1. Hindi News
  2. धर्म
  3. पाताल लोक से हुई थी रक्षाबंधन की शुरुआत, एक अनोखे वादे के कारण कलाई पर बांधी गई थी पहली राखी

पाताल लोक से हुई थी रक्षाबंधन की शुरुआत, एक अनोखे वादे के कारण कलाई पर बांधी गई थी पहली राखी

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Aug 20, 2026 08:38 am IST,  Updated : Aug 20, 2026 08:44 am IST

रक्षा बंधन एक प्राचीन भारतीय त्योहार है जिसकी शुरुआत को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। लेकिन आज हम जिस कथा के बारे में आपको बताने जा रहे हैं वो इस त्योहार की सबसे पौराणिक कथा मानी जाती है। कहते हैं यहीं से भाई के हाथ पर राखी बांधने की शुरुआत हुई थी।

rakhi- India TV Hindi
कैसे शुरू हुआ रक्षाबंधन का त्योहार Image Source : INDIA TV

रक्षाबंधन का त्योहार 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। जब भी कोई पर्व आने को होता है, तो उस पर्व से जुड़ी कथाओं और कहानियों के बारे में इंटरनेट पर खूब सर्च होने लगता है। जैसा कि राखी का त्योहार आने वाला है तो ऐसे में स्वाभाविक है कि लोग इस बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहेंगे। इस त्योहार को लेकर एक बड़ा सवाल जो हर किसी के मन में रहता है कि आखिर इस पर्व की शुरुआत हुई कैसे थी और इतिहास में सबसे पहली राखी किसने किसको बांधी थी? तो आज हम अपने इस खास लेख में आपके इसी सवाल का सटीक जवाब देंगे। क्या आप जानते हैं कि राखी की शुरुआत धरती नहीं बल्कि पाताल लोक से हुई थी।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन के त्योहार का प्रारंभ खुद माता लक्ष्मी ने किया था। माता ने एक अनोखे वादे के कारण राजा बलि के हाथ में पहली राखी बांधी थी। चलिए जानते हैं राखी की सबसे पौराणिक कथा।

रक्षाबंधन की सबसे पौराणिक कथा

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, असुरराज बलि बहुत पराक्रमी और दानवीर राजा थे। उन्होंने अपने तपोबल और पराक्रम से तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था। इससे भयभीत होकर देवराज इंद्र भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। तब देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और वे राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे। बलि ने यज्ञ में आए वामन देव से मनचाहा दान मांगने को कहा। जिस पर वामन देव ने केवल तीन पग भूमि देने की मांग की। जब राजा बलि इतनी भूमि देने के लिए तैयार हो गए तब वामन देव ने अपना विशाल रूप धारण किया और उन्होंने दो पग में ही पूरी पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग लोक नाप लिया। 

जब तीसरा पग रखने के लिए कुछ नहीं बचा तब राजा बलि ने अपना सिर ही वामन देव के चरणों में रख दिया। बलि की इस भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया। साथ ही भगवान विष्णु ने बलि से वरदान मांगने को कहा, तब राजा बलि ने एक अत्यंत अनोखा वादा मांग लिया। बलि ने कहा, 'हे प्रभु मुझे वरदान दीजिए कि जब भी मैं सुबह उठूं या रात को सोऊं, आप हमेशा मेरे सामने रहें। मेरी इच्छा है कि आप मेरे पाताल लोक के द्वारपाल बनकर रहें।' इसके बाद भगवान विष्णु बैकुंठ धाम छोड़कर पाताल लोक में राजा बलि के द्वारपाल बनकर रहने लगे।

माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वापस पाने के लिए बांधी पहली राखी

भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम छोड़ने से माता लक्ष्मी अत्यंत दुखी रहने लगीं। तब उन्होंने प्रभु को वापस लाने की एक योजना बनाई। उस योजना के तहत माता लक्ष्मी एक साधारण स्त्री का रूप धारण करके पाताल लोक पहुंचीं। उन्होंने राजा बलि को अपना भाई माना और श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर एक रक्षासूत्र बांध दिया। साथ ही उन्होंने राजा बलि के लंबे और सुखद जीवन की प्रार्थना की। यह देख राजा बलि का दिल स्नेह और करुणा से भर गया। जिसके बाद राजा बलि ने अपनी धर्म बहन से कुछ मांगने के लिए कहा। तब माता लक्ष्मी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुईं और बोलीं, 'हे राजन! मुझे धन-दौलत कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ मेरे स्वामी मुझे लौटा दो।' राजा बलि ने माता लक्ष्मी द्वारा बांधे गए पवित्र धागे का मान रखा और तुरंत भगवान विष्णु को अपने उस अनोखे वादे से मुक्त कर दिया, जिसके तहत उन्होंने भगवान को अपना द्वारपाल बना लिया था। इसके बाद माता लक्ष्मी भगवान विष्णु को लेकर बैकुंठ धाम वापस आ गईं। कहते हैं इस घटना के बाद से ही राखी पर्व मनाया जाने लगा। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

यह भी पढ़ें:

Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। धर्म से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें।