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जलिकट्टू के आयोजन के लिए केंद्र करे अध्यादेश जारी: जयललिता

 Written By: IANS
 Published : Jan 12, 2016 11:00 pm IST,  Updated : Jan 12, 2016 11:00 pm IST

नई दिल्ली: तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे.जयललिता ने मंगलवार को केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह जलिकट्टू के आयोजन के लिए तुरंत अध्यादेश जारी करे। जयललिता ने यह पत्र सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जलिकट्टू पर रोक

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​center should issue ordinance to organize jallikattu says jayalalitha

नई दिल्ली: तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे.जयललिता ने मंगलवार को केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह जलिकट्टू के आयोजन के लिए तुरंत अध्यादेश जारी करे। जयललिता ने यह पत्र सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जलिकट्टू पर रोक लगाए जाने के बाद लिखा। शीर्ष अदालत ने सांड़ों पर काबू पाने वाले इस खेल को पशुओं के प्रति क्रूरता करार दिया है। रोक की इस खबर से तमिलनाडु में बहुत से लोग स्तब्ध रह गए। राज्य में 14 जनवरी से पोंगल पर्व शुरू हो रहा है और इसी में पारंपरिक रूप से जलिकट्टू का आयोजन किया जाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे पत्र में जयललिता ने लिखा है, "मैं पूरी मजबूती से अपने पहले के इस अनुरोध को दोहरा रही हूं कि सरकार जलिकट्टू के आयोजन के लिए अध्यादेश पारित करे।" जयललिता ने लिखा है कि सबसे पुराना यह खेल राज्य की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े पारंपरिक पर्वो से गुंथा हुआ है। यह बेहद जरूरी है कि तमिलनाडु की जनता की भावनाओं का ख्याल रखा जाए। उन्होंने लिखा है, "तमिलनाडु की जनता की तरफ से मैं आपसे इस मामले में तुरंत कार्रवाई करने का अनुरोध करती हूं।"

जयललिता ने मंगलवार को यह पत्र सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद लिखा, जिसमें तमिलनाडु के पारंपरिक खेल जलिकट्टू को अनुमति देने वाली केंद्र सरकार की अधिसूचना को स्थगित कर दिया गया था। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि इस खेल को 21वीं सदी में अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह पशुओं के साथ क्रूरता है।

2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने सांड़ों को काबू करने के इस खेल पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन, तमिलनाडु सरकार की अपील पर केंद्र सरकार ने इस खेल की अनुमति देने के लिए पिछले गुरुवार को एक अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना के खिलाफ पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। न्यायालय के मंगलवार के फैसले पर मौलेखी ने कहा कि वह केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को निरस्त कराना चाहती थीं, लेकिन न्यायालय ने इस पर स्थगन दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार और अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी किया। जलिकट्टू तमिलनाडु का एक लोकप्रिय सर्वाधिक प्राचीन खेल है। इसमें सांड़ों का उपयोग होता है और युवा लोग ताकतवर सांड़ों को काबू में करने की कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में कई युवकों की मौत हो चुकी है लेकिन फिर भी इसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है।

जलिकट्टू पर रोक के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर मिश्रित प्रतिक्रिया हुई है। पशु अधिकारों के लिए काम करने वालों ने शीर्ष अदालत के फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि ऐसे किसी खेल को जायज नहीं ठहराया जा सकता, जिसमें पशुओं के साथ क्रूरता की जाए। जबकि, राजनैतिक दलों के नेताओं ने इस फैसले पर निराशा जताई है।

पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई) के उपाध्यक्ष एस.चिन्नी कृष्णा ने चेन्नई में आईएएनएस से कहा, "यह खबर सुनकर मुझे बेहद खुशी हुई है। यह दुखद है कि इस मामले में लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है।" उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद यह संघर्ष खत्म होगा या नहीं, यह सरकार के फैसले पर निर्भर करेगा। लेकिन, तमिझागा वाजवुरिमई काचि के संस्थापक और पूर्व विधायक टी.वेलमुरुगन ने आईएएनएस से कहा, "सर्वोच्च न्यायालय ने कानून के हिसाब से फैसला किया है। दोष केंद्र सरकार का है। यह कानून में सही तरीके से संशोधन कर प्रतिबंधित सूची से सांड़ को हटा सकती थी।" उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को इस मामले में कानून के जानकारों से सलाह लेनी चाहिए। राज्य सरकार अध्यादेश लाकर जलिकट्टू को बतौर खेल करने की इजाजत दे सकती है, क्योंकि खेल समवर्ती सूची में आता है।

पीएमके के संस्थापक एस.रामदास ने जलिकट्टू पर रोक के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि दोनों सरकारों ने ऐसे उपाय किए थे, जो कानून के सामने टिक नहीं सकते थे। सेनापति कांगायम कैटल रिसर्च फाउंडेशन से संबद्ध के. शिवसेनापति ने आईएएनएस से कहा कि जलिकट्टू पर पूरी तरह से रोक लगाने से भारतीय सांड़ों की नस्ल पर बुरा असर पड़ेगा। नौबत विदेशी पशु के आयात तक की आ सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार को उन मालिकों पर कार्रवाई करनी चाहिए, जिनके सांड़ों के साथ क्रूरता की गई है। दोषी को सजा मिलनी चाहिए, न कि खेल को।

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