श्राद्ध पक्ष में पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए तर्पण, पिंडदान और भोजन कराने जैसी परंपराएं निभाई जाती हैं। इन कर्मों को अक्सर पुत्र और पुरुष वंशजों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं में परिवार की बेटियों की भूमिका को भी खास माना गया है। गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यता में बेटी, नातिन, नाती और बहन को श्राद्ध कर्म में शामिल करने की बात कही गई है। यही वजह है कि कई परिवारों में श्राद्ध के दौरान इन रिश्तों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है।
पितरों के श्राद्ध में बेटी की अहम भूमिका
परंपरागत रूप से श्राद्ध कर्म का अधिकार पुत्र से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन पुत्र न होने की स्थिति में बेटी की भूमिका को भी महत्व दिया गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, बेटी अपने माता-पिता के लिए तर्पण और श्राद्ध से जुड़े कर्म कर सकती है। वहीं, पितरों का श्राद्ध तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब घर की बेटी, नातिन, नाती या बहन को न बुलाया जाए।
नाती को क्यों माना योग्य
बेटी के बेटे यानी नाती का रिश्ता भी परिवार की पिछली पीढ़ी से जुड़ा होता है। इसी आधार पर पुत्र के अभाव में नाती द्वारा नाना-नानी के लिए श्राद्ध और तर्पण करने की मान्यता बताई गई है। यानी पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने में इस रिश्ते को भी स्थान दिया गया है।
बेटी-बहन को बुलाने की मान्यता
मान्यता है कि श्राद्ध के अवसर पर बेटी, बहन और नातिन को भोजन कराना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे पितरों को संतुष्टि प्राप्त होती है। जिन परिवारों में बेटी या बहन का रिश्ता मौजूद नहीं होता, वहां दूर के रिश्ते की बहनों या बेटियों को भी निमंत्रित करने की परंपरा बताई गई है।
नातिन और भांजी की मौजूदगी
दी गई मान्यता में नातिन के साथ मृत व्यक्ति की भांजी और भांजी की बेटी को भी श्राद्ध भोज कराने का उल्लेख मिलता है। इस तरह श्राद्ध की परंपरा को केवल पुत्र या पुरुष वंशज तक सीमित नहीं माना गया है। बेटी, नातिन, बहन और अन्य करीबी रिश्तों को भी पितरों के सम्मान से जुड़े इस संस्कार में विशेष स्थान दिया गया है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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