दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के दौरान एक दलित परिवार के साथ हुई मारपीट के मामले ने बड़ा राजनीतिक रूप अख्तियार कर लिया है। विपक्षी दलों के भारी दबाव के बाद दिल्ली पुलिस ने आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज को हिरासत में ले लिया है। आरोपी को भाजपा समर्थक माना जा रहा है, क्योंकि उसकी तस्वीरें कई भाजपा नेताओं के साथ सार्वजनिक हुई हैं। यह घटनाक्रम उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी चुनावों से पहले दलित और ओबीसी राजनीति के एक नए ध्रुवीकरण की ओर इशारा कर रहा है। इंडिया टीवी के कार्यक्रम 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में इस मामले पर विस्तार से चर्चा की गई। इस शो में एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह, प्रोफेसर चंद्रचूर्ण सिंह और राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी मौजूद रहे।
सोशल मीडिया पर चर्चित दलित युवती निशु आजाद ने अपने पिता के साथ हुई मारपीट का मुद्दा उठाया था, जिसके बाद आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद ने दिल्ली पुलिस पर दबाव बनाया।
लड़ाई में कांग्रेस भी खुलकर उतरी
शो में शामिल मेहमानों ने कहा कि इस लड़ाई में कांग्रेस भी खुलकर कूद पड़ी है। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी के अनुसार, राहुल गांधी के समर्थन पर AICC के कानूनी विभाग ने ऋषभ रंजन के नेतृत्व में छह वकीलों की टीम थाने भेजी। इस टीम ने पुलिस से स्वतंत्र भारद्वाज पर एससी-एसटी एक्ट लगाने, 72 घंटे में गिरफ्तारी का आश्वासन लेने के साथ ही ऑनलाइन मिल रही धमकियों के खिलाफ अलग एफआईआर दर्ज कराई। थाने के भीतर कांग्रेस नेताओं, छह वकीलों, चंद्रशेखर आजाद और सीजेपी नेताओं की एक साथ मौजूदगी को विश्लेषक एक नए अनौपचारिक गठबंधन के रूप में देख रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में 'सीजेपी' फैक्टर
यह घटनाक्रम केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। सीजेपी के आशुतोष रांका की सपा प्रमुख अखिलेश यादव से हुई मुलाकात को विश्लेषक अत्यंत गंभीर मान रहे हैं। आम आदमी पार्टी से जुड़े सीजेपी जैसे संगठन अब भाजपा शासित राज्यों (राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश) में सक्रिय होकर विभिन्न मुद्दों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष (विशेषकर राहुल गांधी और अखिलेश यादव) युवाओं, जेनजी, अल्पसंख्यकों, दलितों और ओबीसी का एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं ।
दलित वोट बैंक का बदलता गणित
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता हमेशा से निर्णायक रहे हैं। विश्लेषक अमिताभ तिवारी के आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2022 तक यूपी का गैर-जाटव दलित वोटर बड़ी संख्या में भाजपा के साथ था (2022 में लगभग 45% गैर-जाटव दलितों ने भाजपा को वोट दिया था)। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में यह समीकरण पूरी तरह बदल गया, जहां 54% गैर-जाटव दलित मतदाताओं ने 'इंडिया' गठबंधन को वोट दिया और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) तीसरे स्थान पर खिसक गई। हालांकि, सीटों के नुकसान के बावजूद भाजपा का कुल वोट शेयर उत्तर प्रदेश में लगभग 0.38% बढ़ा है, जो अन्य वर्गों के एकीकरण को दर्शाता है।
नैरेटिव की जंग और योगी सरकार की रणनीति
2024 के चुनावों में विपक्ष का 'संविधान खतरे में है' का नैरेटिव बेहद सफल रहा था, लेकिन अब वह धीमा पड़ चुका है। ऐसे में राहुल गांधी दलितों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए 'मनुस्मृति' जैसे नए मुद्दों को हवा दे रहे हैं। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी मजबूत कानून-व्यवस्था, हिंदुत्व, विकासवाद और राष्ट्रवाद की पिच पर डटे हुए हैं। योगी सरकार ने रोजगार के मोर्चे पर विपक्ष के हमलों को कुंद करने के लिए 1 लाख नई नौकरियों की घोषणा की है, जबकि उनके कार्यकाल में 9 लाख नौकरियां पहले ही दी जा चुकी हैं।
नए समीकरणों पर काम कर रहा विपक्ष
यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि विपक्ष जहां नए सामाजिक समीकरणों के सहारे भाजपा को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है, वहीं भाजपा अपने मजबूत प्रशासनिक और वैचारिक क्रेडेंशियल्स के सहारे इस चक्रव्यूह को तोड़ने की तैयारी में है।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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