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ये 5 ऋण परेशानियों का बनते हैं कारण, जीवन सुख-शांति से बिताना है तो इन कर्ज को जरूर उतारें, शास्त्रों में बताया है महत्व

 Written By: Arti Azad
 Published : Sep 25, 2026 09:38 am IST,  Updated : Sep 25, 2026 09:38 am IST

सनातन मान्यताओं के अनुसार जन्म लेते ही मनुष्य पर पांच तरह के ऋण होते हैं। इनका संबंध माता-पिता, पूर्वजों और समाज के प्रति हमारे कर्तव्यों से है। शास्त्रों के अनुसार इन दायित्वों को निभाना जीवन में सुख-शांति बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।

5 Types of Debts in Hinduism- India TV Hindi
मनुष्य के ऊपर 5 कर्ज Image Source : PINTEREST

व्यक्ति का जीवन केवल उसके कर्मों तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि परिवार, देवी-देवताओं, ऋषियों और समाज के प्रति भी कुछ कर्तव्य बताए हैं। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, जन्म लेते ही मनुष्य पर 5 तरह के ऋण माने जाते हैं। इन्हें पितृ, मातृ, देव, ऋषि और मनुष्य ऋण कहा गया है। मान्यता है कि इन दायित्वों को निभाने से जीवन में सुख-शांति बनी रहती है, वरना व्यक्ति को जीवनभर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। 

1. मातृ ऋण का संबंध मां और उनके परिवार से माना जाता है। इसमें नाना-नानी, मामा-मामी, मौसा-मौसी और मातृ पक्ष की पूर्व पीढ़ियों को भी शामिल किया जाता है। धार्मिक मान्यता में मां को विशेष सम्मान दिया गया है। कहा जाता है कि माता का अपमान करना या उन्हें कष्ट पहुंचाना जीवन में परेशानियों का कारण बन सकता है। इसलिए माता और मातृ पक्ष के प्रति सम्मान और कर्तव्य निभाना जरूरी माना गया है।

2. पितृ ऋण में पिता के साथ दादा-दादी, ताऊ-चाचा और पूर्वजों की पीढ़ियों को शामिल किया जाता है। मान्यता है कि पूर्वजों के प्रति सम्मान और उनके निमित्त श्राद्ध-तर्पण करना संतान का दायित्व है। धार्मिक मान्यताओं में पितरों की उपेक्षा को परिवार में विभिन्न तरह की परेशानियों से जोड़ा गया है।

पितृ ऋण से जुड़े धार्मिक उपायों में श्रीमद्भागवत महापुराण का पाठ, हवन, तर्पण और पिंडदान आदि का उल्लेख मिलता है। गया जी जाकर पितरों का श्राद्ध और पिंडदान करने की भी परंपरा है।

3. देव ऋण का संबंध देवी-देवताओं और कुल देवता के प्रति कर्तव्य से माना जाता है। धार्मिक परंपरा में माता-पिता को प्रथम देवता कहा गया है। इसके बाद व्यक्ति अपने इष्ट देव और कुल देवता की पूजा करता है। मान्यता है कि नियमित रूप से देवी-देवताओं का स्मरण और पूजा करना इस ऋण के प्रति कर्तव्य निभाने का एक तरीका है।

4. ऋषि ऋण, जिस ऋषि के गोत्र से व्यक्ति का संबंध माना जाता है, उनके प्रति सम्मान को यह ऋण से जोड़ा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऋषियों के ज्ञान और परंपरा को आगे बढ़ाना इस ऋण को चुकाने का माध्यम माना जाता है। इसी कारण धार्मिक परंपराओं में ऋषि तर्पण और अपने गोत्र का स्मरण करने का महत्व बताया गया है।

5. मनुष्य ऋण का दायरा काफी व्यापक माना गया है। इसमें उन लोगों के प्रति कृतज्ञता शामिल है, जिन्होंने जीवन में किसी न किसी रूप में मदद, स्नेह या सहयोग दिया। पशु-पक्षियों और प्रकृति से मिलने वाले सहयोग को भी इससे जोड़ा जाता है। जरूरतमंद और असहाय लोगों की मदद करना, किसी का हक न छीनना और दूसरों के प्रति संवेदनशील रहना इस ऋण को निभाने का एक तरीका बताया गया है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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