अहमदाबादः गुजरात यूनिवर्सिटी में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बीच, इसकी पूर्व वाइस चांसलर नीरजा गुप्ता ने केंद्र सरकार की एक योजना के लिए प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर के पद से इस्तीफा दे दिया और अपने पास मौजूद 14 करोड़ रुपये से ज़्यादा की रकम यूनिवर्सिटी को लौटा दी। नीरजा गुप्ता यूनिवर्सिटी में 'प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम' (PMJVK) योजना की प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर थीं।
नीरजा गुप्ता ने लौटाए पैसे
गुजरात विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति जगदीश जोशी ने बुधवार को बताया कि 16.53 करोड़ रुपये का अनुदान पूर्व कुलपति नीरजा गुप्ता के खाते में जमा किया गया था। 11 अगस्त को उन्होंने ईमेल के ज़रिए रजिस्ट्रार को PMJVK PI के पद से अपना इस्तीफ़ा सौंपा। खर्चों का हिसाब-किताब करने के बाद, उन्होंने बाकी बचे 14.60 करोड़ रुपये डिमांड ड्राफ्ट के ज़रिए गुजरात यूनिवर्सिटी को लौटा दिए। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने यह रकम 10 सितंबर को नए 'प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम' (PMJVK) अकाउंट में जमा कर दी। उन्होंने कहा कि बाकी बचे 2 करोड़ रुपये के लिए ऑडिट किया जाएगा और उसकी रिपोर्ट यूनिवर्सिटी को सौंपी जाएगी।
कांग्रेस के छात्र संगठन 'नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ इंडिया' (NSUI) के सदस्यों ने पहले आरोप लगाया था कि गुजरात यूनिवर्सिटी की तत्कालीन VC रहते हुए नीरजा गुप्ता करोड़ों रुपये के घोटाले में शामिल थीं। NSUI कार्यकर्ताओं ने GU के रजिस्ट्रार पीयूष पटेल के इस्तीफ़े की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था।
10 कर्मचारी सस्पेंड
नीरजा गुप्ता ने इस साल जुलाई में यूनिवर्सिटी की VC के तौर पर अपना तीन साल का कार्यकाल पूरा किया। कार्यकाल खत्म होने के बाद भी वह केंद्रीय योजना की प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर के पद पर बनी रहीं। गौरतलब है कि गुजरात यूनिवर्सिटी में नीरजा गुप्ता द्वारा नियुक्त किए गए 10 अस्थायी कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया गया था। यह कार्रवाई कथित अनियमितताओं की जांच के लिए बनाई गई एक कमेटी की सिफारिश पर की गई थी, जिनसे यूनिवर्सिटी के खजाने को करोड़ों का नुकसान हुआ था।
क्यों हुआ था विवाद
गुजरात यूनिवर्सिटी की वाइस-चांसलर के तौर पर नीरजा गुप्ता का कार्यकाल खत्म होने के बाद, उन पर करोड़ों रुपये के घोटाले के आरोप लगे। यूनिवर्सिटी में शुरू किए गए PMJVK प्रोजेक्ट के तहत, उन्होंने खुद को प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर नियुक्त किया और अपने नाम पर एक नया अकाउंट खोला, जो प्रोजेक्ट के लिए मिली ग्रांट से जुड़ा था। यह विवाद तब शुरू हुआ जब पता चला कि ग्रांट की राशि नए अकाउंट में जमा की गई थी। वाइस-चांसलर का पद छोड़ने के बाद भी उन्होंने प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर के पद से इस्तीफ़ा नहीं दिया। नए अकाउंट में जमा किए गए पैसे भी यूनिवर्सिटी में जमा नहीं कराए गए, जिससे नीरजा गुप्ता पर गंभीर आरोप लगे।
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