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भारतीय चाय निर्यात में आई सुस्‍ती, माल में विविधता का अभाव व भौगोलिक पहचान का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं उत्‍पादक

क वर्ष में 85 लाख किलोग्राम दार्जिलिंग चाय का उत्पादन होता है जिसे 'चायों की शैंपेन' कहा जाता है लेकिन वैश्विक स्तर पर दार्जिलिंग चाय के नाम से पांच करोड़ किलोग्राम चाय की बिक्री होती है।

India TV Paisa Desk India TV Paisa Desk
Updated on: June 14, 2021 10:25 IST
Tea exporters fear dip in export volume in current year- India TV Paisa
Photo:FILE PHOTO

Tea exporters fear dip in export volume in current year

कोलकाता। चाय व्यापारियों और बागान मालिकों का मानना है कि उत्पाद में विविधता की कमी और विशिष्ट भौगोलिक पहचान (जीआई टैग) का फायदा न उठा पाने की नाकामी जैसे कारणों से भारतीय चाय निर्यात में सुस्ती आई है। उनका कहना है कि श्रीलंका विपणन का ठोस प्रयास कर भारत से आगे निकल रहा है।

भारतीय चाय निर्यातक संघ के अध्यक्ष अंशुमान कनोरिया ने कहा कि हमने दार्जिलिंग चाय की विशिष्ट भौगोलिक पहचान का इस्तेमाल कानूनी लड़ाई और खरीदारों को धमकाने में किया है, जबकि समय की मांग यह है कि कोलम्बियाई कॉफी की तर्ज पर अच्छा-खासा वित्तपोषण कर भारतीय चाय को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय सीटीसी चाय अफ़्रीकी चाय के मुकाबले महंगी है और इस वजह से निर्यात बाजार में भारत को छह करोड़ किलो का नुकसान हो सकता है।

भारतीय चाय संघ (आईटीए) के सचिव सुजीत पात्रा ने कहा कि निर्यात बाजार में भौगोलिक पहचान के नियम लागू कराना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी उन बाजारों में भारतीय चाय के लोगो का पंजीकरण कराया जाना और उसका प्रचार करना भी है। उन्होंने कहा कि उदाहरण के तौर पर एक वर्ष में 85 लाख किलोग्राम दार्जिलिंग चाय का उत्पादन होता है जिसे 'चायों की शैंपेन' कहा जाता है लेकिन वैश्विक स्तर पर दार्जिलिंग चाय के नाम से पांच करोड़ किलोग्राम चाय की बिक्री होती है।

यह विशिष्ट भौगोलिक पहचान के नियम का उल्लंघन है। नियमों को सही तरह से लागू किया जाना चाहिए और विदेशों में प्रामाणिक दार्जिलिंग चाय की जांच के लिए एक तंत्र की जरूरत है। दार्जिलिंग टी एसोसिएशन के प्रमुख सलाहकार संदीप मुखर्जी ने कहा कि नेपाल की चाय भी घरेलू और अंतराष्ट्रीय बाजारों में दार्जिलिंग चाय के नाम से बेची जा रही है।

 

 
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