अमेरिकी कंपनियों ने पिछले महीने अप्रत्याशित रूप से 92,000 नौकरियों में कटौती की है, जो इस बात का संकेत है कि अमेरिका का श्रम बाजार अभी भी दबाव में है। इसके साथ ही, दुनिया के सबसे ताकतवर देश में बेरोजगारी दर मामूली रूप से बढ़कर 4.4 प्रतिशत हो गई है। श्रम विभाग द्वारा शुक्रवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी में नियुक्तियों की स्थिति जनवरी के मुकाबले खराब रही। जनवरी में कंपनियों, गैर-लाभकारी संस्थाओं और सरकारी एजेंसियों ने 1,26,000 नौकरियां जोड़ी थीं। अर्थशास्त्रियों ने फरवरी में 60,000 नई नौकरियों की उम्मीद जताई थी।
ईरान के साथ युद्ध के कारण पैदा हुई आर्थिक अनिश्चितता
संशोधित आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर और जनवरी के पेरोल से भी 69,000 नौकरियां कम कर दी गई हैं। फरवरी में रोजगार की ये कमजोर स्थिति ईरान के साथ युद्ध के कारण पैदा हुई आर्थिक अनिश्चितता को दर्शाती है। इस युद्ध की वजह से तेल की कीमतों में उछाल आया है और व्यवसायों एवं उपभोक्ताओं पर अप्रत्याशित लागत का बोझ बढ़ा है। नेवी फेडरल क्रेडिट यूनियन की मुख्य अर्थशास्त्री हेदर लॉन्ग ने कहा, ''नौकरी का बाजार कई विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहा है। कंपनियां इस वसंत में तब तक भर्ती करने में हिचकिचाएंगी जब तक कि युद्ध समाप्त नहीं हो जाता। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए यह चुनौतीपूर्ण समय है।''
2025 में डोनाल्ड ट्रंप की शुल्क नीतियों की वजह से प्रभावित रहा था रोजगार बाजार
साल 2025 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की शुल्क नीतियों और उच्च ब्याज दरों के कारण रोजगार बाजार सुस्त रहा था। जनवरी की बेहतर नियुक्तियों के बाद 2026 में सुधार की उम्मीद जगी थी, लेकिन ताजा रिपोर्ट ने उन उम्मीदों को झटका दिया है। फिच रेटिंग्स में अमेरिकी अर्थशास्त्र के प्रमुख ओलू सोनोला के अनुसार, ''जब ऐसा लग रहा था कि श्रम बाजार स्थिर हो रहा है, तभी इस रिपोर्ट ने उस धारणा को धराशायी कर दिया है। ये हर लिहाज से बुरी खबर है।''
मौद्रिक नीति के लिए सबसे खराब परिदृश्य
ईरान के साथ युद्ध के कारण रोजगार बाजार और पूरी अर्थव्यवस्था का परिदृश्य अनिश्चितता के बादलों से घिरा हुआ है। रेमंड जेम्स के मुख्य अर्थशास्त्री यूजीनियो अलेमान ने कहा, ''मौद्रिक नीति के लिए ये संभवतः सबसे खराब परिदृश्य है।'' उनके अनुसार, कम नियुक्तियों और मुद्रास्फीति (महंगाई) के बढ़ते दबाव ने फेडरल रिजर्व के सामने एक अत्यंत कठिन स्थिति पैदा कर दी है, जहां उसे यह तय करना होगा कि रोजगार बाजार को सहारा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती की जाए या कीमतों पर लगाम लगाने के लिए उन्हें मौजूदा स्तर पर ही रखा जाए।



































