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समाजशास्त्र की किताब में दहेज की 'तारीफ', लिखा- बदसूरत लड़कियों की भी हो सकती है शादी, मचा बवाल

 Edited By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Apr 05, 2022 08:26 pm IST,  Updated : Apr 05, 2022 08:26 pm IST

किताब में दहेज के पर लिखी इस पाठ्य-सामग्री ने सोशल मीडिया सहित विभिन्न हलकों में तूफान खड़ा कर दिया। लोगों ने इस तरह की चीजें लिखने वाले लेखकों और बेचने वाले प्रकाशकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की।

sociology book- India TV Hindi
sociology book Image Source : IANS

मुंबई: एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, दहेज प्रथा के 'वरदानों' पर आधारित कॉलेज में पढ़ाई जाने वाली समाजशास्त्र की एक पाठ्यपुस्तक के प्रकाशकों ने मंगलवार को कहा कि उन्होंने किताब को तत्काल बाजार से वापस लेने का फैसला किया है। नई दिल्ली स्थित जेपी ब्रदर्स मेडिकल पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड की प्रवक्ता समीना खान ने बताया, "हम सूचित करना चाहते हैं कि हमने बाजार से (पाठ्य) पुस्तक को वापस लेने के लिए तत्काल कदम उठाए हैं। हम ऐसे मामलों को अत्यंत गंभीरता से लेते हैं और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए आंतरिक प्रक्रियाओं को मजबूत करना जारी रखेंगे।"

उन्होंने कहा, जेपी ब्रदर्स 'एक जिम्मेदार प्रकाशक' हैं और पांच दशकों से अधिक समय से चिकित्सा समुदाय की सेवा कर रहे हैं। हालांकि, किताब की कितनी प्रतियां वापस ली जाएंगी और उन्हें कैसे बदला जाएगा, इसका ब्योरा नहीं दिया गया है। यह कदम एक बड़ी कामयाबी के रूप में सामने आया है, क्योंकि आईएएनएस ने सोमवार को जब इस मुद्दे को उजागर किया था, तब प्रकाशकों ने कहा था कि वे किताब के शीर्षक को संशोधित नहीं करेंगे, लेकिन पाठ्यपुस्तक के भविष्य के संस्करणों में आपत्तिजनक हिस्सों को हटा देंगे।

वरिष्ठ लेखक टी. के. इंद्राणी द्वारा लिखित 'नर्सो के लिए समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक' ने इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया है कि दहेज की घृणित प्रथा वास्तव में समाज के लिए अच्छी है और तर्क दिया है कि यह 'बदसूरत दिखने वाली लड़कियों' के माता-पिता को उनकी शादी कराने में मदद करती है। किताब के अध्याय 6 का शीर्षक है 'सामाजिक ज्ञान के रत्न' और इसकी पृष्ठ संख्या 122 में बताया गया है कि दूल्हे के माता-पिता द्वारा दहेज स्वीकार किए जाने का मुख्य कारण यह है कि उन्हें अपनी बेटियों और बहनों (निवर्तमान) को दहेज देना पड़ता है। दावा किया गया है, "वे अपनी बेटियों के लिए पति खोजने का अपना दायित्व पूरा करने के लिए स्वाभाविक रूप से अपने बेटों के (आने वाले) दहेज पर नजर रखते हैं।"

इस पाठ्य-सामग्री ने सोशल मीडिया सहित विभिन्न हलकों में तूफान खड़ा कर दिया। लोगों ने इस तरह की चीजें लिखने वाले लेखकों और बेचने वाले प्रकाशकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेद्र प्रधान को पत्र लिखकर बी-एससी के दूसरे वर्ष के लिए निर्धारित इस पाठ्यपुस्तक के 'प्रसार को तुरंत बंद करने' और महाराष्ट्र व अन्य राज्यों में पाठ्यक्रम से इसे हटाने की मांग की। प्रियंका ने कहा, "यह भयावह है कि इस तरह के अपमानजनक और समस्यात्मक पाठ प्रचलन में हैं और एक पाठ्यपुस्तक दहेज के गुणों का बखान करती है। यह वास्तव में हमारे पाठ्यक्रम में मौजूद है और देश और संविधान के लिए शर्म की बात है।" उन्होंने केंद्रीय मंत्री से शैक्षणिक पाठ्यक्रम से पाठ्यपुस्तक को हटाने और विशेषज्ञों के एक पैनल द्वारा सभी मौजूदा पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा कराने की भी अपील की।

इंडियन नर्सिग काउंसिल (आईएनसी) ने 'घटिया, अपमानजनक सामग्री' के लिए पाठ्यपुस्तक की भी आलोचना की, जो देश के प्रचलित कानूनों के खिलाफ भी है। यह किताब स्पष्ट रूप से केवल नर्सिग पाठ्यक्रम के लिए निर्धारित किया गया है, लेकिन किसी लेखक या प्रकाशन का समर्थन नहीं किया गया है, और न ही किसी ने अपने प्रकाशनों के लिए इसके नाम का उपयोग करने की अनुमति दी है। मुंबई में रहने वाले सेवानिवृत्त प्रोफेसर मंगल गोगटे और पूर्व व्याख्याता आर.एन. देसाई जैसे प्रतिष्ठित शिक्षाविदों ने 'जहरीले विचारों वाली' इस पाठ्यपुस्तक की कड़ी निंदा की है और सामग्री की गुणवत्ता की जांच कराने और भारतीय बाजार से इसकी सभी प्रतियां तुरंत वापस लेने की मांग की।

पाठ्यपुस्तक में यह भी बताया गया है कि कैसे उच्च वेतन पाने वाले या होनहार पेशेवर करियर वाले युवा लड़के 'दुर्लभ वस्तुएं' बन जाते हैं और इसलिए उनके माता-पिता लड़की के माता-पिता से उसे अपनी बहू के रूप में स्वीकार करने के लिए भारी मात्रा में धन की मांग करते हैं। लेखक ने दहेज प्रथा के कई 'गुणों और लाभों' को सूचीबद्ध किया है, जो न केवल भारतीय कानूनों के तहत प्रतिबंधित हैं, बल्कि इसमें सुझाया गया है कि 'बदसूरत दिखने वाली लड़कियों की शादी भी आकर्षक दहेज देकर अच्छे दिखने वाले लड़कों के साथ की जा सकती है'।

किताब में कहा गया है कि दहेज भारत के कई हिस्सों में अपने पति को खाट, गद्दे, टेलीविजन, पंखा, रेफ्रिजरेटर, बर्तन, कपड़े और यहां तक कि वाहन जैसी चीजें देने के रिवाज के रूप में अपने नए घर को स्थापित करने में मदद करता है। दहेज के रूप में लड़की को उसकी शादी के समय पैतृक संपत्ति में उसका हिस्सा स्वत: मिल जाता है, जो एक और विवाद है। दहेज प्रथा लड़कियों के बीच शिक्षा के प्रसार में मदद करती है, क्योंकि दहेज के बोझ के कारण कई लोगों ने अपनी लड़कियों को शिक्षित करना शुरू कर दिया है। पाठ्यपुस्तक में कहा गया है, "जब लड़कियां शिक्षित होंगी या नौकरी पर भी होंगी, तो पैसे की मांग कम होगी। इस प्रकार, यह एक अप्रत्यक्ष लाभ है।"

संयोग से, लगभग 6 साल पहले महाराष्ट्र की एचएससी पाठ्यपुस्तकों में कथित 'दहेज की अच्छाई' पर इसी तरह के दावों ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था।

(इनपुट- IANS)

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