करवा चौथ का पावन पर्व पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत की शुरुआत सुबह सरगी के साथ होती है। सरगी में फल, मिठाइयां, मेवे, फेनी और सुहाग की वस्तुएं होती हैं, जो अमूमन सास द्वारा अपनी बहू को दी जाती हैं। सरगी में मिली इन चीजों का सेवन करके ही इस कठिन निर्जला व्रत की शुरुआत की जाती है। इसके बाद शाम के शुभ मुहूर्त में शिव परिवार और करवा माता की विधिवत पूजा की जाती है। साथ ही इस दौरान व्रत कथा सुनने की भी विशेष परंपरा है। अंत में रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। आइए अब जानते हैं करवा चौथ व्रत की संपूर्ण विधि स्टेप-बाय-स्टेप।
करवा चौथ व्रत विधि
पहला स्टेप: सरगी और व्रत का संकल्प
करवा चौथ व्रत की शुरुआत सुबह सरगी के साथ होती है और सुबह 4:00 से 5:00 बजे के बीच का समय सरगी के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। सरगी में फल, मिठाइयां, मेवे, फेनी और सुहाग की वस्तुएं होती हैं। सरगी में मिली खाने की चीजों का सेवन करने के बाद पानी पीकर पूरे दिन के लिए निर्जला व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद सूर्योदय के बाद कुछ भी खाया-पिया नहीं जाता है।
दूसरा स्टेप: श्रृंगार और पूजा की तैयारी
करवा चौथ पर सुहागिनों के लिए सोलह श्रृंगार करना बेहद शुभ माना जाता है इसलिए इस दिन महिलाएं पूर्ण श्रृंगार करती हैं। नए वस्त्र पहनती हैं और हाथों में मेहंदी लगाती हैं। इसके साथ ही शाम की पूजा की तैयारी में लग जाती हैं। दिन में ही करवा चौथ की पूजा के लिए चौकी सजा ली जाती है। इस चौकी पर शिव परिवार की प्रतिमा के साथ-साथ करवा माता की मूर्ति या करवा चौथ का कैलेंडर भी लगाया जाता है।
तीसरा स्टेप: करवा चौथ की पूजा और कथा
शाम को शुभ मुहूर्त में माता पार्वती, भगवान शिव, गणेश जी, कार्तिकेय जी और करवा माता की विधि विधान पूजा की जाती है। साथ ही इस दौरान सुहागिन महिलाएं करवा चौथ की कथा भी सुनती हैं। पूजा के समय महिलाएं आपस में करवों का आदान-प्रदान भी करती हैं। जो महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा में शामिल नहीं होतीं वे माता गौरी की प्रतिमा के सामने बैठकर माता के साथ विधि-विधान से करवा बदलती हैं।
चौथा स्टेप: चंद्रमा को अर्घ्य
शाम की पूजा के बाद अब बारी आती है चंद्रमा को अर्घ्य देने की। इस रस्म को निभाने के लिए महिलाएं एक थाली में दीया, कुछ मिठाई, फूल, जल और छलनी रखती हैं। सबसे पहले छलनी में दीया जलाकर चंद्रमा के दर्शन किए जाते हैं और फिर उसी छलनी से महिलाएं अपने पति का चेहरा देखती हैं। इसके बाद चंद्रमा को दूध और जल से मिश्रित अर्घ्य दिया जाता है और साथ ही मिठाई का भोग लगाया जाता है। साथ ही चंद्र देव को फूल भी अर्पित किये जाते हैं।
पांचवां स्टेप: व्रत का पारण
चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद महिलाएं अपने पति के हाथों से पानी पीकर और मिठाई खाकर अपना उपवास खोलती हैं। इसके बाद घर के बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है और फिर सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है। साथ ही अपनी सास या बुजुर्ग महिला को बायना दिया जाता है। जिसमें फल, मिठाई, वस्त्र और दक्षिणा होती है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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