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Blog: आधी आबादी को मिली सबरीमाला मंदिर में पूजा की आजादी

 Edited By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Sep 28, 2018 05:49 pm IST,  Updated : Sep 28, 2018 05:49 pm IST

कोर्ट के इस फैसले के बाद अब जो उम्र का बैरियर भगवान और भक्त के बीच मंदिर प्रबंधन ने लगाया था वो ध्वस्त हो गया है।

Blog: सबरीमाला में आधी आबादी को पूजा की आजादी- India TV Hindi
Blog: सबरीमाला में आधी आबादी को पूजा की आजादी

अर्चना सिंह | सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, वर्षों पुरानी परंपरा या इसे कुरीति कहें तो बेहतर होगा, को असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद अब जो उम्र का बैरियर भगवान और भक्त के बीच मंदिर प्रबंधन ने लगाया था वो ध्वस्त हो गया है। अब हर उम्र की महिला भगवान अयप्पा के दर्शन कर सकती है, हलांकि भगवान के लिए भक्त, भक्त होता है महिला या पुरुष तो इस दुनियावी शब्द हैं। कोर्ट ने कहा महिलाएं समाज में बराबरी की हिस्सेदार हैं, समाज को सोच बदलनी होगी पुरानी मान्यताएं और पितृसत्तात्मक सोच महिलाओं के अधिकारों के आड़े नहीं आनी चाहिए। 

पहले दस से पचास साल तक की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबन्ध था। मंदिर प्रबंधन का तर्क था कि हिन्दू मान्यता के अनुसार मासिक धर्म के दौरान महिलाएं अपवित्र होती हैं, इसीलिए मंदिर के ४१ दिन के ब्रह्मचर्य नियम का पालन नहीं कर सकतीं और भगवन अयप्पा ब्रह्मचारी हैं लिहाजा महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं। इस कुरीति में महिला का माहवारी के दौरान अपवित्र होना कारण था।

आज के समय में क्या महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अपवित्र मानना तर्कसंगत है और इस सोच के लिए पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी बराबर की नहीं, बल्कि ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं। कुछ महिलाएं जो इस सोच खिलाफ खड़ी हुईं, उन्हें समाज में अलग-अलग विशेषणों से सम्बोधित किया गया। आज भी आपको अपने आस-पास इन रूढ़िवादी मान्यता को मानते बहुत लोग मिल जाएंगे, इसीलिए अगर समाज में बदलाव लाना है तो शुरुआत अपने घर से करनी होगी। 

जहां तक माहवारी का सम्बन्ध है तो महीने में एक बार रक्तस्राव बताता है की महिला स्वस्थ है, इस दौरान उसका शरीर गर्भधारण की तैयारी करता है। मासिक धर्म नए जीव के सृजन के लिए प्रकृति का संकेत है और सृजन प्रकृति का मूल नियम है तो ये अपवित्र, अछूत, अप्राकृतिक कैसे हो सकता है। 

हमारा समाज महिलाओं को देवी तो बड़ी आसानी से मान लिया जाता है लेकिन उसे हाड़-मास का इंसान मानना कठिन लगता है। समाज में पुरुष पूर्णतः में स्वीकार है लेकिन महिला को यही समाज टुकड़ों में स्वीकार करता है। समाज को सोच बदलने की ज़रुरत है, जहां जरूरत हो वहां अपनी दकियानूसी सोच से ऊपर उठकर वैज्ञानिक नज़रिया अपनाएं। महिला को न देवी माने न डायन, बस स्वीकार करें कि प्रकृति ने उसे शक्ति स्वरुप और पूर्ण बनाया है इसीलिए उसमे सृजन की शक्ति भी दी है। तो बस स्त्री को उसके उसी पूर्ण स्वरुप में स्वीकार करें।

(ब्लॉग की लेखिका अर्चना सिंह इंडिया टीवी में न्यूज ऐंकर हैं। इस लेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं)

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