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  4. 5 या 6 सिंतबर कब है दही हांडी उत्सव, जब ढोल-ताशों और 'गोविंदा आला रे' के शोर से गूंजेगी सड़कें, जानें इसका महत्व

5 या 6 सिंतबर कब है दही हांडी उत्सव, जब ढोल-ताशों और 'गोविंदा आला रे' के शोर से गूंजेगी सड़कें, जानें इसका महत्व

 Written By: Arti Azad
 Published : Sep 04, 2026 12:46 pm IST,  Updated : Sep 04, 2026 12:46 pm IST

दही हांडी भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा पर्व है। ढोल-ताशों की गूंज, 'गोविंदा आला रे' के जयकारे और ऊंचाई पर टंगी मटकी तक पहुंचती मानव पिरामिड इसकी पहचान हैं। आइए जानते हैं इस साल दही हांडी उत्सव कब है, इससे परंपरा और जुड़ी मान्यताएं।

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दही हांडी 2026 कब है? Image Source : PINTEREST

जन्माष्टमी की रात कान्हा के जन्मोत्सव के बाद अगले दिन गलियां एक बार फिर कृष्ण की बाल लीलाओं के रंग में रंग जाती हैं। सड़कों पर ढोल-ताशों की थाप सुनाई देती है और ‘गोविंदा आला रे’ के जयकारे गूंजते हैं। ऊंचाई पर टंगी मटकी और उसे फोड़ने के लिए बनता मानव पिरामिड इस उत्सव की सबसे बड़ी खासियत होता है। लेकिन एक सवाल लोगों के बीच बना हुआ है कि आखिर दही हांडी का उत्सव किस दिन मनाया जाएगा, 5 सितंबर या 6 सितंबर? तो चलिए जानते हैं दही हांडी उत्सव की सही तारीख, इस पर्व से जुड़ी परंपरा।

दही हांडी उत्सव 2026 (Dahi Handi Utsav 2026)

आज 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जा रही है। इसके अगले दिन यानी 5 सितंबर को दही हांडी उत्सव होगा। इस दिन पूरे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश समेत कुछ राज्यों में गोविंदा पथक मटकी फोड़ने के लिए मानव पिरामिड बनाएंगे। हालांकि, अलग-अलग आयोजनों का समय अलग हो सकता है, इसलिए कार्यक्रम में जाने से पहले स्थानीय आयोजन की जानकारी जरूर देख लें।

कान्हा की माखन चोरी और दही हांडी की परंपरा

दही हांडी की परंपरा को भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं से जोड़ा जाता है। बाल कृष्ण को दही और माखन बेहद प्रिय था। गोकुल में मैय्या यशोदा समेत सभी महिलाएं माखन-दही से भरी मटकियां ऊंचाई पर टांग देती थीं, ताकि कान्हा माखन न चुरा सकें। लेकिन कन्हैया को भला कौन रोक सकता है, वह अपने सखाओं के साथ मिलकर मानव पिरामिड बनाते और मटकी फोड़कर उसमें रखा माखन-दही खा लेते थे। दही हांडी में मटकी फोड़ने की परंपरा इसी लीला की याद में एक भव्य उत्सव के रूप में मनाई जाती है।

जन्माष्टमी के बाद क्यों?

जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है, जबकि अगले दिन उनकी बाल लीलाओं को याद करने की परंपरा है। कृष्ण की माखन चोरी वाली नटखट लीला दही हांडी से विशेष रूप से जुड़ी मानी जाती है। इसी कारण जन्माष्टमी के अगले दिन यह उत्सव मनाया जाता है।

महाराष्ट्र में भव्य आयोजन

महाराष्ट्र में दही हांडी ने बड़े सार्वजनिक उत्सव का रूप ले लिया है। मुंबई, ठाणे और पुणे समेत कई शहरों में गोविंदा मंडल और पथक इसकी तैयारियां पहले से शुरू कर देते हैं। कई स्तरों वाली मानव पिरामिड बनाकर मटकी तक पहुंचने की कोशिश की जाती है। ढोल-ताशों, संगीत और दर्शकों के जयकारों के बीच पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता है। कई आयोजनों में विजेता टीमों को पुरस्कार भी दिए जाते हैं।

एकता और टीमवर्क का संदेश

दही हांडी केवल मटकी फोड़ने का खेल नहीं, बल्कि एकता, साहस और सहयोग का प्रतीक भी है। मानव पिरामिड में सबसे ऊपर पहुंचने वाला गोविंदा तभी मटकी तक पहुंच पाता है, जब नीचे खड़ी पूरी टीम मजबूती से उसका साथ देती है। यही सामूहिक प्रयास इस पर्व को खास बनाता है। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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