सनातन धर्म में मृत्यु के बाद शव के अंतिम संस्कार से जुड़ी कई परंपराएं निभाई जाती हैं। इनमें शव के नाक और कान में रुई रखना भी शामिल है। यह एक ऐसी रस्म है, जिसे आपने कई बार देखा होगा, लेकिन इसके पीछे की वजह शायद ही पता हो। तो चलिए जानते हैं कि आखिर मृतक के नाक-कान में रुई लगाने के पीछे क्या कारण बताए जाते हैं.
अंतिम संस्कार की परंपरा
मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार से पहले शव को स्नान कराने से लेकर उसे अंतिम यात्रा के लिए तैयार करने तक अलग-अलग रीति-रिवाज होते हैं। नाक और कान में रुई रखना भी इन्हीं परंपराओं में से एक है। हालांकि, हर क्षेत्र में इससे जुड़ी प्रथाएं एक जैसी हों, यह जरूरी नहीं है।
गरुड़ पुराण में क्या मान्यता
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद की स्थिति और जीवात्मा की यात्रा का वर्णन मिलता है। सनातन परंपराओं में माना जाता है कि मृत्यु के तुरंत बाद जीवात्मा का शरीर से मोह पूरी तरह समाप्त नहीं होता। इसलिए शरीर के खुले मार्गों को बंद करने की परंपरा को आत्मा की आगे की यात्रा से जोड़कर देखा जाता है। कुछ धार्मिक मान्यताओं में इसे नकारात्मक प्रभावों से शव की रक्षा करने से भी जोड़ा जाता है।
क्या कहता है साइंस?
वहीं, विज्ञान की माने तो मृत्यु के बाद शरीर की सामान्य जैविक गतिविधियां बंद हो जाती हैं और इसके बाद धीरे-धीरे अपघटन की प्रक्रिया शुरू होती है। मांसपेशियों में बदलाव आने के साथ शरीर के अंदर मौजूद सूक्ष्मजीव सक्रिय होकर अपघटन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं। इस दौरान शरीर के प्राकृतिक छिद्रों से तरल पदार्थ निकलने की संभावना भी रहती है।
रुई लगाने की व्यावहारिक वजह
नाक और कान में रुई रखने से ऐसे प्राकृतिक रिसाव को कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। शव को बाहरी धूल, गंदगी और कीड़ों आदि के सीधे संपर्क से बचाने में यह तरीका उपयोगी है। इस तरह अंतिम संस्कार प्रक्रिया के दौरान शव को साफ-सुथरा रखने में मदद मिलती है। शव की देखभाल से जुड़ी वजहें व्यावहारिक और जैविक प्रक्रियाओं से संबंधित हैं। यही वजह है कि नाक और कान में रुई लगाने की रस्म आज भी अंतिम संस्कार का हिस्सा है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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