बिसाऊः बांग्लादेश और नेपाल के बाद अब एक और देश में तख्तापलट की सनसनीखेज खबर सामने आ रही है। सेना ने अपने ही देश के राष्ट्रपति को हिरासत में ले लिया है। इसके साथ ही देश की सत्ता पर आधिकारिक कब्जे का ऐलान किया है। सेना ने यह दावा अपने देश के नेशनल टेलीविजन पर किया है। इस खबर ने पश्चिम अफ्रीका में हड़कंप दिया है। मामला पश्चिम अफ्रीकी देश गिनी-बिसाऊ का है, जहां बुधवार को हुए व्यापक सैन्य विद्रोह ने राजनीतिक भूचाल ला दिया।
एक समूह के सैन्य अधिकारियों ने सरकारी टेलीविजन पर घोषणा की कि उन्होंने राष्ट्रपति उमरू सिसोको एम्बालो को हिरासत में लेकर देश की सत्ता पर पूर्ण कब्जा कर लिया है। यह घटना राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों की घोषणा से ठीक एक दिन पहले घटी, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता की आशंका बढ़ गई है। दोपहर करीब 1 बजे राष्ट्रपति भवन के आसपास तेज गोलीबारी की आवाजें सुनाई दीं।
सैनिकों ने राष्ट्रपति भवन को घेरा
स्थानीय मीडिया और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सैनिकों ने राष्ट्रपति भवन को घेर लिया और एम्बालो को उनके कार्यालय से गिरफ्तार कर लिया। एम्बालो ने खुद फ्रांसीसी पत्रिका 'जेन अफ्रीक' को फोन करके अपनी गिरफ्तारी की पुष्टि की। उन्होंने आरोप लगाया कि यह विद्रोह सेना प्रमुख जनरल ब्रेमा बेसोरा द्वारा आयोजित किया गया है। एम्बालो ने कहा, “मैं अभी भी राष्ट्रपति हूं, लेकिन सैनिकों ने मुझे हिरासत में ले लिया है। यह लोकतंत्र पर हमला है।” सरकारी टेलीविजन पर प्रसारित बयान में सैन्य उच्च कमांड ने खुद को “व्यवस्था की बहाली के लिए उच्च सैन्य कमांड” घोषित किया।
सेना का ऐलान-हमने गिनी-बिसाऊ पर कब्जा किया
सेना के प्रवक्ता डिनिस एन'तचमा ने कहा, “हमने गिनी-बिसाऊ गणराज्य की सभी राज्य शक्तियां अपने हाथ में ले ली हैं। यह कदम देश को अस्थिर करने की चल रही साजिश के जवाब में उठाया गया है, जिसमें कुछ राष्ट्रीय राजनेता और एक कुख्यात ड्रग बैरन शामिल हैं।” विद्रोहियों ने राष्ट्रपति को हटाने, संसद भंग करने, चुनाव प्रक्रिया निलंबित करने, सभी सीमाएं बंद करने, हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाने और कर्फ्यू लागू करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि वे “संवैधानिक व्यवस्था बहाल होने तक” सत्ता संभालेंगे।
राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आने के 1 दिन पहले हुई घटना
यह घटना 23 नवंबर को हुए राष्ट्रपति चुनाव के ठीक बाद हुई, जहां एम्बालो ने 65% वोटों के साथ पहला दौर जीतने का दावा किया था। विपक्षी उम्मीदवार फर्नांडो डायस दा कोस्टा ने भी जीत का दावा किया। आधिकारिक नतीजे गुरुवार को आने थे, लेकिन विद्रोह ने सबकुछ लटका दिया। बिसाऊ की सड़कें खाली हो गईं, दुकानें बंद हैं और लोग घरों में दुबके हुए हैं।
1974 में आजाद हुआ था गिनी-बिसाऊ
गिनी-बिसाऊ पुर्तगाल से 1974 में आजाद हुआ था। तब से यह देश कम से कम 11 तख्तापलट और प्रयासों का गवाह रहा है। 2020 में एम्बालो सत्ता में आए थे, लेकिन सैन्य हस्तक्षेप और ड्रग तस्करी की समस्या ने देश को अस्थिर रखा। हाल ही में अक्टूबर में भी एक कथित तख्तापलट प्रयास विफल हो चुका था। पश्चिम अफ्रीकी देशों का संघ ने विद्रोह की निंदा की है और संवैधानिक व्यवस्था बहाल करने की मांग की। संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने भी चिंता जताई। अमेरिका और फ्रांस ने अपनी राजनयिकों को सतर्क रहने को कहा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विद्रोह चुनावी विवाद और सैन्य-राजनीतिक टकराव का नतीजा है। फिलहाल स्थिति तनावपूर्ण है, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें गिनी-बिसाऊ पर टिकी हैं।
(एपी)