
परमार्थ संस्था के प्रमुख संजय सिंह ने आईएएनएस को बताया कि विकास कार्य में गांव के लोगों की हिस्सेदारी व भागीदारी रहे, इसलिए एकीकृत जल प्रबंधन योजना के तहत होने वाले कार्यो में 10 प्रतिशत की राशि अंशदान के तौर पर ली जाती है। इतना ही नहीं, विकास कार्य पर खर्च होने वाली राशि और चल रहे काम पर नजर भी गांव के लोगों की होती है। संस्था की ओर से तकनीकी परामर्श दिया जाता है।
गांव के बैजनाथ पाल का कहना है, "कई वर्ष बाद उन्होंने इस तालाब को पानी से इस तरह भरे हुए देखा है, उनका मन खुश है और उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि आने वाले समय में पानी की किल्लत से जूझना पड़ेगा। यह सब गांव के लोगों की एक जुटता और मेहनत के बल पर हुआ है। तालाब हमारा है और हमने उसे बचाने के प्रयास किए हैं।"
टीकमगढ़ जिले के कांटी, कौंडिया, बनगांय, गोर आदि में किसानों ने सामुदायिक हिस्सेदारी के बल पर तालाबों की सूरत बदल दी है। बारिश के पानी के होने वाले रिसाव को रोकने के इंतजाम किए गए हैं, वहीं ज्यादा पानी आने पर सलूस के जरिये जल निकासी को भी सुधारा गया है। लिहाजा, गांव वालों ने अपनी मेहनत से हालात से लड़ने की नई इबारत लिख डाली है।