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Coffee Par Kurukshetra: टीएमसी में टूट के बाद अब महाराष्ट्र की बारी? देखें पूरी चर्चा

 Reported By: Saurav Sharma @journosaurav
 Published : Jun 15, 2026 08:44 pm IST,  Updated : Jun 15, 2026 08:44 pm IST

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी पूरी तरह से बिखर गई है। यहां विधायकों से लेकर सांसदों तक ने टीएमसी से बगावत कर दी है। ऐसे में कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में अगले राज्य महाराष्ट्र को लेकर चर्चा की गई।

नई दिल्ली: देश की राजनीति में इन दिनों एक नया घटनाक्रम चर्चा का विषय बना हुआ है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 सांसदों के एक साथ अलग होकर नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय करने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस पार्टी का चुनावी आधार बेहद सीमित रहा और जिसने अपने शुरुआती चुनाव में महज कुछ सौ वोट हासिल किए थे, उसी पार्टी में अचानक 20 सांसदों का शामिल होना कई सवाल खड़े कर रहा है। इंडिया टीवी के लोकप्रिय शो 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में शो के एंकर और गेस्ट ने टीएमसी में टूट पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा, पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर के साथ-साथ गेस्ट के रूप में प्रदीप सिंह और अनंत विजय मौजूद रहे।

पहले से चल रही थी तैयारी

चर्चा के दौरान यह दावा किया गया कि यह पूरा घटनाक्रम अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसकी तैयारी काफी पहले से चल रही थी। कई टीएमसी सांसद लंबे समय से असंतोष की स्थिति में थे और भाजपा के नेताओं के संपर्क में बताए जा रहे थे। इस प्रक्रिया में भाजपा के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र यादव की भूमिका विशेष रूप से चर्चा में रही। बताया गया कि दिल्ली में कई महत्वपूर्ण बैठकें उनके आवास पर हुईं, जिनमें टीएमसी के असंतुष्ट सांसदों के अलावा पश्चिम बंगाल के नेता शुभेंदु अधिकारी भी शामिल रहे।

क्यों भाजपा के बजाय दूसरी पार्टी में शामिल हुए नेता?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा का प्राथमिक उद्देश्य इन सांसदों को सीधे पार्टी में शामिल कराना नहीं था, बल्कि संसद में अपनी संख्या बढ़ाना था। महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाने की रणनीति के रूप में इस कदम को देखा जा रहा है। इसी कारण सांसदों को भाजपा में शामिल कराने के बजाय एक अलग पार्टी में विलय का रास्ता चुना गया।

कानूनी बहस हुई तेज

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम पर कानूनी बहस भी तेज हो गई है। दल-बदल कानून और संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत इस कदम की वैधता को लेकर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। एक पक्ष का कहना है कि संसदीय दल के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय कर सकते हैं, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि यह मामला अदालतों तक जाएगा और लंबी कानूनी लड़ाई का कारण बन सकता है। चर्चा में अरुणाचल प्रदेश और गोवा के पुराने राजनीतिक उदाहरणों का भी उल्लेख किया गया, जहां बड़े पैमाने पर विधायकों के दल बदलने या विलय की घटनाएं हुई थीं। इन्हीं उदाहरणों के आधार पर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान घटनाक्रम भी संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में रह सकता है।

शुभेंदु और निशिकांत की रही अहम भूमिका

इस पूरे मामले में शुभेंदु अधिकारी, निशिकांत दुबे और अन्य नेताओं की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया। कहा गया कि टीएमसी के भीतर लंबे समय से मौजूद असंतोष को समझने और उसे राजनीतिक दिशा देने में इन नेताओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। फिलहाल यह स्पष्ट है कि मामला केवल सांसदों के दल बदलने तक सीमित नहीं है। इसके राजनीतिक, कानूनी और संसदीय प्रभाव आने वाले समय में और स्पष्ट होंगे। यही कारण है कि इसे केवल एक राजनीतिक ऑपरेशन नहीं, बल्कि “प्रोजेक्ट लोटस” के रूप में देखा जा रहा है, जिसकी अगली कड़ियों पर पूरे देश की नजर बनी हुई है।

डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिये गये वीडियो पर क्लिक करें।

(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)

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