पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं फिर से तेज होने लगी हैं। बीते कुछ दिनों से राज्य के विभिन्न जिलों से पराली जलाने के काफी मामले सामने आए हैं। आपको बता दें कि पराली जलाने के कारण वायु प्रदूषण की समस्या में वृद्धि होती है। 5 नवंबर को पंजाब में पराली जलाने के 440 नये मामले दर्ज किए गए हैं। इसी के साथ ही, 15 सितंबर से शुरू हुए मौजूदा धान कटाई सीजन में राज्य के भीतर खेतों में आग लगाने की कुल घटनाओं का आंकड़ा बढ़कर 2787 पर पहुंच गया है।
ये जिले बने हॉटस्पॉट
सामने आई जानकारी के अनुसार, पंजाब के तीन प्रमुख जिले- तरनतारन (586मामले), फिरोजपुर ( 361मामले) और अमृतसर (221मामले) - इस सीजन में प्रदूषण के सबसे बड़े हॉटस्पॉट बने हुए हैं, जो कुल मामलों का आधे से अधिक हिस्सा हैं। पराली जलाने की इन घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन द्वारा अब तक नियमों का उल्लंघन करने वाले किसानों पर करीब ₹4610000 लाख का पर्यावरण मुआवजा लगाया जा चुका है, जिसमें से ₹2485000 लाख की वसूली भी की गई है। इसके अतिरिक्त, सख्त कानूनी कार्रवाई के तहत उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता के तहत 710 FIR दर्ज की गई हैं और कृषि भूमि के सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में 'रेड एंट्री' 829 की जा चुकी हैं। बता दें कि इससे पहले 4 नवंबर को पंजाब में पराली जलाने के 151 नए मामले दर्ज किए गए थे।
क्यों जलाई जाती है पराली?
आपको बता दें कि धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच किसानों को महज 10 से 25 दिन का समय मिलता है। ऐसे में खेतों को जल्दी साफ करने के लिए पराली जलाना सबसे सस्ता और आसान तरीका माना जाता है। मल्चिंग या पराली की गांठें बनाने वाली मशीनें उपलब्ध नहीं होने या महंगी होने के कारण भी किसान पराली जलाने का विकल्प चुनते हैं। मशीनों से कटाई के बाद खेतों में काफी मात्रा में भूसा और फसल अवशेष बच जाते हैं, जिन्हें हाथ से हटाना मुश्किल होता है। इसके अलावा गेहूं की बुवाई में देरी होने से अगली फसल की पैदावार प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर सरकार की ओर से भी लगातार ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जिससे किसानों को पराली न जलानी पड़े और उन्हें आर्थिक फायदा भी मिले।
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