पश्चिम से दक्षिण-पूर्व तक, कौन-सी मनोकामना के लिए किस दिशा में करें मंत्र जप? वास्तु में हर दिशा का है अलग महत्व
पश्चिम से दक्षिण-पूर्व तक, कौन-सी मनोकामना के लिए किस दिशा में करें मंत्र जप? वास्तु में हर दिशा का है अलग महत्व
मान्यता है कि मनोकामना के अनुसार दिशा का चयन करने से धन, वैभव, आकर्षण और शत्रुओं पर विजय जैसी इच्छाओं से जुड़े फल प्राप्त करने के लिए जप किया जा सकता है। जानिए किस दिशा में मुख करके मंत्र जप करने की है मान्यता और क्या है हर दिशा का महत्व।
Published : Oct 13, 2026 08:28 pm IST, Updated : Oct 13, 2026 08:28 pm IST
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वास्तु शास्त्र में दिशाओं का विशेष महत्व बताया गया है। आमतौर पर पूजा-पाठ और मंत्र जप करते समय उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करने की सलाह दी जाती है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दूसरी दिशाओं की ओर मुख करके भी मंत्र जप किया जाता है। आचार्य इंदु प्रकाश से जानें किस दिशा की ओर मुख करके जप करने से किस तरह के फल की कामना की जाती है।
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पश्चिम दिशा: वास्तु शास्त्र के अनुसार, हर दिशा का अपना अलग महत्व है। अगर आप धन, वैभव और ऐश्वर्य की कामना करते हैं, तो पश्चिम दिशा की ओर मुख करके मंत्र जप कर सकते हैं। मान्यता है कि इस दिशा में जप करने से इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनुकूल फल प्राप्त हो सकते हैं।
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उत्तर-पश्चिम दिशा: उत्तर-पश्चिम दिशा को वायव्य कोण कहा जाता है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, इस दिशा की ओर मुख करके मंत्र जप करने से शत्रुओं और विरोधियों पर विजय प्राप्त करने की कामना की जाती है। इसे विरोध और बाधाओं से पार पाने की इच्छा से भी जोड़ा जाता है।
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आग्नेय कोण: दक्षिण-पूर्व दिशा को आग्नेय कोण कहा जाता है। वास्तु शास्त्र में इस दिशा की ओर मुख करके मंत्र जप करने को आकर्षण और सौंदर्य से जुड़ी कामनाओं के लिए बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिशा में जप करना इन इच्छाओं की पूर्ति के उद्देश्य से किया जा सकता है।
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नैऋत्य कोण: दक्षिण-पश्चिम दिशा को नैऋत्य कोण कहा जाता है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, इस दिशा की ओर मुख करके मंत्र जप करने से किसी व्यक्ति के दर्शन की कामना की जाती है। यह दिशा विशेष इच्छा से जुड़े जप के संदर्भ में बताई गई है।
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दक्षिण दिशा: वास्तु शास्त्र के अनुसार, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके मंत्र जप करने का संबंध षट्कर्मों की प्राप्ति से बताया गया है। हालांकि, षट्कर्मों का अर्थ और उनका प्रयोग परंपरा के अनुसार अलग-अलग संदर्भों में समझा जा सकता है। इसलिए इस विषय में किसी जानकार विद्वान से मार्गदर्शन लेना उचित है। सामान्य पूजा-पाठ और जप के लिए उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करने की परंपरा भी प्रचलित है।