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हर साल बढ़ेगा बिजली का बिल? सरकार की नई पॉलिसी से उपभोक्ताओं को लग सकता है झटका

 Edited By: Shivendra Singh
 Published : Jan 23, 2026 07:43 am IST,  Updated : Jan 23, 2026 07:43 am IST

अगर आप हर महीने बिजली के बिल से पहले ही परेशान रहते हैं, तो आने वाले सालों में यह चिंता और बढ़ सकती है। केंद्र सरकार की नई राष्ट्रीय विद्युत नीति (NEP) के मसौदे ने बिजली उपभोक्ताओं के बीच नई बहस छेड़ दी है। इस ड्राफ्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 से बिजली का बिल हर साल अपने आप बढ़ सकता है।

बिजली उपभोक्ताओं को...- India TV Hindi
बिजली उपभोक्ताओं को लग सकता है बड़ा झटका Image Source : CANVA

देश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाला समय महंगा साबित हो सकता है। केंद्र सरकार की नई राष्ट्रीय विद्युत नीति (NEP) के मसौदे ने बिजली दरों को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो साल 2026-27 से बिजली का बिल हर साल अपने आप बढ़ सकता है। अब तक राजनीतिक कारणों से कई राज्यों में बिजली की दरें लंबे समय तक नहीं बढ़ाई जाती थीं, लेकिन नई नीति इस व्यवस्था को बदलने की तैयारी में है।

सरकार द्वारा जारी मसौदे में इंडेक्स-लिंक्ड टैरिफ व्यवस्था का सुझाव दिया गया है। इसके तहत अगर राज्य नियामक आयोग समय पर बिजली की दरें तय नहीं करते हैं, तो एक तय फॉर्मूले के आधार पर बिजली के रेट अपने आप बढ़ जाएंगे। यानी अब टैरिफ बढ़ाने या न बढ़ाने का फैसला पूरी तरह राजनीतिक नहीं रहेगा।

बढ़ते घाटे से सरकार चिंतित

बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की आर्थिक हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। देशभर में इन कंपनियों पर करीब 3 लाख करोड़ रुपये का बकाया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2023 में बिजली कंपनियों को हर यूनिट पर औसतन 50 पैसे का नुकसान हुआ। लागत के मुकाबले कम वसूली इस संकट की बड़ी वजह है।

संसद में आ सकता है विधेयक

गौरतलब है कि बिजली (संशोधन) विधेयक का मसौदा संसद के आगामी बजट सत्र में पेश किया जा सकता है। मसौदे में यह भी प्रस्ताव है कि बिजली वितरण कंपनियों द्वारा बिजली खरीदने की लागत में होने वाले बदलाव की जानकारी हर महीने उपभोक्ताओं को दी जाए। सरकार ने इस ड्राफ्ट पॉलिसी पर सभी हितधारकों से 30 दिनों के भीतर सुझाव मांगे हैं।

2026-27 से बदलेगा सिस्टम

मसौदा नीति के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 से नियामक आयोगों को ऐसी दरें तय करनी होंगी, जिनसे बिजली बनाने और उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की पूरी लागत उसी समय वसूल की जा सके। बाद में शुल्क बढ़ाने या घाटा जोड़ने की व्यवस्था को खत्म करने की बात कही गई है। साथ ही बिजली की कीमतों को महंगाई जैसे किसी सूचकांक से जोड़ने का भी प्रस्ताव है।

उद्योग क्यों देते हैं महंगी बिजली

भारत में उद्योगों को दुनिया की सबसे महंगी बिजली में से एक खरीदनी पड़ती है। इसकी वजह यह है कि किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं को सस्ती या सब्सिडी वाली बिजली देने का बोझ उद्योगों पर डाला जाता है। देश की करीब 45 फीसदी बिजली इन्हीं दो वर्गों में खपत होती है।

आम उपभोक्ता पर क्या होगा असर

नई व्यवस्था लागू होने पर घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं पर सीधा असर पड़ सकता है। सब्सिडी और वास्तविक लागत के बीच का अंतर धीरे-धीरे कम किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में बिजली का बिल हर महीने थोड़ा-थोड़ा बढ़ सकता है।

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