Highlights
- 7 आत्मसमर्पित उग्रवादी संगठनों ने 11 मांगों को लेकर त्रिपुरा में 72 घंटे का ब्लॉकेड शुरू किया।
- प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि 2024 का त्रिपक्षीय शांति समझौता अबतक जमीन पर पूरी तरह लागू नहीं हुआ।
- भूमि अधिकार, अलग प्रशासन, कोकबोरोक की रोमन लिपि और पूर्व कैडरों की सुरक्षा प्रमुख मांगें हैं।
अगरतला: त्रिपुरा में आत्मसमर्पण कर चुके 7 उग्रवादी संगठनों ने 4 सितंबर यानी शुक्रवार की सुबह से असम-अगरतला राष्ट्रीय राजमार्ग पर 72 घंटे का ब्लॉकेड शुरू कर दिया। संगठनों का कहना है कि सरकार के साथ हुए समझौतों के बावजूद उनकी मांगों और समझौतों को लागू करने में पर्याप्त प्रगति नहीं हुई है। प्रदर्शनकारियों ने बरामुरा के चंद्र साधुपाड़ा इलाके में हाईवे जाम किया और टायर भी जलाए। इससे सड़क पर आवाजाही लगभग ठप हो गई और कई जगह बड़ी संख्या में वाहन फंस गए।
कौन-कौन से संगठन आंदोलन में शामिल हैं?
इस 72 घंटे के ब्लॉकेड में ये 7 संगठन शामिल हैं:
- नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (ओरिजिनल) यानी NLFT (Original)
- NLFT (परिमल देबारमा)
- ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (ATTF)
- NLFT (नयन बाशी)
- ज्वाइंट एक्शन रिहैबिलिटेशन कमेटी
- ज्वाइंट एक्शन कमेटी
- ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (ओल्ड)
इन संगठनों के सदस्य और समर्थक शुक्रवार सुबह बरामुरा के चंद्र साधुपाड़ा इलाके में जुटे और राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम कर दिया।

कहां-कहां दिखा बंद का असर?
मुख्य ब्लॉकेड बरामुरा इलाके में किया गया। इसके अलावा रेलवे रूट पर बिघुदास और सड़क मार्ग पर खोवाई चौमुहानी में भी ब्लॉकेड किए जाने की खबर है। टायर जलाकर प्रदर्शन किए जाने के कारण यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ। अलग-अलग स्थानों पर बड़ी संख्या में वाहन फंस गए। स्थिति को देखते हुए इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर यातायात सामान्य कराने की कोशिश कर रहे हैं। पश्चिम त्रिपुरा के जिला पुलिस अधीक्षक नमित पाठक भी ब्लॉकेड की सूचना मिलने के बाद मौके पर पहुंचे।
पूर्व उग्रवादियों के आंदोलन की असली वजह क्या है?
संगठनों का कहना है कि उनके कैडर लंबे समय तक सशस्त्र संघर्ष से जुड़े रहे और बाद में सरकार के साथ समझौतों के तहत मुख्यधारा में लौटे। उनका आरोप है कि सरकार के साथ हुए कई समझौतों में जो वादे किए गए थे, उन्हें अभी तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। NLFT नेता थॉमस त्रिपुरा ने कहा कि उनका संगठन करीब 35 वर्षों तक संघर्ष करता रहा है। उनके मुताबिक NLFT और ATTF समेत 7-8 संगठन इस पूरी प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकारों के साथ हुए समझौतों में उनके लागू होने के लिए समयसीमा भी तय की गई थी।
थॉमस त्रिपुरा ने अपनी मांगों को लेकर क्या कहा?
थॉमस त्रिपुरा ने कहा कि 3 पक्षों के बीच हुए समझौते में साफ तौर पर तय किया गया था कि 2028 तक यानी 4 साल के भीतर समझौते की सभी बातों को लागू किया जाना है। लेकिन उनके मुताबिक अब तक इन समझौतों को लागू करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। उनका कहना था कि केंद्र और राज्य सरकार ने जिन बातों पर सहमति जताई थी, उन्हें लागू कराने के लिए ही संगठनों ने आंदोलन का रास्ता चुना है। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से किए गए वादे पूरे नहीं होने के कारण सात संगठनों ने 72 घंटे तक हड़ताल और ब्लॉकेड जारी रखने का फैसला किया है। थॉमस त्रिपुरा के मुताबिक यह आंदोलन सिर्फ संगठनों का नहीं है, बल्कि इसमें तीन-पक्षीय समझौते से जुड़े समूहों, नागरिक समाज और त्रिपुरा के आम लोगों का समर्थन भी है।

क्या है 4 सितंबर 2024 का त्रिपक्षीय शांति समझौता?
संगठनों की सबसे बड़ी मांगों में 4 सितंबर 2024 को हुए त्रिपक्षीय शांति समझौते को तुरंत लागू करना शामिल है। इस समझौते को केंद्र सरकार, त्रिपुरा सरकार और संबंधित समूहों के बीच शांति प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया था। लौटे हुए कैडरों का कहना है कि समझौते में कई मुद्दों पर सहमति बनी थी, लेकिन जमीनी स्तर पर उसके मुताबिक काम नहीं हुआ। संगठन चाहते हैं कि समझौते में किए गए वादों को तय समयसीमा के भीतर लागू किया जाए।
7 संगठनों की 11 प्रमुख मांगें क्या हैं?
संगठनों ने सरकार के सामने कुल 11 मांगें रखी हैं। इनमें पूर्व उग्रवादी कैडरों से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ त्रिपुरा के आदिवासी और स्थानीय समुदायों से जुड़े सवाल भी शामिल हैं।
- नेताओं और कैडरों की सुरक्षा: संगठनों ने अपने नेताओं और पूर्व कैडरों को तत्काल सुरक्षा देने की मांग की है।
- कैडर सूची को स्वीकार किया जाए: लौटकर मुख्यधारा में आए कैडरों की सूची को स्वीकार करने और उसे आधिकारिक रूप से शामिल करने की मांग की गई है।
- 4 सितंबर 2024 के शांति समझौते को लागू किया जाए: संगठनों की सबसे अहम मांगों में 4 सितंबर 2024 के त्रिपक्षीय शांति समझौते का तत्काल क्रियान्वयन शामिल है।
- ST बैकलॉग की रिक्तियां भरी जाएं: अनुसूचित जनजाति यानी ST वर्ग की लंबित बैकलॉग रिक्तियों को तुरंत भरने की मांग की गई है।
- लौटे कैडरों पर दर्ज पुलिस केस वापस हों: आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे कैडरों के खिलाफ दर्ज पुलिस मामलों को वापस लेने की मांग है।
- सामाजिक-आर्थिक विकास पैकेज लागू हो: संगठनों ने सामाजिक-आर्थिक विकास पैकेज (SEDP) के तहत विकास परियोजनाओं को तुरंत लागू करने की मांग की है। इसमें निजी जमीन पर प्रस्तावित परियोजनाएं, व्यक्तिगत परियोजनाएं और चयनित परियोजना घटक भी शामिल हैं।
- टिपरासा जमीन की सुरक्षा: संगठनों ने टिपरासा समुदाय की जमीन और भूमि अधिकारों की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की मांग की है।
- अलग प्रशासन की मांग: आदिवासी और स्थानीय समुदायों के हितों की सुरक्षा के लिए अलग प्रशासन की मांग भी की गई है।
- कोकबोरोक के लिए रोमन लिपि: संगठनों ने कोकबोरोक भाषा के लिए रोमन लिपि को अपनाने और लागू करने की मांग रखी है।
- एक समान प्रथागत कानून: सभी टिपरासा समुदायों के लिए एक समान पारंपरिक/प्रथागत कानून लागू करने की मांग की गई है।
- गांवों और जमीन से जुड़े अधिकार: संगठनों ने प्राचीन गांवों के नाम बहाल करने और उनका नाम बदलने, साथ ही भूमि अधिग्रहण और जमीन आवंटन के अधिकार TTAADC को देने की मांग की है।
TTAADC क्या है और इसे लेकर क्या मांगें हैं?
TTAADC यानी 'त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल' त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों के प्रशासन से जुड़ी स्वायत्त परिषद है। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि भूमि अधिग्रहण और जमीन के आवंटन से जुड़े अधिकार इस परिषद को दिए जाएं। उनका मानना है कि इससे आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकारों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी।
72 घंटे के बंद का ऐलान पहले ही कर दिया गया था
हाईवे ब्लॉकेड शुरू होने से पहले ही NLFT और ATTF से जुड़े लौटे हुए समूहों ने 4 सितंबर सुबह 6 बजे से पूरे त्रिपुरा में 72 घंटे के बंद का ऐलान किया था। इस बंद का मुख्य मुद्दा भी यही है, सितंबर 2024 के त्रिपक्षीय शांति समझौते को लागू करना और पूर्व कैडरों के हितों की सुरक्षा करना। संगठनों ने इसे 'शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन' बताया है। उनका कहना है कि वे लौटे हुए कैडरों के न्याय और सम्मान तथा टिपरासा समुदाय के भविष्य के लिए आंदोलन कर रहे हैं।
सरकार के सामने अब क्या चुनौती है?
फिलहाल प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यातायात को सामान्य करना और आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखना है। पुलिस और प्रशासन प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर रहे हैं। दूसरी ओर, सातों संगठनों ने साफ किया है कि जब तक उनकी मांगों और सरकार के साथ हुए समझौतों को लागू करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जाते, वे अपना 72 घंटे का आंदोलन जारी रखेंगे। बता दें कि आज ही दिल्ली में संसद मार्ग थाने के बाहर CJP का प्रदर्शन चल रहा है, जिसमें संजय कुमार पर हमला करने वाले के खिलाफ की एक्शन की मांग की गई है। (ANI से इनपुट्स के साथ)
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