1. Hindi News
  2. धर्म
  3. संतान सप्तमी व्रत कथा: इस दिन जरूर पढ़ें राजा नहुष और रानी चंद्रमुखी की यह कहानी

संतान सप्तमी व्रत कथा: इस दिन जरूर पढ़ें राजा नहुष और रानी चंद्रमुखी की यह कहानी

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Sep 17, 2026 01:34 pm IST,  Updated : Sep 17, 2026 02:18 pm IST

कहते हैं संतान सप्तमी की यह पावन कथा खुद भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी। यह कहानी नहुष नामक एक राजा और उनकी पत्नी रानी चंद्रमुखी से जुड़ी हुई है।

संतान सप्तमी व्रत कथा- India TV Hindi
संतान सप्तमी व्रत कथा Image Source : CANVA

Santan Saptami Vrat Katha: संतान सप्तमी का व्रत इस साल 18 सितंबर 2026 को रखा जाएगा। इस दिन महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं इस दिन वो लोग भी व्रत रखते हैं जिन्हें संतान सुख की चाह है। बता दें इस व्रत में विशेष रूप से शिव परिवार की पूजा होती है। इस दिन माताएं अपनी कलाई में संतान की सुरक्षा के लिए एक विशेष तरह का डोरा पहनती हैं जिसमें 7 गांठें लगी होती हैं। तो वहीं इस व्रत में भगवान को सात पूए का विशेष भोग भी लगाया जाता है और इतना ही नहीं व्रत का पारण भी सात पूए खाकर ही किया जाता है। यानी इस व्रत में 7 अंक का विशेष महत्व होता है। चलिए अब जानते हैं संतान सप्तमी के व्रत में कौन सी कथा पढ़ी जाती है।

संतान सप्तमी व्रत कथा 

कथा के अनुसार प्राचीन समय में अयोध्या नगरी में राजा नहुष राज्य करते थे, जिनकी पत्नी का नाम रानी चंद्रमुखी था। उसी नगर में विष्णुदत्त नाम के एक ब्राह्मण भी अपनी पत्नी रूपवती के साथ रहा करते थे। रानी चंद्रमुखी और रूपवती की आपस में अच्छी मित्रता थी। एक दिन दोनों महिलाएं सरयू नदी में स्नान करने गईं, जहां उन्होंने कुछ महिलाओं को शिव-पार्वती की पूजा करते देखा। दोनों ने जब उन महिलाओं से पूजा का कारण पूछा, तो उन्होंने ने बताया कि वे संतान की लंबी आयु और कल्याण के लिए संतान सप्तमी का व्रत कर रही हैं। यह सुनकर रानी चंद्रमुखी और रूपवती इस व्रत से काफी प्रभावित हुईं और दोनों ने भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर व्रत करने का संकल्प लिया।

रूपवती ने अपने संकल्प को पूरी श्रद्धा से निभाया। वह प्रत्येक वर्ष संतान सप्तमी का व्रत रखने लगी। वहीं रानी चंद्रमुखी राजमहल के कार्यों में इतनी व्यस्त हो गईं कि वे धीरे-धीरे अपने संकल्प को भूल गई और उसने संतान सप्तमी का व्रत करना बंद कर दिया। चूंकि रूपवती ने संतान सप्तमी का व्रत नियमपूर्वक किया था इसलिए अगले जन्म में उसे ईश्वरी नाम की ब्राह्मण महिला के रूप में जन्म मिला। साथ ही उसे कई स्वस्थ और बलवान पुत्रों का सुख प्राप्त हुआ। तो वहीं दूसरी तरफ रानी चंद्रमुखी ने संतान सप्तमी का संकल्प पूरा नहीं किया था इसलिए उसे पहले वानरी के रूप में जन्म लेना पड़ा। फिर इसके बाद उसे मानव जीवन मिला और वह विमला नाम की रानी बनी, लेकिन इस जन्म में उसे संतान सुख की प्राप्ति अभी तक नहीं हुई थी।

संयोग से ईश्वरी उसी शहर में रहती थी जहां रानी विमला रहा करती थी और ईश्वरी अक्सर महल में आती जाती रहती थी। रानी विमला ने जब ईश्वरी के बेटों को स्वस्थ बढ़ते देखा तो उसे ईर्ष्या होने लगे। उसने कई बार उसके लड़कों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन उसका हर प्रयास विफल रहा। हारकर रानी ने ईश्वरी से पूछ ही लिया कि उसके बेटे इतने सुरक्षित कैसे रहते हैं। तब ईश्वरी ने रानी को उनके पिछले जन्म की याद दिलाई। उसने कहा आपने पिछले जन्म में अपना संकल्प पूरा नहीं किया इसलिए ईश्वर ने आपको संतान सुख से वंचित रखा। रानी विमला ने इसके बाद पूर्ण विधि-विधान से संतान सप्तमी का व्रत रखा और शिव और पार्वती से अपनी गलती की क्षमा मांगी। व्रत के प्रभाव से रानी को संतान सुख की प्राप्ति हुई।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

यह भी पढ़ें:

गणपति के हर स्वरूप की पूजा से मिलते हैं अलग-अलग लाभ, सफलता-समृद्धि दिला सकते हैं ये विशेष मंत्र

Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। धर्म से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें।