कश्मीर की झीलों पर आने वाली है मुसीबत! 15 तस्वीरों में देखें 'जन्नत' का बुरा हाल
कश्मीर की झीलों पर आने वाली है मुसीबत! 15 तस्वीरों में देखें 'जन्नत' का बुरा हाल
कश्मीर की झीलें, खासकर डल और वुलर, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, अनियोजित निर्माण और अतिक्रमण के कारण तेजी से सिकुड़ रही हैं। सीवेज और कचरे से पानी दूषित हो रहा है और खरपतवार बढ़ रही है। कई झीलें पहले ही खत्म हो चुकी हैं, जिससे पर्यावरण, पर्यटन और आजीविका पर गंभीर असर पड़ रहा है।
Published : Jul 01, 2026 10:07 am IST, Updated : Jul 01, 2026 10:07 am IST
1/15Image Source : AP
बर्फ से ढके हिमालयी पहाड़ों के बीच फैली डल झील में हर सुबह 'शिकारा' का शांत सफर किसी खूबसूरत तस्वीर जैसा दिखाई देता है। लेकिन इस प्राकृतिक सुंदरता के पीछे एक गंभीर संकट छिपा है। बढ़ता तापमान, प्रदूषण, अनियोजित निर्माण और झीलों में बढ़ते अतिक्रमण के कारण कश्मीर की सैकड़ों झीलें धीरे-धीरे सिकुड़ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सालों में कई झीलें पूरी तरह गायब हो सकती हैं।
2/15Image Source : AP
कश्मीर की सबसे प्रसिद्ध डल झील आज प्रदूषण, पानी में उगने वाली आक्रामक खरपतवार और लगातार घटते जलस्तर जैसी समस्याओं से जूझ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी भी झीलों में पानी की कमी का बड़ा कारण बन रही है। डल झील उन गिनी-चुनी झीलों में शामिल है, जहां सरकार लगातार संरक्षण और सफाई का काम करा रही है। इसके बावजूद हालात चिंताजनक बने हुए हैं।
3/15Image Source : AP
डल झील की सफाई में लगे सरकारी कर्मचारी रोजाना घंटों पानी में उतरकर खरपतवार हटाते हैं। लेकिन यह काम आसान नहीं है। प्रदूषित पानी के कारण उन्हें बिना दस्ताने हाथ डालने से भी डर लगता है। झील की सफाई करने वाले कर्मचारी गुलाम रसूल बताते हैं कि यदि वे दस्ताने न पहनें तो थोड़ी ही देर में हाथों में एलर्जी हो जाती है। इसलिए हर बार सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना पड़ता है।
4/15Image Source : AP
गुलाम रसूल का कहना है कि कई बार उन्हें लगता है कि झील को साफ रखना लगभग असंभव हो गया है। उनके अनुसार शहर का गंदा पानी सीधे झील में गिरता है। पहाड़ों से आने वाले नालों के साथ डायपर, प्लास्टिक और अन्य कचरा भी झील तक पहुंच रहा है। यही वजह है कि रोजाना सफाई के बावजूद झील को पूरी तरह साफ रखना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।
5/15Image Source : AP
विशेषज्ञों के मुताबिक केवल जलवायु परिवर्तन ही नहीं, बल्कि प्रदूषण और बिना योजना के बढ़ते निर्माण कार्य भी झीलों के तेजी से खत्म होने की बड़ी वजह हैं। इसका असर केवल प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि मछुआरों की आजीविका, पर्यटन उद्योग और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। जिन झीलों ने वर्षों तक कश्मीर की पहचान बनाई, वे अब धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खो रही हैं।
6/15Image Source : AP
भारत सरकार की पिछले वर्ष जारी एक रिपोर्ट के अनुसार कश्मीर में मौजूद 697 प्राकृतिक झीलों में से 315 झीलें वर्ष 1967 के बाद पूरी तरह गायब हो चुकी हैं, जबकि 203 झीलों का आकार काफी छोटा हो गया है। कई अन्य झीलें इतनी सिकुड़ गई हैं कि अब वे उथले दलदल, मौसमी आर्द्रभूमि या फिर खेती और अन्य निर्माण क्षेत्रों में बदल चुकी हैं।
7/15Image Source : AP
कश्मीर की झीलें हमेशा स्थानीय लोगों के जीवन का अहम हिस्सा रही हैं। डल झील के तैरते बाजार पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं, जहां लोग सब्जियों से लेकर हस्तशिल्प और स्मृति चिह्न तक बेचते हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में अनियमित बारिश, नदियों से आने वाली अधिक गाद और झीलों के किनारों पर बढ़ते अतिक्रमण ने इनके क्षेत्रफल को लगातार कम कर दिया है। अब झीलों के बीच खेती की छोटी-छोटी जमीनें और अवैध मकानों तक जाने वाले लकड़ी के लंबे पुल आम दृश्य बन गए हैं।
8/15Image Source : AP
हवाई तस्वीरों में भी साफ दिखाई देता है कि डल झील का बड़ा हिस्सा अब खेतों और बस्तियों में बदलता जा रहा है। जहां कभी पानी हुआ करता था, वहां अब मवेशी चरते नजर आते हैं। वहीं दूसरी ओर पारंपरिक मछुआरे उसी झील में मछलियां पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह दृश्य बताता है कि प्राकृतिक जल क्षेत्र पर धीरे-धीरे इंसानी गतिविधियों का कब्जा बढ़ता जा रहा है।
9/15Image Source : AP
झीलों में बिना साफ किया गया सीवेज लगातार गिरने से पानी में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे तत्व बढ़ जाते हैं, जिन पर खरपतवार तेजी से फैलती है। प्लास्टिक और अन्य कचरे ने भी झीलों की हालत खराब कर दी है। डल झील में रोज दर्जनों कर्मचारी खरपतवार निकालते हैं। झील के कई हिस्सों में हटाई गई खरपतवार के ढेर दिखाई देते हैं। इसके अलावा खुदाई करने वाली मशीनों और अन्य भारी उपकरणों की मदद से भी कचरा और खरपतवार हटाई जाती है।
10/15Image Source : AP
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि स्थिति सुधारने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, हालांकि इसके लिए और अधिक धन तथा संसाधनों की जरूरत है। वर्ष 1997 में बनाई गई झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण में सिविल इंजीनियर, वैज्ञानिक, वन विभाग के अधिकारी और पुलिस के प्रतिनिधि शामिल हैं। संस्था का उद्देश्य झीलों के संरक्षण और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए समन्वित तरीके से काम करना है।
11/15Image Source : AP
कश्मीर झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के अधीक्षण अभियंता मुजामिल अहमद रफीकी के अनुसार श्रीनगर की 75 प्रतिशत से अधिक आबादी सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम से जुड़ी हुई है। लेकिन जो घर अब भी इस व्यवस्था से नहीं जुड़े हैं, वहां का बिना उपचार किया गया गंदा पानी सीधे झीलों में पहुंचता है। यही झीलों में प्रदूषण फैलने का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है।
12/15Image Source : AP
जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र दुनिया के औसत तापमान की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। बर्फ पहले पिघल रही है, बर्फबारी कम हो रही है और कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने लगी है। इन बदलावों के कारण नदियों और झीलों तक पहुंचने वाले पानी की मात्रा और समय दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
13/15Image Source : AP
काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के हिमनद वैज्ञानिक शेर मोहम्मद बताते हैं कि मौसम के बदलते पैटर्न के कारण कभी झीलों में अचानक बहुत अधिक पानी आ जाता है तो कभी लंबे समय तक पानी की भारी कमी बनी रहती है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से नदियों के साथ अधिक गाद भी झीलों तक पहुंच रही है। शुरुआत में इससे पानी बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय में ग्लेशियरों का कम होना झीलों और नदियों के लिए नुकसानदायक साबित होगा।
14/15Image Source : AP
कश्मीर विश्वविद्यालय के पर्यावरण वैज्ञानिक इरफान रशीद का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने कश्मीर की अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। अनियमित और चरम मौसम की घटनाओं के कारण जलविद्युत उत्पादन, पर्यटन, सेब के बाग और दुनिया भर में प्रसिद्ध केसर की खेती तक प्रभावित हुई है। उनका कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में नुकसान और बढ़ सकता है।
15/15Image Source : AP
श्रीनगर से करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित वुलर झील के मछुआरे भी इसी संकट का सामना कर रहे हैं। उनका कहना है कि झील पहले की तुलना में काफी उथली हो गई है और कई हिस्सों में नई वनस्पतियां फैल गई हैं। इससे नाव चलाना मुश्किल हो गया है और मछलियों की संख्या लगातार घट रही है। 45 वर्षीय मछुआरे अब्दुल रशीद बताते हैं कि पहले वे एक दिन में करीब एक हजार रुपये कमा लेते थे, लेकिन अब पूरी रात मेहनत करने के बाद केवल 100 से 200 रुपये ही मिलते हैं। उन्हें डर है कि आने वाली पीढ़ियां शायद मछली पकड़कर अपना जीवनयापन ही न कर सकें।