
होता रहा है विरोध
सामाजिक कार्यकर्ता इस टेस्ट का लंबे समय से विरोध करते रहे हैं। साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था, ‘टू फिंगर टेस्ट पीड़िता को उतनी ही पीड़ा पहुंचाता है जितना उसके साथ हुआ रेप। कोर्ट ने तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा था की इससे पीड़िता का अपमान होता है और यह उसके अधिकारों का हनन भी है। इस तरह का टेस्ट मानसिक पीड़ा देता है, सरकार को इस तरह के टेस्ट को ख़त्म कर कोई दूसरा तरीका अपनाना चाहिए।’ चाइल्ड राइट एक्टिविस्ट राजमंगल प्रसाद ने इस पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है। एम्स के फोरेंसिक एक्सपर्ट डॉक्टर सुधीर गुप्ता का कहना है कि डॉक्टर्स यह टेस्ट रेप विक्टिम के सेक्सुअल एक्सपीरियेंस और पेनीट्रेशन को जांचने के लिए करते हैं लेकिन यह अच्छा तरीका नहीं है।
“सेक्स अपराध कानून का विषय है: जस्टिस जे॰एस॰ वर्मा समिति
जस्टिस जे॰एस॰ वर्मा समिति की रिपोर्ट के अनुसार “सेक्स अपराध कानून का विषय है, न मेडिकल डायग्नोसिस का।” रिपोर्ट में कहा गया है कि महिला की वजाइना के लचीलेपन का बलात्कार से कोई लेना-देना नहीं है। इसमें टू फिंगर टेस्ट न करने की सलाह दी गई है। रिपोर्ट में डॉक्टरों के यह पता लगाने पर भी रोक लगाने की बात कही गई है जिसमें पीड़िता के ‘यौन संबंधों में सक्रिय होने’ या न होने के बारे में जानकारी दी जाती है
किसने किया इजाद
फ्रांसीसी मेडिकल विधिवेत्ता एल॰ थोइनॉट ने 1898 के आसपास नकली और असली कुंआरी लड़कियों में फर्क करने वाली जाँच के लिए इस तरह का टेस्ट ईजाद किया था। नकली कुंआरी उस महिला को कहा जाता था, जिसकी हाइमन लचीलेपन के कारण सेक्स के बाद भी नहीं टूटती है।