आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा मनाई जाती है। शरद पूर्णिमा को कोजागरा, शरद पूनम और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन रात में खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा है। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन आसमान से अमृत की वर्षा होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे साल में केवल यही एक ऐसी रात होती है जब चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होते हैं। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूजा की पूजा और व्रत करने का भी विधान है। तो अगर आप पूर्णिमा का व्रत रख रहे हैं तो शरद पूर्णिमा की व्रत कथा जरूर पढ़ें। इस कथा के बिना आपकी पूजा और व्रत अधूरी रह सकती है। यहां पढ़िए शरद पूर्णिमा से जुड़ी संपूर्ण पौराणिक व्रत कथा।
शरद पूर्णिमा व्रत कथा
पौराणिक कथा अनुसार, एक समय की बात है, एक गांव में एक साहूकार रहता था जिसकी दो बेटियां थीं। दोनों ही बहनें पूर्णिमा का व्रत किया करती थीं। लेकिन दोनों के विचार व्रत को लेकर अलग-अलग थे। बड़ी बहन पूर्ण श्रद्धा के साथ शरद पूर्णिमा व्रत किया करती थी और शाम के समय में भगवान चन्द्रमा को अर्घ्य अर्पण करने के बाद अपना व्रत संपन्न करती थी। दूसरी तरफ छोटी बहन नाम मात्र के लिये व्रत का पालन करती थी और वह अपना व्रत संपन्न किये बिना ही भंग कर देती थी।
धीरे-धीरे वे दोनों बहनें बड़ी हो गयीं और साहूकार ने उन दोनों का विवाह कर दिया। बड़ी बहन ने स्वस्थ शिशुओं को जन्म दिया तो वहीं छोटी बहन की कोई संतान नहीं हुई। उसके सभी शिशु जन्म लेते ही मर जाते थे। जिससे छोटी बहन अत्यन्त उदास रहने लगी थी तथा अपने दुखों का समाधान खोजने के लिये वह एक संत के पास गई। संत ने उसके दुखों का कारण समझा तथा उसे बताया कि, वह बिना किसी रुचि और भक्ति के पूर्णिमा का व्रत कर रही थी, जिसके कारण ही उसके साथ ऐसा हो रहा है। संत ने उसे सलाह दी कि, यदि वह पूर्ण श्रद्धा से इस व्रत का पालन करेगी तो भगवान चन्द्रमा की कृपा से उसका अशुभ समय समाप्त हो जायेगा।
संत के कहे अनुसार छोटी बहन ने आगामी शरद पूर्णिमा का व्रत पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से किया। जिसके फलस्वरूप शिशु की तो प्राप्ति हुई किन्तु दुर्भाग्यवश यह शिशु भी जन्म के बाद तुरन्त मृत्यु की गोद में समा गया। छोटी बहन को यह ज्ञात था कि उसकी बड़ी बहन को भगवान चन्द्रमा की विशेष कृपा प्राप्त है और उसकी बहन उसके शिशु को पुनः जीवित कर सकती है। इसलिए, छोटी बहन ने एक योजना बनायी और अपने शिशु के मृत शरीर को एक कपड़े से ढककर एक छोटी सी शैया पर लिटा दिया। इसके बाद उसने अपनी बड़ी बहन को अपने घर आमंत्रित किया और उसे वहीं बैठने का आग्रह किया, जिस पर शिशु का शव पड़ा था। जैसे ही बड़ी बहन शैया पर बैठने लगी उसी समय उसके वस्त्र उस मृत शिशु को स्पर्श हो गये। जिससे शिशु जीवित होकर रुदन करने लगा। बड़ी बहन आश्चर्यचकित हो गयी और उसने अपनी छोटी बहन को इस लापरवाही के लिए खूब डांटा। उस समय छोटी बहन ने अपनी बड़ी बहन को बताया कि, जन्म के समय ही उसके इस शिशु की मृत्यु हो गयी थी और उसकी बड़ी बहन के स्पर्श से शिशु पुनः जीवित हो गया। यह केवल भगवान चन्द्रमा की कृपा और पूर्णिमा व्रत के प्रभाव से ही हुआ। कहते हैं उस दिन से शरद पूर्णिमा पर व्रत पालन करने की परंपरा आरंभ हो गयी।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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