नयी दिल्ली: उच्च न्यायालयों के नाम बदलने की बढ़ती मांगों के बीच सरकार अदालतों के नाम बदलने की शक्ति राष्ट्रपति को सौंपने के लिए एक कानून बनाने पर विचार कर रही है ताकि राष्ट्रपति राज्य प्रशासन और संबंधित मुख्य न्यायाधीशों से सलाह करने के बाद अदालतों के नाम बदल सकें।
इससे पहले कानून मंत्रालय ने मामलों के आधार पर उच्च न्यायालयों के नाम बदलने के लिए एक विधेयक लाने की योजना बनाई थी। तब योजना थी कि संसद में कानून बना कर पहले बंबई और मद्रास उच्च न्यायालयों का नाम क्रमश: मुंबई और चेन्नई उच्च न्यायालय कर दिया जाए।
इस बीच, विभिन्न राज्यों और अन्य भागीदारों की नई मांगों के मद्देनजर न्याय विभाग अब राज्य प्रशासन - मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल - और संबंधित मुख्य न्यायाधीशों से सलाह करने के बाद किसी उच्च न्यायालय का नाम बदलने की शक्ति राष्ट्रपति को सौंपने के एक प्रस्ताव पर काम कर रहा है।
कानून मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि ताजा प्रस्ताव के पीछे दलील यह दी जा रही है कि जब भी किसी उच्च न्यायालय का नाम बदलने का प्रस्ताव स्वीकार होता है तो हर बार सरकार को कोई नया विधेयक लाने की जरूरत नहीं होगी। अभी नए प्रस्ताव से जुड़े कानूनी बिंदुओं पर विचार किया जा रहा है। इसके बाद प्रस्ताव को केन्द्रीय मंत्रिमंडल को भेजा जाएगा।
अभी किसी उच्च न्यायालय के नाम बदलने के लिए सरकार के पास इस तरह का कोई तंत्र मौजूद नहीं है।
उच्च न्यायालयों की तरफ सें मांग है कि उनका नाम शहरों के मौजूदा नाम से मेल खाए।
बंबई उच्च न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय के अलावा नामा बदलने की मांग कलकत्ता उच्च न्यायालय की भी है। वहां इसका नाम बदल कर कोलकाता उच्च न्यायालय करने की मांग है।
हाल फिलहाल, लोकसभा में बीजू जनता दल के सांसदों ने मांग की थी कि उड़ीसा उच्च न्यायालय का नाम बदल कर ओडिशा उच्च न्यायालय कर दिया जाए। बीजद सांसद बी महताब ने इस सिलसिले में कानून मंत्री डीवी सदानंद गौडा को एक पत्र भी लिखा था। गौडा ने उनसे कहा कि वह उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति के साथ राज्य सरकार का एक प्रस्ताव भिजवाएं।