नयी दिल्ली: उर्दू कवि मुनव्वर राणा उन 30 से भी ज्यादा लेखकों में शामिल हो गए जिन्होंने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए हैं। वहीं हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि वह बढ़ती असहिष्णुता का विरोध कर रहे लेखकों पर विभिन्न मंत्रियों की गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियों के खिलाफ सम्मान लौटा रहे हैं।
अन्य लेखकों एवं नेताओं के साथ टीवी पर प्रसारित होने वाली एक बहस में हिस्सा लेते हुए समकालीन उर्दू कविता के बड़े नाम राणा ने कहा कि, उन्होंने पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है क्योंकि देश में हाल की घटनाओं से वह व्यथित हैं।
उन्होंने कहा, मैं साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटा रहा हूं। मैं भविष्य में सरकार से कोई पुरस्कार स्वीकार नहीं करूंगा।
साल 2014 में अपनी किताब शाहदबा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किए गए 62 साल के राणा ने कहा, मैं राय बरेली से आता हूं। राजनीति मेरे शहर में गलियों-नालों से होकर गुजरती है। लेकिन मैंने कभी इसकी परवाह नहीं की।
उन्होंने कहा, लेखक एवं साहित्यकार एक पार्टी या दूसरी पार्टी से जुड़े रहे हैं। कुछ के बारे में कहा जाता है कि कांग्रेस से जुड़े हैं तो कुछ भाजपा से जुड़े हैं।
राणा ने कहा, मैं एक मुसलमान हूं और कुछ लोग मुझे पाकिस्तानी करार दे सकते हैं। इस देश में कई इलाके बिजली के तारों से नहीं जुड़े हैं लेकिन यहां मुस्लिमों के तार दाउद इब्राहिम से जुड़े बता दिए जाते हैं।
उन्होंने भारत में बढ़ती धार्मिक असहनशीलता के खिलाफ चिंता जाहिर की।
इस बीच, साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा रहे लेखकों पर विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों की ओर से की गई गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियों के
विरोध में काशीनाथ सिंह ने कहा कि वह सोमवार को अपना पुरस्कार और नगद राशि सौंप देंगे।
अपनी रचना रेहन पर रघु के लिए 2011 में साहित्य अकादमी पुरस्कार पा चुके सिंह ने कहा, केंद्र के कुछ मंत्रियों ने पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों के खिलाफ गैर-जिम्मेदाराना बयान दिए हैं । लेखकों के निर्णय को गंभीरता से नहीं लिया गया।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर सिंह ने इस आरोप को हास्यास्पद बताकर खारिज कर दिया कि लेखक राजनीति से प्रेरित हैं।
इसी से जुड़े घटनाक्रम में तेलुगु अनुवादक कात्यायनी विदमाहे ने भी घोषणा की है कि वह 2013 में प्राप्त केंद्रीय साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार लौटाएंगी।
विदमाहे ने कहा, मैं कई घटनाओं, जिसमें तमिल लेखक पेरूमल मुरूगन की हत्या, कन्नड़ लेखक एम एम कलबुर्गी की हत्या, पर अपनी असहमति जाहिर करते हुए पुरस्कार लौटा रही हूं। यह हिंसा लेखकों के खिलाफ और अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है।