नई दिल्ली: माइक्रोसाफ्ट सीईओ सत्या नडेला आज भारत दौरे पर हैं। कार्यक्रम के मुताबिक उन्हें दौरे में बिजनेस जगत की तीन बड़ी हस्तियों से मुलाकात करनी हैं, जिसमें महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा, एक्सिस बैंक की मुखिया शिखा शर्मा और टाटा स्टार बक्स की सीईओ अवनी दावडा। इन तीनों में से अवनी ने तो मात्र 33 साल की उम्र में टाटा की एक कंपनी में सीईओ का तमगा हासिल कर लिया, जो आसान नहीं है। साल 2002 में टाटा ग्रुप से जुड़ने वाली अवनी सिर्फ दस सालों के भीतर टाटा के एक वेंचर की सीईओ बन गईं, यह सक्सेस स्टोरी बेहद प्रेरणा दायक है।
अवनी की सफलता की कहानी-
अवनी की सक्सेस स्टोरी साधारण, लेकिन प्रेरणादायक है। साल 2002 में मुंबई के नर्सी मोंजे इंस्टीट्यूट से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने इसी साल टाटा ग्रुप में बतौर प्रशासनिक सेवा परीक्षार्थी (Administrative Service Probationer) ज्वाइन किया था। वो जल्द ही जनरल मैनेजर (GM) की पोस्ट तक पहुंच गईं। पांच साल तक अपनी सेवाएं देने के बाद टॉटा ग्लोबल बेवरेज के चेयरमैन आर के कृष्णा कुमार ने उन्हें अपना कार्यकारी सहायक बना लिया। अवनी कुमार को एक मेंटर के तौर पर मानती हैं जिन्होंने उन्हें बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार किया। उन्होंने बताया, यह मेरे लिए एक बेहतर अवसर था ताकि मैं संस्थान को अलग नजरिए और अलग प्रकाश से साथ देख पाऊं। मैं इसे एक चुनौती की तरह देख रही थी और इस सोच ने ही मेरी मदद की।” सितंबर 2012 में अवनी टाटा स्टारबक्स लिमिटेड की सीईओ बन गईं। आपको बता दें कि स्टारबक्स अकेले मुंबई, दिल्ली,पुणे और बैंगलुरु में ही 31 कैफे संचालित करता है।
नहीं छोड़ा टाटा का साथ
ऐसे समय में जब लोग हर एक-दो साल में अपनी कंपनी बदले को तरजीह देते हैं अवनी का एक ही कंपनी में टिके रहना हैरान करता है। इस पर खुद अवनी कहती हैं, “मैं बेहद साधारण परिवार से आती हूं और मैं अपनी आर्थिक मजबूरियों के चलते काम नहीं कर रही हूं। मुझे जब भी कम संतोष मिलता दिखेगा, मैं जॉब छोड़ दूंगी। मैं एक संस्थान से साथ लंबे समय से इसलिए जुड़ी हूं, क्योंकि मैं जो करती हूं उसका आनंद लेती हूं।” अवनी मानती हैं कि लाइफ की हमेशा एक बड़ी पिक्चर देखनी चाहिए।