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Mokshada Ekadashi Vrat Katha: 1 दिसंबर को मोक्षदा एकादशी, पढ़ें ये पावन कथा हर पाप से मिल जाएगी मुक्ति, जीवन में आएगी सुख-शांति

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Dec 01, 2025 06:48 am IST,  Updated : Dec 01, 2025 09:13 am IST

Mokshada Ekadashi Vrat Katha: मोक्षदा एकादशी को मोह का नाश करने वाली एकादशी के नाम से जाना जाता है। ये एकादशी हर साल मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस साल ये एकादशी व्रत 1 दिसंबर को रखा जा रहा है। चलिए आपको बताते हैं मोक्षदा एकादशी की पावन कथा।

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मोक्षदा एकादशी व्रत कथा Image Source : CANVA

Mokshada Ekadashi Vrat Katha: वर्ष में आने वाली चौबीस एकादशियों में से मोक्षदा एकादशी का खास महत्व माना गया है। इसे गीता जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं अनुसार इसी एकादशी के दिन भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान देना शुरू किया था। यही कारण है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण, महर्षि वेद व्यास और श्रीमद् भागवत गीता का पूजन किया जाता है। कहते हैं मोक्षदा एकादशी का व्रत करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है साथ ही मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है। चलिए आपको बताते हैं मोक्षदा एकादशी की पावन कथा के बारे में।

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (Mokshada Ekadashi Vrat Katha)

मोक्षदा एकादशी की कथा के अनुसार गोकुल नाम के नगर में वैखानस नामक राजा राज्य करता था। जिसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे। वह राजा अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करता था। एक बार राजा ने सपने में देखा कि उसके पिता नरक में हैं तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। सुबह उठते ही वह विद्वान ब्राह्मणों के पास गया और अपना सपना सुनाया। राजा ने कहा कि मेरे पिता ने मुझसे कहा कि पुत्र मैं नरक में पड़ा हूं। यहां से तुम मुझे मुक्त कराओ। जबसे मैंने ये वचन सुने हैं तबसे मैं बेचैन हूं। 

राजा ने कहा- हे ब्राह्मण देवताओं इस दु:ख के कारण मेरा सारा शरीर जल रहा है। कृपा करके कोई तप, दान, व्रत आदि ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल जाए। आगे राजा कहने लगा कि उस पुत्र का जीवन व्यर्थ है जो अपने माता-पिता का उद्धार न कर सके। ब्राह्मणों ने कहा- हे राजन! यहां पास ही भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञाता पर्वत ऋषि का आश्रम है। आपकी समस्या का हल वे जरूर करेंगे। ऐसा सुनकर राजा मुनि के आश्रम पर गया। राजा ने मुनि को साष्टांग दंडवत किया और अपनी दुख बताया। ऐसा सुनकर पर्वत मुनि ने आंखें बंद की और फिर बोले हे राजन! मैंने योग के बल से तुम्हारे पिता के कुकर्मों को जान लिया है। उन्होंने पूर्व जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति दी किंतु सौत के कहने पर दूसरे पत्नी को ऋतुदान मांगने पर भी नहीं दिया। उसी पापकर्म के कारण तुम्हारे पिता को नर्क में जाना पड़ा।

मुनि बोले: हे राजन! आप मार्गशीर्ष एकादशी का उपवास करें और उस उपवास के पुण्य को अपने पिता को संकल्प कर दें। इसके प्रभाव से आपके पिता को नरक से मुक्ति मिल जाएगी। मुनि के वचन सुनकर राजा महल में आया और मुनि के कहे अनुसार कुटुम्ब सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत किया। इसके उपवास का पुण्य उसने पिता को अर्पण कर दिया। जिससे उनके पिता को नरक से मुक्ति मिली और स्वर्ग में जाते हुए वे पुत्र से कहने लगे- हे पुत्र तेरा कल्याण हो। यह कहकर स्वर्ग चले गए।

अत: मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का जो व्रत करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत से बढ़कर मोक्ष देने वाला कोई अन्य व्रत नहीं है। इस दिन से गीता-पाठ का अनुष्ठान प्रारंभ करें तथा प्रतिदिन थोडी देर गीता अवश्य पढें।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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