सनातन धर्म में कई पर्व और व्रत ऐसे हैं जो सिर्फ किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ज्ञान और परंपरा के प्रति कृतज्ञता का भाव भी सिखाते हैं। ऋषि पंचमी ऐसा ही एक तिथि है, जो सप्तऋषियों के स्मरण और पूजन को समर्पित है। आइए जानते हैं ऋषि पंचमी 2026 कब है, पूजा का सही समय क्या रहेगा और सप्तऋषियों को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है।
ऋषि पंचमी 2026 कब है?
ऋषि पंचमी का व्रत 15 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा। पंचमी तिथि 15 सितंबर को सुबह 7 बजकर 44 मिनट से शुरू होगी और 16 सितंबर को सुबह 8 बजकर 59 मिनट तक रहेगी। इस पर्व में पूजा के लिए मध्याह्न (दोपहर) में पंचमी तिथि का होना महत्वपूर्ण है। 15 सितंबर को पंचमी तिथि दोपहर के समय भी मौजूद रहेगी, इसलिए इसी दिन ऋषि पंचमी का व्रत और पूजन किया जाएगा।
पूजा मुहूर्त
15 सितंबर को सुबह 11 बजकर 07 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 33 मिनट तक
सप्तऋषि कौन हैं?
सप्तऋषि वे सात मानस-पुत्र ऋषि माने जाते हैं, जिनके माध्यम से वेदों का ज्ञान प्राप्त और प्रसारित हुआ। सनातन परंपरा में इन्हें गोत्र व्यवस्था का प्रमुख आधार बताया है। इसका अर्थ है कि आज जीवित लगभग हर हिंदू परिवार अपनी वंश परंपरा को इनमें से किसी न किसी ऋषि के नाम से जोड़ता है। जब विवाह, श्राद्ध या किसी धार्मिक संकल्प के दौरान अपना गोत्र बताया जाता है, तो परंपरागत रूप से इसी ऋषि-कुल या वंश परंपरा की पहचान बताई जाती है।
अर्घ्य मंत्र
ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों का स्मरण करते हुए यह मंत्र पढ़ा जाता है:
कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः
दहन्तु पापं सर्व गृह्णन्त्वर्ध्यं नमो नमः॥
अर्थ: कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ- इन सातों को सप्तऋषि कहा जाता है। वे मेरे सभी पापों को जला दें या नष्ट कर दें और मेरे द्वारा अर्पित इस अर्घ्य को स्वीकार करें। उन्हें बार-बार प्रणाम है।
ऋषि पंचमी पर क्यों होती है पूजा?
इस दिन सप्तऋषियों का पूजन करके उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इस दिन दान और सात्विक भोजन करने की भी परंपरा है। हालांकि, ऋषि पंचमी को कुछ परंपराओं में महिलाओं और मासिक धर्म से जुड़ी प्राचीन शुद्धि-अशुद्धि की मान्यताओं से भी जोड़ा जाता है। लेकिन इसे केवल मासिक धर्म से जुड़े दोषों से मुक्ति का व्रत कहना पूरी परंपरा को सीमित कर देगा। इसका प्रमुख पहलू सप्तऋषियों की आराधना, उनके प्रति सम्मान और ऋषि परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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