मानव जीवन के लिए जल, जंगल और जमीन तीनों प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता नितांत आवश्यक है, लेकिन अफसोस तीनों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इन्सान जिस डाल पर वह बैठा है उसे ही काट रहा है। प्राकृतिक संसधानों के ज़रूरत से ज़्यादा दोहन की वजह से देश जल और जंगल दोनों के संकट से जूझ रहा है।
देश के अनेक राज्य जल संकट से त्रस्त
दक्षिण भारत के मराठवाड़ा, बुंदेलखंड समेत दस राज्य सूखे की चपेट हैं। मराठवाड़ा और लातूर में इतनी भयावह स्थिति है कि उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती है। मासूम बच्चे अपनी प्यास बुझाने के लिए कीचड़युक्त गंदे पानी को पी रहे हैं। पानी की तलाश में गहरे कुएं में तक में उतर रहे हैं। दक्षिण में जल संकट और उत्तर में जलता जंगल, लेकिन इस विकट स्थिति के समाधान का रास्ता दूर-दूर तक नहीं। पानी के बिना हजारों पशु-पक्षी दमतोड़ चुके हैं। सरकार को इन इलाकों के लिए वाटर रेल चलानी पड़ रही है। लातूर में धारा 144 लगानी पड़ी है। जल माफिया के कारण जलाशयों पर पुलिस का पहरा बिठाना पड़ा। ग्रामीण परिवारों की आबादी करीब 17 करोड़ से अधिक है, जिसमें 25 फीसदी से अधिक यानी 4,41,390 घरों में पेयजल की त्रासदी चरम पर है और 15,345 घरों में सरकार टैंकर से पानी उपलब्ध करा रही है। 13,372 बोरवेल खोदे गए हैं। 44,498 नए बोरबेल पर काम चल रहा है।
जंगलों की आग सबसे बड़ी चुनौती
इंसानी और जंगली जीवों के लिए जंगल सबसे अहम है, लेकिन उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू के जंगलों में लगी आग हमारे लिए बड़ी चुनौती साबित हो रही है। उत्तराखंड के 13 जिलों में यह आग फैल चुकी है। 1500 गांवों पर खतरा मंडरा रहा है। आग की जद में आने से आधे दर्जन लोग इस दुनिया से अलविदा हो गए, जिसमें दो मासूम बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं। आग से करीब 1900 हेक्टेयर में फैले जंगल को भारी नुकसान हुआ है। राज्य में 'जिम कार्बेट' समेत तीन पार्क हैं, जिन पर भी बड़ा खतरा मंडराने लगा है। 'जिम कार्बेट' का 200 एकड़ जंगल खाक हो चला है। संरक्षित वन्यजीवों पर भी खतरा बढ़ गया है।
सूखे और जंगल की आग से निपटने के लिए तंत्र विकसित करना होगा
आग इतनी भयानक है कि एक राष्ट्रीय राजमर्ग को भी बंद करना पड़ा है। राज्यपाल ने 6000 हजार से अधिक लोगों को आग पर काबू पाने के लिए तैनात किया है। पांच करोड़ की राशि मंजूर की गई है। आक्सीजन की मात्रा अधिक होने की वजह से जंगलों में आग अधिक तेज फैलती है, क्योंकि आक्सीजन आग को जलाने में सहायक होती है। देश में जल और जंगल का संकट हमारे लिए विचारणीय बिंदु है। आजादी के कई वर्षो बाद हमने इस तरह का कोई ऐसा तंत्र नहीं विकसित किया, जिससे इस तरह की आपदाओं से निपटा जाए।