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मंगल प्रदोष व्रत: खुशहाली और कर्ज मुक्ति के लिए इस विधि से करें भगवान शिव की पूजा, जानें व्रत कथा

 Written By: India TV Lifestyle Desk
 Published : May 04, 2020 01:52 pm IST,  Updated : May 05, 2020 06:20 am IST

मंगलवार को भगवान शंकर को समर्पित प्रदोष व्रत किया जायेगा | मंगलवार को पड़ने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष के नाम से जाना जाता है। ग्रन्थों में इस दिन को कर्ज उतारने के लिए बड़ा ही श्रेष्ठ माना जाता है।

प्रदोष व्रत- India TV Hindi
प्रदोष व्रत Image Source : INST/JAI_SHREE_MAHAKAL_UJ

वैशाख शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि और मंगलवार का दिन है। त्रयोदशी तिथि मंगलवार को  रात 11 बजकर 22 मिनट तक रहेगी | इसके साथ ही मंगलवार को भगवान शंकर को समर्पित प्रदोष व्रत किया जायेगा | मंगलवार को पड़ने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष के नाम से जाना जाता है। ग्रन्थों में इस दिन को कर्ज उतारने के लिए बड़ा ही श्रेष्ठ माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत 5 मई, मंगलवार को पड़ रहा है।  जानिए इसकी पूजा विधि और कथा बारे में।

भौम प्रदोष व्रत की पूजा विधि

इस दिन व्रती को सुबह उठकर नित्यकर्मों से निवृत होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और पूरे दिन उपवास करना चाहिए।  पूरे दिन उपवास के बाद शाम के प्रथम प्रहर में फिर से स्नान करके सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए और उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके शिव जी की पूजा करनी चाहिए । क्योंकि यह भौम प्रदोष व्रत है और भौम प्रदोष में हनुमान जी की भी पूजा भी जरूर करनी चाहिए ।

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पूजा के लिए सबसे पहले गंगाजल से उस जगह को शुद्ध करें फिर इसे गाय के गोबर से लिपाई करें। इसके बाद पद्म पुष्प की आकृति को पांच रंगों से मिलाकर चौक को तैयार करें। इसके बाद आप कुश के आसन में उत्तर-पूर्व की दिशा में बैठकर भगवान शिव की पूजा करें। भगवान शिव का जलाभिषेक करें साथ में ऊं नम: शिवाय: का जाप भी करते रहें। इसके बाद विधि-विधान के साथ शिव की पूजा करें फिर इस कथा को सुन कर आरती करें और प्रसाद सभी को बाटें।

भौम प्रदोष व्रत कथा

स्कंद पुराण के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया।

कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त "अंशुमती" नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह करने के लिए राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह दुबारा गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।

इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।

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