नई दिल्ली: “मुझे इल्म हो गया मेरे इंसा होने का और मैं भूल गया कि मैं हिंदू था कि मुसलमान।” कहते हैं कि हम सब एक ही कुदरत में जीने वाले बंदे हैं। हम जब पैदा हुए तो न तो हिंदू थे न मुसलमान, न सिक्ख थे और न ही ईसाई। हम यह भी नहीं जानते थे कि हमें किस की इबादत करनी है।
मगर दुनिया में पहले से मौजूद लकीरों और तकदीरों की समझ का दावा करने वाले फकीर और पीर ही हमें बताते हैं कि हमें माता की आरती उतारनी है या मुहम्मद की चौखट पर सजदा। हमें जीसस को सबकुछ मानना है या हमारे लिए वाहे गुरु ही भगवान हैं। मगर इन सबों के बावजूद हिंदुस्तान की जमीन पर कभी-कभी एक ऐसा जुनून दिख जाता है जो जात-पात और धर्म की सभी सीमाओं को लांघ देता है। इस जुनून को ही इंसानियत की जुबां में बंदगी कहा जाता है।
मायानगरी मुंबई में एक ऐसा बंदानवाज़ है जो धर्म से मुसलमान होते हुए भी अपने सिर पर कलश उठाकर प्रभु की भक्ति में मीरा के भजन गाता है। शेख रियाजुद्दीन अब्दुल गनी नाम का एक शख्स बीते कई सालों से पानी भरा कलश अपने सिर पर रखकर नृत्य का प्रदर्शन (डांस) करते हैं।
इतना ही नहीं वो जब भी वीणा की मधुर झंकार पर मीरा के भजन गाते हैं वो आनंदित हो उठते हैं। उन्हें काफी चर्चित मंदिरों में भजन कीर्तन के लिए बुलाया जाता है और उन्हें कई दफे इनाम भी मिल चुका है। अब्दुल गनी के बारे में यह भी कहा जाता है कि वो लोगों का विश्वास भी जगा सकते हैं और आपकी शराब पीने की बुरी लत को भी छुड़वा सकते हैं। गनी ने बताया कि यह सब संगीत की ताकत के चलते नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, “हमारे भीतर भगवान रहता है”। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनका यह सब करना कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा है।
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