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क्यों भगवान शिव को शिकारी का रूप धारण कर अर्जुन से लड़ना पड़ा युद्ध? पढ़ें किरातेश्वर अवतार की रोचक कथा

 Written By: Naveen Khantwal
 Published : Aug 17, 2026 08:57 am IST,  Updated : Aug 17, 2026 09:05 am IST

अर्जुन भगवान शिव के भक्त थे लेकिन बावजूद इसके भी अर्जन और भगवान शिव के बीच एक बार युद्ध हुआ था। इस युद्ध में भगवान शिव ने अर्जुन को पाराजित किया था। लेकिन युद्ध लड़ने का कारण क्या था, और क्यों भगवान शिव को किरात यानि शिकारी का रूप धारण करना पड़ा था, इसके बारे में आज हम आपको जानकारी देंगे।

Kirateshwar Mahadev- India TV Hindi
किरातेश्वर महादेव Image Source : INDIA TV

भगवान शिव ने एक बार शिकारी का रूप धारण कर अर्जुन से युद्ध लड़ा था। यह कथा महाभारत युद्ध से पहले की है जब अर्जुन दिव्य अस्त्र की प्राप्ति के लिए कठोर तप कर रहे थे। दिव्य अस्त्र की प्राप्ति के लिए अर्जुन को महादेव की कठिन परीक्षा को भी पार करना पड़ा था। इस परीक्षा के दौरान महादेव ने अपने भक्त अर्जुन के साथ युद्ध भी लड़ा था। अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए शिव जी ने किरात का रूप धारण किया था इसलिए वो किरातेश्वर कहलाए। आज इस पूरी कथा के बारे में हम आपको जानकारी देंगे। 

युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए अर्जुन ने किया तप

महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए पितामह भीष्म और वेदव्यास जी ने अर्जुन को अमोघ अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने की सलाह दी। इसके बाद अर्जुन इंद्रकील पर्वत पर गए और भगवान शिव की कठोर तपस्या में लीन हो गए। अर्जुन का उद्देश्य था कि शिव जी से उन्हें पाशुपातस्त्र प्राप्त हो।  यह वो अस्त्र था जिसे मन, वाणी और धनुष से चलाया जा सकता था और इसके द्वारा आसानी से शत्रुओं पर विजय प्राप्त की जा सकती थी। अर्जुन की घोर तपस्या को देखकर महादेव ने उनकी परीक्षा लेने का विचार बनाया। 

युद्ध की शुरुआत

अर्जुन की तपस्या को भंग करने के लिए दुर्योधन ने मूक नाम के एक विशाल जंगली सुअर (वराह) को इंद्रकील पर्वत पर भेजा। वराह को अपनी ओर आता देख अर्जुन ने उस पर अपना बाण साधा, ठीक उसी समय वहां मौजूद एक किरात (शिकारी के रूप में भगवान शिव) ने भी बाण चला दिया। दोनों के बाण उस सुअर पर लगे और इसके बाद अर्जुन और किरात रूप में आए भगवान शिव के बीच विवाद शुरू हो गया। दोनों शिकार पर अपना अधिकार जताने लगे। बात इतनी बढ़ी कि इसने युद्ध का रूप ले लिया। अर्जुन ने शिकारी को परास्त करने के लिए कई दिव्य अस्त्रों का इस्तेमाल किया लेकिन किरात यानि शिकारी पर इन अस्त्र-शस्त्रों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। शिकारी का रूप धारण किए शिव जी ने अर्जुन के सभी बाण हवा में ही निष्फल कर दिए। क्रोध में आकर अर्जुन ने गांडीव धनुष से प्रहार करना चाहा तो किरात ने पलक झपकते ही उनसे धनुष छीन लिया। अस्त्र-शस्त्रों का जब कोई असर नहीं हुआ तो अर्जुन मल्ल-युद्ध लड़ने पर उतर आए लेकिन किरात ने आसानी से उन्हें धराशायी कर दिया और कुछ समय के लिए अर्जुन बेहोश हो गए। अर्जुन की सभी विद्याएं निष्फल हो चुकी थीं। 

सच्चाई का हुआ बोध

होश में आने के बाद अर्जुन समझ चुके थे कि जिस शिकारी से वो लड़ रहे हैं वो साधारण नहीं है। अपनी पराजय से आहत अर्जुन ने मन में शिव जी का धान्य किया और वहां स्थित मिट्टी से एक शिवलिंग बनाकर उस पर फूल चढ़ाए। अगले ही पल अर्जुन ने देखा कि जो फूल वो शिवलिंग पर चढ़ा रहे हैं वो सामने खड़े शिकारी के गले की माला में नजर आ रहे हैं। इसके बाद अर्जुन समझ गए कि किरात यानि शिकारी कोई और नहीं साक्षात भगवान शिव हैं। इसके बाद किरात रूपी शिवजी के चरणों में गिर पड़े और उनसे क्षमा मांगने लगे। भगवान शिव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और अर्जुन से कहा कि मैं तुम्हारी वीरता, बाण विद्या और भक्ति से प्रसन्न हूं। अब तुम्हारा अहंकार टूट चुका है और तुम ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली अस्त्र के योग्य हो। 

अर्जुन को मिला पाशुपतास्त्र

अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर अंत में भगवान शिव ने अर्जुन को पाशुपास्त्र दिया। इस अस्त्र की मदद से अर्जुन ने महाभारत के युद्ध में कौरवों पर विजय प्राप्त की और अधर्म का नाश किया। भगवान शिव ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए शिकारी यानि किरात का रूप धारण किया था इसलिए भगवान शिव किरातेश्वर महादेव कहलाए। किरातेश्वर महादेव मंदिर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य सिक्किम में स्थित है। इस मंदिर में नाग पंचमी, महाशिवरात्रि और बाला चतुर्दशी के दिन बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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