नई दिल्ली: केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली में सुधार के लिए सुझाव लेने की उच्चतम न्यायालय की इच्छा दर्शाती है कि इस प्रक्रिया में कुछ गलत है। फैसले के गुण-दोषों में नहीं जाते हुए प्रसाद ने कहा, उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वह तीन नवंबर से कॉलेजियम प्रणाली में सुधार के मुद्दे पर सुनवाई करेगा। यह दिखाता है कि कॉलेजियम प्रणाली में कुछ गलत है।
उच्चतम न्यायालय और देश में 24 उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए बनाया गया कानून खारिज करने के संविधान पीठ के फैसले के संबंध में प्रसाद ने संवाददाताओं से कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम देश में न्यायिक सुधारों का हिस्सा था जिसे पूरी संसद और प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं का समर्थन था। उन्होंने कहा, यह अचानक से नहीं हुआ था। संविधान समीक्षा आयोग, प्रशासनिक सुधार आयोग और संसदीय स्थाई समितियों ने अपनी तीन रिपोर्टों में इस तरह के कानून की सिफारिश की थी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जब पिछले साल विधेयक को मंजूरी दी थी और फिर संसद के दोनों सदनों ने इसे पारित किया था, तब प्रसाद कानून मंत्री थे। उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की दो दशक से अधिक पुरानी कॉलेजियम प्रणाली की जगह लेने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून लाया गया था।
प्रसाद ने कहा कि कई सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई थी कि कॉलेजियम प्रणाली में बदलाव पर विचार की जरूरत है। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ने कहा, लोकसभा और राज्यसभा में इनके लिए सर्वसम्मति से समर्थन था। मत विभाजन के दौरान राज्यसभा में केवल एक वाकआउट हुआ था। उन्होंने कहा, 20 राज्यों की विधानसभाओं ने इसका अनुमोदन किया। 1993 के उच्चतम न्यायालय के फैसले (कॉलेजियम प्रणाली लाने वाले फैसले) के मुख्य रचनाकार (दिवंगत) न्यायमूर्ति जे एस वर्मा ने भी कॉलेजियम प्रणाली पर गंभीरता से पुनर्विचार का सुझाव दिया था और ऐसा ही मत न्यायमूर्ति वी आर कृष्णा अयर का था।
संविधान में कॉलेजियम प्रणाली है ही नहीं: महाधिवक्ता
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम को लेकर सरकार को लगे झटके के कुछ घंटों बाद महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के आज के फैसले से दोबारा लागू होने वाली कॉलेजियम प्रणाली का संविधान में कहीं उल्लेख नहीं है और अपारदर्शी होने के कारण यह उचित नहीं है। हालांकि रोहतगी ने मामले में समीक्षा की मांग के विकल्प को खारिज करते हुए कहा, मुझे नहीं लगता कि यह किसी भी तरह से समीक्षा का मामला है क्योंकि फैसला विस्तृत है और हजारों पन्नों में है।