीद है।

भारत का नेविगेशन सिस्टम कैसे काम करता है

  • भारत का यह नेविगेशन सिस्टम दो तरह की सेवाएं प्रदान करता है- आम नागरिकों के लिए 'स्टैंडर्ड सर्विस' और सुरक्षा बलों के लिए 'रिस्ट्रिक्टेड सर्विस'।
  • स्टैंडर्ड सर्विस का इस्तेमाल आम लोग रोजमर्रा के रास्तों और लोकेशन जानने (जैसे गूगल मैप्स) के लिए करते हैं।
  • दूसरी सेवा पूरी तरह से सुरक्षित और सीक्रेट (एन्क्रिप्टेड) होती है, जिसे केवल देश की सेना और अधिकृत सुरक्षा एजेंसियां ही इस्तेमाल कर सकती हैं। 
  • इस सैटेलाइट की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें भारत में बनी स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक लगाई गई है, जो सटीक समय बताने का काम करती है।
  • इसके अलावा इसमें नए L1 सिग्नल को जोड़ा गया है, जिससे आम लोगों के स्मार्टफोन और गाड़ियों में नेविगेशन सेवाएं और भी बेहतर तरीके से काम करेंगी।

क्या होता है जीपीएस सिस्टम

 

जीपीएस (GPS) का पूरा नाम ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (Global Positioning System) है। यह एक उपग्रह-आधारित नेविगेशन प्रणाली है, जिसका स्वामित्व संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतरिक्ष सेना के पास है। इसकी मदद से दुनिया में कहीं भी किसी व्यक्ति, वाहन या वस्तु की सटीक लोकेशन (स्थान), गति और समय का पता लगाया जा सकता है।

इसरो का एनवीएस- 03 उपग्रह लॉन्च
Image Source : INDIATVइसरो का एनवीएस- 03 उपग्रह लॉन्च

जीपीएस के प्रमुख उपयोग

• रास्ता खोजना: कार, बाइक या पैदल चलते समय नेविगेशन (Google Maps आदि) के लिए।
• यातायात और डिलीवरी: कैब बुकिंग, ऑनलाइन फूड डिलीवरी और कोरियर ट्रैकिंग में।
• आपातकालीन सेवाएं: एम्बुलेंस, पुलिस या बचाव दलों द्वारा सटीक जगह पर पहुंचने के लिए।

जीपीएस कैसे काम करता है?

  • जीपीएस (GPS - ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम) अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों (Satellites) और आपके डिवाइस (जैसे फोन या कार के रिसीवर) के बीच तालमेल से काम करता है। 
  • उपग्रहों का नेटवर्क-पृथ्वी की कक्षा में चारों तरफ लगभग 24 से अधिक जीपीएस उपग्रह चक्कर लगाते हैं। ये उपग्रह लगातार अंतरिक्ष से रेडियो सिग्नल और अपनी सटीक स्थिति तथा समय की जानकारी प्रसारित (Broadcast) करते रहते हैं।
  • सिग्नल पहुंचना-जब आप अपने फोन में जीपीएस या गूगल मैप्स (Google Maps) चालू करते हैं, तो आपके फोन का जीपीएस रिसीवर इन उपग्रहों से आने वाले रेडियो सिग्नल्स को पकड़ता है
  • दूरी की गणना-प्रकाश की गति (Speed of light) फिक्स होती है। आपका फोन यह हिसाब लगाता है कि उपग्रह द्वारा भेजा गया सिग्नल आपके फोन तक पहुंचने में कितना समय (Microseconds) लगा। समय और गति के हिसाब से फोन यह निकाल लेता है कि वह उस उपग्रह से कितनी दूर है।
  • सही और सटीक लोकेशन (अक्षांश, देशांतर और ऊंचाई) का पता लगाने के लिए आपके फोन को कम से कम 4 अलग-अलग उपग्रहों से सिग्नल की आवश्यकता होती है।
  • पहले तीन उपग्रह आपकी स्थिति (2D लोकेशन और ऊंचाई) तय करते हैं, और चौथा उपग्रह समय की सटीकता (Clock synchronization) और सही तालमेल बनाने में मदद करता है।
  • समय की सटीकता (Atomic Clocks and Relativity)-उपग्रहों में बेहद सटीक 'परमाणु घड़ियां' (Atomic Clocks) लगी होती हैं, जिससे आपको मीटर-दर-मीटर की सटीक लोकेशन मिलती है।

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