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बेटी कर सकती है मां-बाप का श्राद्धकर्म या नहीं? संतान के इस अधिकार पर क्या कहता है गरुड़ पुराण

 Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
 Published : Jul 09, 2026 08:23 pm IST,  Updated : Jul 09, 2026 08:23 pm IST

गरुड़ पुराण में श्राद्ध कर्म और पिंडदान को पितरों की शांति से जुड़ा महत्वपूर्ण कर्म बताया गया है। सामान्य स्थिति में पुत्र को श्राद्ध कर्म का मुख्य अधिकारी माना गया है। लेकिन बेटा न हो तो क्या बेटी द्वारा भी यह कर्म किया जा सकता है? जानिए इस परंपरा को लेकर क्या नियम बताए गए हैं।

Garud Puran- India TV Hindi
बेटा न होने पर क्या बेटी कर सकती है मां-बाप का श्राद्धकर्म? Image Source : INDIA TV

माता-पिता के निधन के बाद उनके श्राद्ध कर्म को लेकर अक्सर लोगों के मन में कई सवाल होते हैं। खासतौर पर जब किसी परिवार में बेटा न हो, तो यह जानने की इच्छा होती है कि क्या बेटी अपने माता-पिता का श्राद्ध कर सकती है। धर्म ग्रंथों खासतौर पर गरुड़ पुराण में संतान के इस अधिकार को लेकर कुछ नियम बताए हैं। यह संतान का महत्वपूर्ण फर्ज भी माना जाता है। चलिए जानते हैं बेटी मां-बाप का श्राद्धकर्म कर सकती है या नहीं। 

श्राद्ध का महत्व

सनातन धर्म में श्राद्ध कर्म को पितरों के प्रति सम्मान और कर्तव्य निभाने का माध्यम माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध और तर्पण करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग मिलता है। 

बेटी के श्राद्ध को लेकर मान्यता

गरुड़ पुराण की मान्यताओं के अनुसार, माता-पिता के श्राद्ध कर्म का मुख्य अधिकार पुत्र को दिया गया है। कहते हैं कि पुत्र द्वारा किए गए श्राद्ध से पितरों को मुक्ति प्राप्त होती है। इसी कारण परंपरागत रूप से बेटी को श्राद्ध कर्म का मुख्य अधिकारी नहीं माना गया है।

हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में अलग मान्यताएं देखने को मिलती हैं। कई जगहों पर परिस्थितियों के अनुसार बेटियों द्वारा भी मां-बाप के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा निभाई जाती है। दोनों की अनुपस्थिति में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा भी यह कर्म किए जाने की मान्यताएं हैं।

बेटा न होने पर कौन करे श्राद्ध

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति का पुत्र नहीं है तो उसकी पत्नी श्राद्ध कर्म कर सकती है। इसके अलावा पुत्र वधु, पोता या परिवार का अन्य योग्य सदस्य भी यह जिम्मेदारी निभा सकता है। अगर परिवार में इनमें से कोई भी मौजूद न हो तो बेटी का पुत्र यानी नाती अपने नाना-नानी का श्राद्ध कर सकता है। कुछ परिस्थितियों में पंडित के माध्यम से भी श्राद्ध कर्म करवाने की परंपरा बताई गई है।

क्यों जरूरी है श्राद्ध

मान्यता है कि मृत्यु के बाद श्राद्ध करने से पूर्वजों को शांति प्राप्त होती है, जबकि श्राद्ध कर्म न करने से पितृ दोष जैसी परेशानियां आ सकती हैं। विधि-विधान से किए गए तर्पण और श्राद्ध को परिवार की सुख-समृद्धि से भी जोड़ा जाता है। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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