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SBI ने EMI बाउंस पर वसूले 4400 रुपये, लेकिन अब देने पड़ेंगे 1.7 लाख रुपये; ग्राहक की जिद के आगे हारा बैंक!

दिल्ली की एक महिला ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के खिलाफ 15 साल तक लड़ाई लड़ी और आखिरकार जीत गई। मामला 4400 रुपये की गलत पेनल्टी से शुरू हुआ था, लेकिन अब बैंक को ग्राहक को 1.7 लाख रुपये चुकाने का आदेश मिला है।

Edited By: Shivendra Singh
Published : Nov 13, 2025 01:57 pm IST, Updated : Nov 13, 2025 02:02 pm IST
SBI की गलती पर ग्राहक ने...- India TV Paisa
Photo:ANI SBI की गलती पर ग्राहक ने जीता 1.7 लाख रुपये का मुआवजा

अगर आपको कभी बैंक ने गलत चार्ज लगाकर परेशान किया है, तो दिल्ली की एक महिला ग्राहक की यह कहानी आपको हिम्मत देगी। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने महज 4400 रुपये के गलत ECS बाउंस चार्ज वसूल किए थे, लेकिन 15 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद वही बैंक अब उसे 1.7 लाख रुपये का मुआवजा देने के लिए मजबूर हो गया है। आइए पूरा मामला विस्तार से जानते हैं।

दराअसल, दिल्ली की एक महिला ने साल 2008 में HDFC बैंक से 2.6 लाख रुपये का कार लोन लिया था। उन्होंने EMI भुगतान के लिए SBI के करवाल नगर ब्रांच में अपने सेविंग अकाउंट से ECS के जरिए ऑटो-डिडक्शन की सुविधा एक्टिव की थी। EMI हर महीने 7054 रुपये की थी, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि 11 बार EMI बाउंस दिखी और SBI ने हर बार 400 रुपये के हिसाब से कुल 4400 रुपये वसूल लिए।

महिला के मुताबिक, उनके खाते में हमेशा पर्याप्त बैलेंस था, फिर भी बैंक ने ECS भुगतान अस्वीकृत दिखाया। उन्होंने तुरंत बैंक अधिकारियों से शिकायत की और बैंक स्टेटमेंट लेकर साबित किया कि बैलेंस कभी कम नहीं था। लेकिन SBI ने उनकी बात को अनसुना कर दिया।

15 साल लंबी कानूनी जंग

इसके बाद महिला ने 2010 में जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दायर की, लेकिन वहां उनका दावा खारिज कर दिया गया। हार नहीं मानते हुए उन्होंने मामला राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) में उठाया, जिसने इसे दोबारा सुनवाई के लिए दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग को भेजा। आखिरकार, 9 अक्टूबर 2025 को दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया।

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SBI का तर्क और आयोग की प्रतिक्रिया

SBI ने अपनी सफाई में कहा कि EMI न कटने की वजह ECS मैंडेट (यानी ऑटो पेमेंट फॉर्म) में गलती थी। लेकिन उपभोक्ता आयोग ने बैंक की यह बात मानने से इनकार कर दिया। आयोग ने कहा कि अगर फॉर्म में गलती थी, तो फिर उसी फॉर्म से बाकी महीनों की EMI कैसे कट गई? यह बात तर्कसंगत नहीं है। इसके अलावा, SBI कोई ऐसा सबूत भी नहीं दिखा पाया जिससे साबित हो सके कि किसी महीने ग्राहक के खाते में पैसे कम थे। वहीं, महिला ने अपने बैंक स्टेटमेंट दिखाकर साबित कर दिया कि हर महीने उसके खाते में EMI भरने के लिए पर्याप्त पैसा मौजूद था।

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आयोग का आदेश

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने SBI को सेवा में कमी का दोषी ठहराया। इसके साथ, आयोग ने बैंक को महिला को 1,50,000 रुपये मानसिक उत्पीड़न और तनाव के लिए मुआवजा देने का भी आदेश दिया। इसके अलावा, बैंक को 20,000 रुपये मुकदमेबाजी की लागत के रूप में देने होंगे। बैंक को यह राशि 3 महीने के भीतर चुकानी होगी, अन्यथा उस पर 7% वार्षिक ब्याज लागू होगा। आयोग ने अपने आदेश में कहा शिकायतकर्ता 2008 से इस मुकदमे की पीड़ा झेल रही हैं। SBI की गलती ने न केवल उन्हें आर्थिक नुकसान पहुंचाया बल्कि मानसिक रूप से भी परेशान किया।

ग्राहक की जीत ने दी मिसाल

यह फैसला उन लाखों ग्राहकों के लिए एक सबब बन सकता है जिन्हें बैंक या वित्तीय संस्थाएं बिना उचित कारण के चार्ज लगाकर परेशान करती हैं। इस केस में महिला की जिद और 15 साल की कानूनी लड़ाई ने साबित कर दिया कि अगर आपके पास सबूत और सच्चाई है, तो बड़ा से बड़ा बैंक भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है।

इन बातों का ख्याल रखें ग्राहक

अगर आपके खाते से कोई गलत चार्ज काटा जाता है तो तुरंत लिखित शिकायत दर्ज करें, बैंक स्टेटमेंट सुरक्षित रखें, और जरूरत पड़ने पर उपभोक्ता आयोग में शिकायत करें।

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