भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी को ललिता सप्तमी का पर्व मनाया जाता है। यह दिन मां ललिता त्रिपुर सुंदरी की आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है। श्री विद्या परंपरा में देवी को आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता है। मां ललिता ने भंडासुर का वध कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया था। इसी शक्ति और विजय की स्मृति में ललिता सप्तमी का पर्व मनाए जाने की मान्यता है। वहीं, राधा रानी की प्रिय सखी के प्राकट्योत्सव भी इसी दिन हुआ था, जिसे ललिता सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। जानिए भंडासुर के अत्याचार से लेकर देवी के प्राकट्य और विजय तक की पूरी पौराणिक कथा।
कौन हैं मां ललिता त्रिपुर सुंदरी?
मां ललिता त्रिपुर सुंदरी को आदिशक्ति का दिव्य स्वरूप और संपूर्ण सृष्टि की जननी माना जाता है। श्री विद्या परंपरा में उन्हें परम शक्ति के रूप में पूजा जाता है। 'ललिता' का अर्थ है लीला करने वाली, यानी जिनकी दिव्य शक्ति से सृष्टि की रचना, पालन और संहार का क्रम चलता है। उन्हें 'श्री माता' और 'राजराजेश्वरी' जैसे नामों से भी जाना जाता है। दस महाविद्याओं में उनका स्वरूप 'षोडशी' कहलाता है। मां ललिता का स्वरूप सौंदर्य, करुणा, शक्ति और मंगल का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त उन्हें मां के रूप में श्रद्धा से पूजते हैं, देवी उनकी रक्षा करती हैं और जीवन में सुख, शांति व समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। श्री विद्या साधना में देवी की उपासना तीन रूपों में बताई गई है। स्थूल रूप में उनके दिव्य स्वरूप की पूजा, सूक्ष्म रूप में श्री विद्या मंत्र की साधना और परम स्वरूप में श्रीचक्र की उपासना होती है। ललिता सहस्रनाम स्तोत्र में देवी के इन विभिन्न स्वरूपों और नामों का विस्तार से वर्णन मिलता है।
ललिता सप्तमी की पौराणिक कथा
ललिता सप्तमी की पौराणिक कथा का वर्णन ब्रह्मांड पुराण के ललितोपाख्यान, जिसे ललिता माहात्म्य के नाम से भी जाना जाता है, में मिलता है। इसमें मां ललिता त्रिपुर सुंदरी के प्राकट्य और भंडासुर के साथ उनके युद्ध का विस्तार से वर्णन किया गया है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय सृष्टि में राक्षसी शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगा था और धर्म पर संकट मंडराने लगा था। इसी दौरान भंडासुर नामक एक शक्तिशाली असुर का आतंक तीनों लोकों में फैल गया। कहा जाता है कि भंडासुर भगवान शिव के क्रोध से उत्पन्न राख से पैदा हुआ था। उसने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया और इसके प्रभाव से वह बेहद शक्तिशाली हो गया। इसके बाद उसने देवताओं को पराजित कर इंद्रलोक समेत तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया।
भंडासुर के बढ़ते अत्याचार से परेशान देवताओं ने भगवान विष्णु और महादेव से सहायता मांगी, लेकिन वरदान के कारण उसका वध करना आसान नहीं था। तब सभी देवताओं ने आदिशक्ति से प्रार्थना की कि वे स्वयं शक्ति स्वरूप में प्रकट होकर इस संकट का अंत करें। देवताओं की प्रार्थना से ब्रह्मांड में दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और उसी तेज से मां ललिता त्रिपुर सुंदरी का प्राकट्य हुआ। देवी सौंदर्य, शक्ति और करुणा की त्रिपुर स्वरूपा थीं। उनके चार हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण सुशोभित थे। वे सिंह पर सवार थीं और श्रीचक्र पर विराजमान थीं। इसके बाद मां ललिता ने भंडासुर के साथ घोर युद्ध किया। इस युद्ध में उनके साथ कई अन्य शक्तियां भी शामिल हुईं। अंत में देवी ने अपने क्रोध से उत्पन्न कामेश्वरी अस्त्र का प्रयोग कर भंडासुर का वध किया और तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया। धर्म की पुनः स्थापना और देवी की इस महाशक्ति की विजय की स्मृति में ललिता सप्तमी का पर्व मनाए जाने की मान्यता है।
कैसे की जाती है पूजा?
ललिता सप्तमी पर श्रद्धालु मां ललिता त्रिपुर सुंदरी की पूजा और व्रत करते हैं। विशेष रूप से महिलाएं अखंड सौभाग्य, संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि की कामना से देवी की आराधना करती हैं। इस दिन श्री यंत्र की पूजा और ललिता सहस्रनाम का पाठ करने की परंपरा भी बताई गई है। मां को लाल वस्त्र, लाल फूल, हलवा-पुरी और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। मान्यता है कि श्रद्धा के साथ मां की उपासना करने से भक्तों को देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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