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आशा दशमी क्यों मनाई जाती है? जानें इसकी तारीख, पूजा विधि और व्रत रखने के नियम

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : Jul 02, 2026 11:13 pm IST,  Updated : Jul 02, 2026 11:13 pm IST

आशा दशमी व्रत 24 जुलाई को रखा जाएगा। इस दिन व्रत रखकर सुहागन स्त्रियां सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। शास्त्रों में इस व्रत की विधि और महत्व को बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है। जानिए क्यों रखा जाता है यह व्रत, कैसे होती है पूजा और क्या हैं नियम।

Asha Dashami Vrat- India TV Hindi
आशा दशमी व्रत तिथि और पूजा विधि Image Source : PINTEREST

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को आशा दशमी मनाई जाती है। इस दिन सुखी वैवाहिक जीवन की कामना और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए उपवास रखते हैं। मान्यता है कि इस दिन दस दिशाओं की देवी 'आशा देवियों' की आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। चलिए जानते हैं कि आशा दशमी क्यों मनाई जाती है। साथ ही जानेंगे इस व्रत की पूजा विधि और नियम क्या हैं। 

कब है आशा दशमी व्रत?

पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि की शुरुआत 23 जुलाई को सुबह 7 बजकर 03 मिनट पर होगी। यह तिथि 24 जुलाई 2026 को सुबह 9 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर आशा दशमी का व्रत 24 जुलाई, शुक्रवार को रखा जाएगा।

क्यों किया जाता है आशा दशमी व्रत 

आशा दशमी व्रत का संबंध इच्छाओं की पूर्ति से माना जाता है। सुहागिन महिलाएं मां पार्वती की पूजा कर सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं। मान्यता है कि इस दिन देवी पार्वती के साथ-साथ दस दिशाओं की देवियों की पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। यह भी मान्यता है कि जिन महिलाओं के पति दूर हों, उनके पुनर्मिलन और वैवाहिक सुख की संभावना इस व्रत के प्रभाव से बढ़ती है।

कैसे करें आशा दशमी का पूजा?

  • व्रती को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए।
  • इसके बाद शुद्ध शरीर और पवित्र मन से व्रत का संकल्प लेना चाहिए। 
  • पूजा स्थान को साफ कर लाल कपड़ा बिछाकर मां पार्वती की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। 
  • इसके बाद रोली, चंदन, फूल, धूप, दीप और खीर का भोग लगाकर आशा देवियों की पूजा की जाती है। 
  • पूजा के दौरान व्रत कथा सुनना या पढ़ना जरूरी माना गया है।
  • आशा देवियों का ध्यान करते हुए मंगल की कामना की जाती है।
  • पूजा के बाद क्षमता के अनुसार दान करना चाहिए।
  • पूजा संपन्न होने के बाद सात्विक आहार ग्रहण किया जाता है।  

व्रत के नियम क्या हैं?

आशा दशमी व्रत को कम से कम छह महीने या फिर एक से दो वर्ष तक करने की विधान है। इसे आषाढ़ शुक्ल पक्ष से शुरू करना श्रेष्ठ माना जाता है, लेकिन किसी भी शुक्ल पक्ष से शुरुआत की जा सकती है। व्रत के समापन पर उद्यापन करें। इस दिन सुहागिन स्त्रियों के साथ मिलकर रात्रि जागरण करना चाहिए। ब्राह्मणों और जरूरतमंद और गरीबों को दान देने का विधान है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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